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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 350 में से

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पृष्ठ 222

१९८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
न च साहित्ये लक्षणीति वाच्यम् । साहित्यशून्ययोरपि द्वन्द्वद-
र्शनात् ।
मीमांसक-धव खदिर उभयमें रहनेवाला जो सहवृत्तित्वरूप साहित्य उस
साहित्यके आश्रयमें यदि 'खदिर' पदकी लक्षणा मान लीजाय तो हानि क्या है?
समाधान-सहवृत्तित्वरूप साहित्यसे शून्य हिम विन्ध्यादिपदार्थोंकाभी " हिम
विन्ध्यौ " इत्याकारक ऐतरेतरयोगरूप द्वन्द्व देखा जाताहै इसलिये द्वन्द्वस्थलमें
उत्तरपदकी साहित्याश्रयमें लक्षणा माननी उचित नहीं है.
न चैकक्रियान्वयित्वरूपं साहित्यमस्तीति वाच्यम्।क्रियाभेदेपि
धवखदिरौ पश्य छिन्धीत्यादिदर्शनात् साहित्यस्याननुभवाच्च ।
तस्मात् साहित्यादिकं नार्थः । अतएव राजपुरोहितौ सायुज्य-
कामौ यजेयातामित्यत्र लक्षणाभावाद्द्वन्द्व आश्रीयते तस्मात्सा-
हित्यंनार्थः । किंतु वास्तवो भेदो यत्र तत्र द्वन्द्वः ।
शंका-हम सहवृत्तित्वरूप साहित्यके तात्पर्यसे यहां लक्षणा नहीं कहते किन्तु
एकक्रियान्वयित्वरूप साहित्यके तात्पर्यसे कहतेहैं. एवं छेदनरूपा जो एकक्रिया
तादृश एकक्रियान्वयित्व धव तथा खदिर उभयमें विद्यमान है. इस रीतिसे एक
क्रियान्वयित्वरूप साहित्यके आश्रयमें 'खदिर' पदकी लक्षणा मान लीजाय तो क्या
हानि है? समाधान-" धवखदिरौ छिन्धि पश्य" इत्यादि प्रयोगस्थलमें क्रियाके
भेद होनेसेभी द्वन्द्व देखाजाताहै.भाव यह कि-एक क्रियान्वयित्वरूप साहित्य यदि
नियमसे इतरेतरयोगद्वन्द्वस्थलमें रहे तो उसके आश्रयमें 'खदिर' पदकी लक्षणाभी
मान लीजाय; परन्तु उसका तो "धवखदिरौ छिन्धि पश्य" इत्यादि क्रियान्वयस्थलमें
व्यभिचार प्रतीत होताहै. इसलिये साहित्यमें लक्षणा माननी उचित नहीं और
वास्तवमें एकक्रियान्वयित्वरूप साहित्यका " धवखदिरौ छिन्धि " इत्यादिवाक्यके
शाब्दबोधमें अनुभवभी नहीं होता. ( अतएव ) द्वन्द्वस्थलमें लक्षणाके अभाव होने-
सेही " राजपुरोहितौ सायुज्यकामौ यजेयाताम्-अर्थात् सायुज्यमुक्तिकी कामनावाले
राजा तथा पुरोहित दोनों यजन करें " इत्यादि वाक्यस्थलमें लक्षणाके अभावसे
द्वन्द्वका आश्रयण पूर्व आचार्यलोगोंने कियाहै. ( तस्मात् ) इसलिये साहित्य किसी
पदका अर्थ नहींहै किन्तु पदार्थद्वयका जहां वास्तवभेद होताहै वहां द्वन्द्वसमास
होताहै.