न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
शक्तं पदम् । तच्चतुर्विधम् । क्वचिद्यौगिकं, क्वचिद्रूढं, क्वचिद्यो-
गरूढं क्वचिद्यौगिकरूढम् ।
भाषा-वाचकतासम्बन्धसे शक्तिविशिष्टका नाम 'पद' है; वह चार प्रकारका है
कहीं यौगिक है १, कहीं रूढ है २, कहीं योगरूढ है ३, और कहीं यौगिकरूढहै ४.
यत्रावयवार्थ एव बुध्यते तद्यौगिकम्, यथा पाचकादिपदम् । १ ।
भाषा-जो अपने अवयवोंसे स्वार्थका बोधक हो वह 'यौगिक' पद है; ऐसे पाचक
पाठकादि अनन्त पद हैं " पचतीति पाचकः" यहां 'पच' धातु कर्तामें 'ण्वुल
प्रत्ययका विधान है, एवं "पठतीति पाठकः" यहां 'पठ' धातु कर्तामें 'ण्वुल'
प्रत्ययका विधान है. एवं पाकक्रिया करनेवालेका नाम 'पाचक' तथा पाठक्रिया
करनेवालेका नाम 'पाठक' शब्दके अवयवोंहीसे लाभ हुआ १ ।
यत्रावयवशक्तितैरपेक्ष्येण समुदायशक्तिमात्रेण बुध्यते तद्रूढम्,
यथा गोमण्डलादिपदम् । २ ।
भाषा-जो अवयवशक्तिकी अपेक्षासे विना समुदाय शक्तिसे स्वार्थका बोधक हो
वह रूढ पद है, ऐसे 'गोमण्डलादि' अनन्त पद हैं अर्थात् यहां 'गो' पदकी समु-
दायशक्ति गौव्यक्तिमें है और मंडलपदकी समुदायशक्ति सूर्यादिरोधक कुण्डलाकार
परिवारादिमें है, एवं यहां समुदायशक्तिसे शाब्दबोध होताहै, इसलिये अवयवशक्ति
विचारकी कुछ आवश्यकता नहीं है. २ ।
यत्र त्ववयवशक्तिविषये समुदायशक्तिरप्यस्ति तद्योगरूढम्,
यथा पङ्कजादिपदम् । तथाहि । पङ्कजपदमवयवशक्त्या पङ्क-
जनिकर्तृत्वरूपमर्थं बोधयति,समुदायशक्त्या च पद्मत्वेन रूपेण
पद्मं बोधयति।न च केवलावयवशक्त्या कुमुदे प्रयोगः स्यादिति
वाच्यम् । रूढिज्ञानस्य केवलयौगिकार्थज्ञाने प्रतिबन्धकत्वादिति
प्राञ्चः ।
भाषा-एवं जो पद अवयव तथा समुदाय उभयशक्तिद्वारा स्वार्थका बोधक
हो वह 'योगरूढ' है, ऐसे पंकजादि पद हैं. ( तथाहि ) वह ऐसे है कि--एकही
'पंकज' पद अपनी " पंकात् जायते इति पंकजः" इत्याकारक अवयवशक्तिसे
पंकसे उत्पन्न होनेवाली वस्तुको कहता है और समुदायशक्तिसे पद्मत्वेन रूपेण
( पद्म ) कमलका बोधक है. शंका-केवल अवयवशक्तिहीसे यदि 'पंकज' पदका