न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 217, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९३
‘ यष्टि ’ पदकी यष्टिधरमें लक्षणा करनी चाहिये अर्थात् वक्ता अपने भृत्यविशेषको
यह कहता है कि, लाठीवाले साधुओंको भोजन जिमानेके लिये गृहके भीतर
लेजाओ इत्यादि. औरभी अनेक उदाहरणस्थल जहत्स्वार्थाके होसकतेहैं.
एवं काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यादौ काकपदस्य दध्युपघातके
लक्षणा सर्वतो दधिरक्षायास्तात्पर्यविषयत्वात् । एवं छत्रिणो
यान्तीत्यादौ छत्रिपदस्यैकसार्थवाहित्वे लक्षणा । इयमेवाजह-
त्स्वार्था लक्षणेत्युच्यते, एकसार्थवाहित्वेन रूपेण छत्रित-
दन्ययोर्बोधात् ।
भाषा-एवं “ काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्, छत्रिणो यान्ति ” इत्यादि स्थलोंमें
‘ अजहत्स्वार्था लक्षणा ’ है. यहां ‘ काक ’ पदकी दधिके विघातक बिडालादि
जीवमात्रमें लक्षणा है; क्योंकि यहां वक्ताका भृत्यादिके प्रति कहनेका तात्पर्य यह
है कि-“ दधि रखना; काक या और कोई जीव दधिको भक्षण न करजावे ” इति ।
एवं ‘ छत्रिणो यान्ति ’ इस स्थलमेंभी ‘ छत्रि ’ पदकी एकसार्थवाहित्व विशिष्टमें
अर्थात् एकसाथ चलनेवाले पुरुषमात्रमें लक्षणा है; क्योंकि यहांभी छातेवाले पुरुषका
तथा उनके साथियोंका एकसार्थवाहित्वेन रूपेण बोध होताहै.
यदि चान्वयानुपपत्तिर्लक्षणाबीजं स्यात्तदा कचिद्गङ्गापदस्य
तीरे कचिद्घोषपदस्य मत्स्यादौ लक्षणेति नियमो न
स्यात् ।
भाषा-लक्षणास्थलमें यह नियम है कि-जिस स्थलमें जो पद वक्ताने जिस
अर्थबोधनके तात्पर्यसे उच्चारण किया है, वह पद उसी अर्थमें अवश्य लाक्षणिक
होता है, परन्तु यदि अन्वयानुपपत्ति लक्षणाका बीज मान लिया जाय तो कहीं
‘ गंगा ’ पदकी तीरमें और कहीं ‘ घोष ’ पदकी मत्स्यादि जलजीवोंमें लक्षणा नहीं
होनी चाहिये; क्योंकि ‘ गंगा ’ पदका तीरमें तात्पर्यग्रह स्थलमें एवं घोषपदका
मत्स्यादिमें तात्पर्यग्रह स्थलमें घोषकी तीरमें तथा मत्स्यादिकोंकी प्रवाहमें अन्व-
यानुपपत्ति नहीं है.
इदं तु बोध्यम् । शक्यार्थसम्बन्धो यदि तीरत्वेन रूपेण गृहीत-
स्तदा तीरत्वेन तीरबोधः, यदि तु गङ्गातीरत्वेन रूपेण गृही-
तस्तदा तेनैव रूपेण स्मरणम् ।
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