न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 219, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९५
तस्स्वशक्यार्थशाब्दबोधं प्रति पदानां सामर्थ्यावधारणात् । वाक्ये
तु शक्तेरभावाच्छक्यसम्बन्धरूपा लक्षणाऽपि नास्ति ।
भाषा-( किन्तु ) परन्तु ‘ लाक्षणिक ’ पद ( अनुभावक ) शाब्दबोधका जनक
नहीं है किन्तु लाक्षणिकार्थके शाब्दबोधमें ( पदान्तर ) घोषादि पदान्तर कारण हैं;
क्योंकि शक्तिसम्बन्धसे या लक्षणासम्बन्धसे उपस्थित जो ( इतरपदार्थ ) तीरादि
उस तीरादिके साथ अन्वित जो ( स्व ) घोषादिपद शक्यार्थ गोपालग्राम तादृश
तीराद्यन्वित गोपालग्रामविषयक शाब्दबोधके प्रति ( पदानां ) घोषादि पदोंका
सामर्थ्य निश्चय होताहै; शक्तपदही होताहै; वाक्य नहीं होता. इसलिये वाक्यमें
शक्तिका अभाव होनेसे शक्यसम्बन्धरूपा लक्षणाभी वाक्यमें नहीं है.
यत्र गंभीरायां नद्यां घोष इत्युक्तं तत्र नदीपदस्य नदीतीरे लक्ष-
णा , गंभीरापदार्थस्य नद्या सहाभेदेनान्वयः क्वचिदेकदेशान्व-
यस्यापि स्वीकृतत्वात् ।
शंका-“ गम्भीरायां नद्यां घोषः ” इत्यादि वाक्यस्थलमें ‘ नदी ’ पदकी
नदीतीरमें लक्षणा माननेसे गम्भीरपदार्थका नदीरूप पदार्थके एकदेशके साथ
अन्वय मानना होगा अर्थात् नदीपदबोध्य जो ‘ नदीतीर ’ उसका एकदेश जो नदी
उसके साथ'गम्भीर'पदका अन्वय मानना होगा, परन्तु ऐसा माननेसे“पदार्थः पदार्थेना-
न्वेति न तु पदार्थैकदेशेन ” इस नियमके साथ विरोध होताहै और “ नीलो घटः ”
इत्यादि स्थलोंमें नीलपदार्थका घटपदार्थ एकदेश घटत्वादिमें अन्वय बोधवारणार्थ इस
नियमका माननाभी आवश्यक है; इसलिये “ गम्भीरायां नद्यां घोषः” इत्यादिस्थलमें
पदलक्षणाका असम्भव होनेसे वाक्यलक्षणाही माननी उचित है. समाधान-
“ गम्भीरायां नद्यां घोषः ” इत्यादि स्थलमें केवल ‘ नदी ’ पदकी नदीतीरमें लक्षणा
है और गम्भीरपदार्थका नदीके साथ अभेदान्वय है अर्थात् गम्भीराभिन्न जो नदी
तादृश नदीतीरमें घोष है; यह बोध हुआ. ( क्वचित् ) “ चैत्रस्य गुरुकुलम् ” इत्यादि
स्थलविशेषोंमें एकदेशअन्वयभी विद्वान् लोगोंके अभिमत है. यहां चैत्रोत्तरवर्त्ति षष्ठ्य-
र्थसम्बन्धका गुरुके साथ अन्वय है.
यदि तत्रैकदेशान्वयो न स्वीक्रियते तदा नदीपदस्य गंभीरनदी-
तीरे लक्षणा गंभीरापदं तात्पर्यग्राहकम् । बहुव्रीहावप्येवम् ।
तत्र हि चित्रगुपदादौ यद्येकदेशान्वयः स्वीक्रियते तदा गोपदस्य