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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 350 में से

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पृष्ठ 212

१८८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
पदोंके अर्थके जाननेवाले पुरुषको ( सहकार ) आम्रादि पदोंकी सहकारतासे 'पिक'
पदकी शक्ति कोकिला नामक पक्षीविशेषमें स्वयं ग्रहण होजातीहै-इति ८ ।
तत्र जातावेव शक्तिर्न तु व्यक्तौ, व्यभिचारादानन्त्याच्च। व्यक्तिं
विना च जातिभानस्यासम्भवाद्यक्तेरपि भानमिति केचित् ।
तन्न। शक्तिं विना व्यक्तिभानानुपपत्तेः ।
भाषा-( तत्र ) उसमेंभी मीमांसक लोग यह कहतेहैं कि-घटादिपदोंकी घट-
त्वादिजातिहीमें शक्ति है, किन्तु कम्बुग्रीवादिमद्व्यक्तिमें नहीं. उसमें कारण यह है
कि, व्यक्तिमें शक्तिग्रहणका व्यभिचार है अर्थात् जिस व्यक्तिमें शक्ति ग्रहण नहींभी
करी वहांभी शाब्दबोधका उदय होताहै; परन्तु वहां शाब्दबोध कारणीभूत शक्तिज्ञान
नहीं है इसलिये व्यभिचार है और यदि जातिमें शक्ति स्वीकार करें तो व्यभिचार
नहीं है; क्योंकि जात्या वहांभी शक्ति गृहीत हो चुकी है और व्यक्तियां अनन्त हैं
इसलिये प्रत्येक व्यक्तिमें शक्ति माननेमें गौरवभी है और व्यक्तिसे विना केवल
जातिका भान तो होही नहीं सकता किन्तु जातिभासक सामग्रीही व्यक्तिका भास-
कभी माननी होगी; इसलिये व्यक्तिका भान तो अर्थसेही सिद्ध है; उसमें शक्ति मान
नेकी कोई आवश्यकता नहीं है. यह सब मीमांसकका मन्तव्य है । ( तन्न ) सो
समीचीन नहीं है; क्योंकि यदि व्यक्तिमें पदकी शक्ति न होय तो व्यक्तिका भान
नहीं हुआ चाहिये.
न च व्यक्तौ लक्षणा। अनुपपत्तिप्रतिसन्धानं विनापिव्यक्तिबोधात्।
न च व्यक्तिशक्तावानन्त्यम्, सकलव्यक्तावेकस्या एव शक्तेः स्वी-
कारात् । नचाननुगमः, गोत्वादेरेवानुगमकत्वात् ।
शंका-हम व्यक्तिमें लक्षणा मानलेंगे. समाधान-लक्षणा वहां मानी जातीहै.
जहां किसीतरहकी अनुपपत्ति होय और व्यक्तिमें तो किसीतरहकी अनुपपत्तिभी
दीखनहीं पड़ती. यहां लक्षणा माननेका कौन प्रयोजन है? शंका-व्यक्तिमें शक्ति
माननेमें गौरव तो है; क्योंकि व्यक्तियां अनन्त हैं इसलिये शक्तियांभी अनन्तही माननी
पड़ेंगी.समाधान-यावत् व्यक्तियोंमें हम एकही शक्तिका स्वीकार करतेहैं इसलिये
गौरव नहीं है.शंका-घटपटादि व्यक्ति योंको अननुगत होनेसे विषयतासम्बन्धसे शक्ति
ज्ञान कारणतामें अवच्छेदकत्वधर्मका अभावरूप अननुगम होगा. समाधान-
गोत्वघटत्वादि धर्मोंसे अनुगम होसक्ताहै अर्थात् गोव्यक्तिविषयक शाब्दबोधके प्रति
गोत्वविशिष्टविषयक शक्तिज्ञानत्वेन कारणताके होनेसे अननुगमरूप दोष नहीं है.