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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 350 में से

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पृष्ठ 228

२०४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
दार्थानां क्रियाकर्मभावेनान्वयबोधरूपः शाब्दबोधो भवतीति
केचित् । “वृद्धा युवानः शिशवः कपोताः खले यथाऽमी युगपत्
पतन्ति ॥ तथैव सर्वे युगपत् पदार्थाः परस्परेणान्वयिनो
भवन्ति ”।
भाषा-(परन्तु) यहां कई एक प्राचीन लोग ऐसे मानते हैं कि-उन उन पदजन्य
पदार्थोंके स्मरणसे एककालावच्छेदेन ही ‘ खले कपोतन्यायं’ से उन उन पदार्थोंका
क्रियाकर्मभावसे अन्वयरूप शाब्दबोध होजाता है अर्थात् जैसे वृद्ध युवा तथा बाल
अवस्थाके ( कपोत ) कबूतर ( खले ) सबीज केदारमें सभी एकही कालमें ऊपरसे
उड़ते २ गिरते हैं, वैसेही सभी पदार्थ एकही कालमें उपस्थित हुए परस्पर अन्वयको
प्राप्त होते हैं-इति ।
अपरे तु “ यद्यदाकांक्षितं योग्यं सन्निधानं प्रपद्यते । तेन
तेनान्वितः स्वार्थः पदैरेवावगम्यते” । तथा च खण्डवाक्यार्थ-
बोधानन्तरं तथैव पदार्थस्मृत्या महावाक्यार्थबोध इत्यप्याहुः ।
एतेन तावद्वर्णाभिव्यङ्ग्यः पदस्फोटोऽपि निरस्तः । तत्तद्व-
र्णसंस्कारसहितचरमवर्णोपलम्भेन तद्व्यञ्जकेनैवोत्पत्तेरिति ।
भाषा-(अपरेतु ) दूसरे कई एक आचार्य ऐसा कहते हैं कि-जो जो पद
परस्पर आकांक्षा योग्यता तथा सन्निधिके युक्त हैं, उन उन पदोंके साथ अन्वित
हुआ पदार्थभी उन पदोंसेही ज्ञात होजाता है. ( तथाच ) एवं खण्डवाक्यार्थबोधके
अनन्तर अर्थात् पदजन्य पदार्थबोधके अनन्तर वैसेही पदार्थस्मरणद्वारा महा-
वाक्यार्थबोध होता है. इस पूर्वोत्तर कथनसे वैयाकरणोंके अभिमत जो
(वर्णाभिव्यङ्ग्य ) वर्णोंसे बोधित पदस्फोट इसकाभी निरास जानलेना चाहिये;
क्योंकि पूर्व पूर्व वर्णोंके संस्कारसहित जो अन्तिम वर्णका उपलाभ, उस उपलाभ
को पदका व्यञ्जक माननेसेभी निर्वाह होसकता है.
इदं तु बोध्यम् । यत्र द्वारमित्युक्तं तत्र पिधेहीति पदस्य ज्ञाना-
देव बोधो न तु पिधानादिरूपार्थज्ञानात्, पदजन्यपदार्थोपस्थिते-
स्तच्छाब्दबोधे हेतुत्वात् । किञ्च क्रियाकर्मपदानां तेन तेनैव
सह साकांक्षत्वात् तेन क्रियापदं विना कथं शाब्दबोधः स्यात् ।