न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
१८० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
वृत्त्यापदजन्यत्वं बोध्यम् । अन्यथा घटादिपदात्समवायसम्बन्धे-
नाकाशस्मरणे जाते आकाशास्यापि शाब्दबोधापत्तेः ।
भाषा-एवं पदजन्य पदार्थस्मरणमध्यमें व्यापार है. ( अन्यथा ) यदि पदज-
न्यपदार्थस्मरणको व्यापार नहीं मानें, किन्तु पदजन्यपदार्थज्ञानहीको मानें, वह ज्ञान
चाहो जैसाभी हो तौ पदज्ञानवाले पुरुषको प्रत्यक्षादि प्रमाणसे पदार्थ उपस्थिति
होनेसेभी शाब्दबोध होना चाहिये;परन्तु ऐसा होता कभी नहीं. यहां पदजन्यपदार्थ-
स्मरणभी पदकी वृत्तिद्वारा समझना चाहिये.(अन्यथा ) येनकेन सम्बन्धेन कहेंगे तो
घटादि पदोंसे समवायसम्बन्धसे आकाशका स्मरण हुए घटादि पदोंसे आकाशका
शाब्दबोध होना चाहिये.
वृत्तिश्च शक्तिलक्षणान्यतरः सम्बन्धः । अत्रैव शक्तिज्ञानस्योप-
योगः। पूर्वं शक्तिग्रहाभावे पदज्ञानेऽपि तत्सम्बन्धेन स्मरणानुप-
पत्तेः । पदज्ञानस्य च एकसम्बन्धिज्ञानविधयाऽर्थस्मारकत्वम् ।
भाषा-' वृत्ति ' नाम पदपदार्थके परस्परसम्बन्धका है वह सम्बन्ध वाच्यवाचक
बोध्यबोधक ज्ञाप्यज्ञापक भावादि अनेक प्रकारका है वह वृत्ति शक्ति तथा लक्षणा-
भेदसे दोप्रकारकी है. ( अत्रैव ) यहां पदजन्यपदार्थउपस्थितिहीमें शक्तिज्ञानका
उपयोग है; क्योंकि यदि पहले पदशक्तिका ग्रहण न हो तो पदज्ञान होनेसेभी उसके
सम्बन्धसे पदार्थका स्मरण नहीं होता. एवं पदज्ञानको " एक सम्बन्धिज्ञानविधया "
अर्थात् " एकसम्बन्धिज्ञानमपरसम्बन्धिस्मारकं " इस नियमसे जैसे हाथीको देखकर
हाथिवान् महावतका तथा महावतको देखकर हाथीका स्मरण होता है वैसेही पदज्ञा-
नकोभी सम्बन्धिज्ञानविधया अर्थस्मारकत्ता है.
शक्तिश्च पदेन सह पदार्थस्य सम्बन्धः, स चास्माच्छब्दादयमर्थो
बोद्धव्य इतीश्वरेच्छारूपः। आधुनिके नाम्नि शक्तिरस्त्येव।एका-
दशेऽहनि पिता नाम कुर्यादितीश्वरेच्छायाः सत्त्वात् । आधु-
निके तु सङ्केते न शक्तिरिति सम्प्रदायः । नव्यास्त्वीश्वरेच्छा न
शक्तिः, किन्त्विच्छैव । तेनाधुनिकसङ्केतेऽपि शक्तिरस्त्येवेति
वदन्ति । शक्तिग्रहश्च व्याकरणादितः ।
भाषा-पदके साथ पदार्थके सम्बन्धविशेषका नाम 'शक्ति' है. वह सम्बन्धविशेष
“अस्मात्पदादयमर्थो बोद्धव्यः” अर्थात् “ इस पदसे यह अर्थ जानना चाहिये ”
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८१
इत्याकारक ईश्वरकी इच्छारूपही है और माता पिता आदि करके संकेतित चैत्र मैत्रादि
आधुनिक नामोंमेंभी वही शक्ति विद्यमान है; क्योंकि वहांभी “एकादशेऽहनि पिता
नाम कुर्यात्” अर्थात् “ग्यारादिन पीछे पिता अपने पुत्रका नाम रक्खे” इस ईश्वरसंके-
तसे वह शक्ति सामान्यरूपसे विद्यमान है और आधुनिक संकेतित ‘नदी वृद्धि’
आदि पदोंमें वह शक्ति नहीं है, ऐसा साम्प्रदायिक लोग मानते हैं और नवीन लोगों-
का यह कथन है कि ईश्वरकी इच्छारूप पदमें शक्ति नहीं है किन्तु केवल इच्छारूपा
है; वह इच्छा चाहो किसीकी हो. एवं आधुनिक संकेतित पदोंमेंभी शक्ति हो सकतीहै
उस शक्तिके ग्राहक व्याकरणादि आठ हैं.
तथाहि । “शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोषाप्तवाक्याद्व्यवहारत-
श्च । वाक्यस्य शेषाद्विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य
वृद्धाः” ॥
भाषा-( तथाहि ) वही लिखतेहैं कि-पदशक्तिका ग्रहण व्याकरणसे, उपमानसे
कोशसे,आप्तवाक्यसे, व्यवहारसे, वाक्यशेषसे, विवरणसे और प्रसिद्ध पदके सान्निध्यसे
वृद्ध विद्वान् लोग कहतेहैं.
धातुप्रकृतिप्रत्ययादीनां शक्तिग्रहो व्याकरणाद्भवति, क्वचित्तु स-
ति बाधके त्यज्यतेऽपि । यथा वैयाकरणैराख्यातस्य कर्तरि
शक्तिरुच्यते । चैत्रः पचतीत्यादौ कर्त्रा सह चैत्रस्याभेदान्वयः,
तच्च गौरवात् त्यज्यते, किंतु कृतौ शक्तिर्लाघवात् । कृति-
श्चैत्रादौ प्रकारीभूय भासते ।
भाषा-धातुप्रकृति प्रत्ययआदिकी शक्तिका ग्रहण “भूसत्तायाम, वर्तमाने लट्”
इत्यादि व्याकरणसे होताहै; परन्तु यहभी किसी एक स्थलमें गौरवादि दोषके बाधक
होनेसे त्यागना पड़ता है. जैसे वैयाकरण लोग आख्यातकी शक्ति कर्त्तामें मानतेहैं
“चैत्रः पचति” इत्यादि स्थलमें आख्यातवाच्यकर्त्ताके साथ चैत्रका अभेदान्वय है
अर्थात् “लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः ३।४।६९” इत्यादि व्याकरणानुशासनसे
आख्यात वाच्य चैत्रही कर्त्ता है, परन्तु इस प्रकारका व्याकरणसे शक्तिग्रह गौरवभयसे
त्यागना पड़ता है; किन्तु लाघवानुरोधसे आख्यातकी कृतिमें शक्ति माननीही उचित है
भाव यह कि-यदि आख्यातकी कर्त्तामें शक्ति होगी तो शक्यतावच्छेदक कर्तृनिष्ठ
धर्मविशेष कृतिकोही मानना होगा.वह कृति प्रतिकर्तृ भिन्न२ है, एवं शक्यतावच्छेद-
कभी नानाही होंगे. ऐसे नाना अवच्छेदक धर्मके उपस्थित होनेसे उपस्थितिकृत महा-
१८२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
गौरव होगा इसलिये लाघवसे आख्यातकी कर्तृनिष्ठ धर्मविशेषकृतिहीमें शक्ति माननी
उचित है.एवं शक्यतावच्छेदक धर्म यावत् कृतियोंमें रहनेवाली 'कृतित्वरूपा' जाति
होगी वह यावत् कृतिके शिरपर एक है; इसलिये परमलाघव है-इति। न्यायसिद्धान्तमें
जिसमें आख्यातकी शक्ति मानी गई है वह कृति चैत्रादि कर्तामें प्रकारीभूत होकर
प्रतीत हुआ करती है.
न च कर्तुरनभिधानाच्चैत्रादिपदानन्तरं तृतीया स्यादिति वा-
च्यम् । कर्तृसंख्यानभिधानस्य तत्र तन्त्रत्वात् ।
शंका—आपके कथनानुसार लाघवानुरोधसे यदि आख्यात प्रत्ययका अर्थ
कृतिही मान लिया जाय तो अनुक्तकर्तामें "अनभिहिते २-३-१" इस अधिका-
रसे "कर्तृकरणयोस्तृतीया २-३-१८" इस सूत्रसे तृतीयाविभक्ति अर्थात् "चैत्रेण
पचति" इत्याकारक प्रयोगको साधुता होनी चाहिये. समाधान—आख्यातप्रत्ययके
कृति संख्या कालादि अनेक अर्थ विद्वान्लोगोंके अनुभवसिद्ध हैं, एवं जिस स्थलमें
कर्तृगतसंख्या आख्यातप्रत्ययसे अनुक्त होगी वहां तृतीयाका होना सम्भव है;
अन्यथा नहीं.
संख्याभिधानयोग्यश्च कर्मत्वाद्यनवरुद्धः प्रथमान्तपदोपस्था-
प्यः। कर्मत्वादीत्यस्य इतरविशेषणत्वतात्पर्याविषयत्वमर्थः ।
शंका—यही कैसे जाना जाय कि-कर्तृगत संख्या वहां उक्त है और कहां
अनुक्त है? समाधान—कर्मत्वाद्यनवरुद्ध और प्रथमान्तपदबोध्य कर्ता संख्याभि-
धानयोग्य होताहै. 'कर्मत्वाद्यनवरुद्ध' इस भागका इतर विशेषणत्वेन तात्पर्यावि-
षयस्वरूप सांकेतिक अर्थ समझना चाहिये. एवं "इतरविशेषणत्वेन तात्पर्याविषय-
त्वविशिष्टप्रथमान्तपदोपस्थाप्यः कर्ता संख्याभिधानयोग्यः" इत्याकारक समुदित
नियमका स्वरूप है.
तेन चैत्र इव मैत्रो मच्छतीत्यादौ न चैत्रे संख्यान्वयः। यत्र कर्मा-
दौ न विशेषणत्वे तात्पर्यं तद्वारणाय प्रथमान्तेति ।
भाषा—एवं "चैत्र इव मैत्रो गच्छति" इत्यादिस्थलोंमें (गच्छति) उत्तर-
वर्त्ति आख्यात वाच्य संख्याका चैत्रमें अन्वय नहीं होसकता, किन्तु मैत्रहीमें होगा;
क्योंकि चैत्रपदार्थ इव पदार्थसादृश्यमें विशेषणत्वेन तात्पर्यका विषय है. एवं ऐसे
स्थलमें "चैत्रनिरूपितं यत् सादृश्यं तादृशसादृश्येन यत् गमनं तद्गमनानु-
कूला वर्तमानकालिका या कृतिः तादृशकृत्याश्रय एकत्वसंख्याविशिष्टो मैत्रः" इत्या-
कारक शाब्दबोध होताहै. एवं "तण्डुलं पचति" इत्यादिस्थलमें आख्यातार्थ
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८३
संख्याका तण्डुलमें अन्वयबोधवारणके लिये तथा “चैत्रेण सुप्यते” इत्यादि स्थलमें
धात्वर्थस्वापादिकमें संख्यान्वय बोधवारणके लिये “प्रथमान्तपदोपस्थाप्यः” इस-
भागका निवेश है.
यद्वा धात्वर्थातिरिक्ताविशेषणत्वं प्रथमदलार्थः। तेन चैत्र इव
मैत्रो गच्छतीत्यत्र चैत्रादेर्वारणम्। स्तोकं पचतीत्यादौ स्तोका-
देर्वारणाय च द्वितीयदलम् । तस्य द्वितीयान्तोपस्थाप्यत्वा-
द्वारणम् ।
भाषा-( यद्वा ) अथवा धात्वर्थसे अतिरिक्तका ना विशेषण होना प्रथमभागका
अर्थ है. इस रीतिसेभी “चैत्र इव मैत्रो गच्छति” इस स्थलमें चैत्रादिका वारण होस-
कताहै; क्योंकि चैत्रपदार्थ धात्वर्थसे अतिरिक्त ( इव ) अर्थसादृश्यमें विशेषणही है
और “ स्तोकं पचति मृदु पचति ” इत्यादि स्थलोंमें स्तोकादिमें आख्यातार्थ-
संख्याका अन्वयवारणके लिये ‘ प्रथमान्त ’ इत्यादि द्वितीय दलका निवेश है. भाव
यह कि- स्तोकादि पदार्थोंको क्रियाके विशेषण होनेसे यद्यपि उनमें धात्वर्थातिरि-
क्ताविशेषणत्व स्वतःसिद्ध है. वहां आख्यातार्थसंख्याका अन्वय अवश्य हुआ चाहिये.
तथापि ‘ प्रथमान्तपदोपस्थाप्यत्व ’ रूप नियमका द्वितीय अंश उनमें नहीं है
इसलिये आख्यातार्थसंख्या अन्वय योग्यताभी उनमें नहीं है; क्योंकि ‘क्रियाविशेष-
णानां कर्मत्वम् ’ इस अनुशासनसे स्तोकादिपदोंको द्वितीयान्त पदोपस्थाप्यता है.
एवं व्यापारेऽपि न शक्तिर्गौरवात् । रथो गच्छतीत्यादौ व्यापारे
आश्रयत्वे वा लक्षणा, जानातीत्यादौ त्वाश्रयत्वे, नश्यतीत्यादौ
प्रतियोगित्वे निरूढलक्षणा । १ ।
भाषा-एवं ‘लकारमात्रकी व्यापारमें शक्ति माननी’ यह मीमांसकमतभी समी-
चीन नहीं; क्योंकि जन्यत्वादि घटित व्यापारभी यत्नत्वजात्यापेक्षया गुरुभूतही है.
एवं “ रथो गच्छति-” इत्यादि स्थलमें गमनानुकूलव्यापारमें किंवा गमनानुकूल
व्यापारके आश्रयमें आख्यात प्रत्ययकी ( निरूढा ) नित्यतातपर्यवती लक्षणावृत्ति
है. एवं “चक्षुर्जानाति” इत्यादि स्थलमें ज्ञानानुकूल व्यापार आश्रयत्वमें तथा “घटो
नश्यति ” इत्यादि स्थलमें नाशानुकूल व्यापाराश्रयत्वमें अर्थात् प्रतियोगित्वमें
नित्यतात्पर्यवती निरूढ लक्षणाही समझनी चाहिये.-इति १ ।
उपमानाद्यथा शक्तिग्रहस्तथोक्तम् । २ ।
भाषा-एवं गोनिरूपित गवयनिष्ठ सादृश्यसाक्षात्काररूप उपमानसे जैसे
१८४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
“गवयो गवयपदवाच्यः” इत्याकारक शक्तिग्रहण होता है, वह हम उपमान निरूपण
अवसरमें कहचुकेहैं २ ।
एवं कोषादपि शक्तिग्रहः सति बाधके क्वचित्त्यज्यते । यथा
नीलादिपदानां नीलरूपादौ नीलादिविशिष्टे च शक्तिः कोष व्यु-
त्पादिता तथापि लाघवान्नीलादौ शक्तिः, नीलादिविशिष्टे तु ल-
क्षणेतिं । ३ ।
भाषा-एवं कोशसेभी पदशक्तिका ग्रहण होता है; परन्तु बाधक सद्भावस्थलमें
इसकाभी त्याग करना पड़ता है. जैसे अमरादिकोषोंमें “ गुणे शुक्लादयः पुंसि
गुणिलिंगास्तु तद्वति ” अर्थात् ' शुक्ल ' आदि शब्द रूपके वाचक नियत पुंलिंग
रहतेंहैं और रूपवालेके वाचक होवें तो रूपवालेके लिंगका आश्रयण करतेहैं. ऐसा
लिखा है. परन्तु यहांभी शुक्लनीलादिपदोंकी लाघवसे शुक्लनीलादिरूपहीमें शक्ति
माननी उचित है; क्योंकि ' नीलादिमत्त्व ' की अपेक्षासे 'नीलत्व आदि ' जातिके
शक्यतावच्छेदक माननेमें लाघव प्रतीत होता है और नीलादिरूप विशिष्टमें
नीलादि पदोंकी लक्षणा होती है; यह सिद्धान्त है. और कई एक विद्वान् यहभी
कहतेंहैं कि-ऐसे स्थलमें लक्षणा माननेका कुछ प्रयोजन नहीं है; क्योंकि “गुणव-
चनेभ्यो मतुपोलुगिष्टः” इस वार्तिकसे लुप्त 'मतुप्' प्रत्ययसेही बोध होसकता है फिर
लक्षणा माननी निष्फल है ३ ।
एवमाप्तवाक्यादपि, यथा कोकिलः पिकपदवाच्य इत्यादिश-
ब्दात् पिकादिपदशक्तिग्रहः । ४ ।
भाषा-ऐसेही यथार्थवक्ता पुरुषके कथनसेभी पदशक्तिका ग्रहण होता है जैसे
किसी ' पिक ' पदके अर्थके न जाननेवाले बालकने किसी योग्यपुरुषसे पूंछा कि-
' पिक ' किसको कहतेंहैं? तो उस योग्यपुरुषने कहा कि-'पिक' नाम कोकिलाका
है तो ऐसे स्थलमें ' पिक' पदके अर्थको न जाननेवाले बालकको उस आप्त पुरुषके
वचनसे ' पिक ' पदकी शक्तिका ग्रहण होजाता है ४ ।
एवं व्यवहारादपि । यथा प्रयोजकवृद्धेन घटमानयेत्युक्तं,तच्छ्रु-
त्वा प्रयोज्यवृद्धेन घट आनीतस्तदवधार्य पार्श्वस्थो बालो घटा-
नयनरूपं कार्यं घटमानयेति शब्दप्रयोज्यमित्यवधारयति
ततश्च घटं नय गामानयेत्यादावावापोद्वापाभ्यां घटादिपदानां
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८५
कार्यान्वितघटादौ शक्तिं गृह्णाति । इत्थं च भूतले नीलो घट इ-
त्यादिशब्दान्न शाब्दबोधः, घटादिपदानां कार्यान्वितघटादि-
बोधे सामर्थ्यावधारणात्, कार्यताबोधं प्रति च लिङादीनां सा-
मर्यात् तदभावान्न शाब्दबोध इति केचित् । तन्न । प्रथमतः
कार्यान्वितघटादौ शक्त्यवधारणेऽपि लाघवेन पश्चात्तस्य परि-
त्यागौचित्यात् । अत एव ‘चैत्र पुत्रस्ते जातः कन्या ते गर्भिणी
जाता’इत्यादौ मुखप्रसादमुखमालिन्याभ्यां सुखदुःखे अनुमाय त-
त्कारणत्वेन परिशेषाच्छाब्दबोधं निर्णीय तद्धेतुतया तं शब्दम-
वधारयति । तथाच व्यभिचारात् कार्यान्विते न शक्तिः । न च
तत्र तं पश्येत्यादिशब्दान्तरमध्याहार्यम्, मानाभावात् । ‘चैत्र
पुत्रस्ते जातो मृतश्च’इत्यादौ तदभावाच्च। इत्थं च लाघवादान्वि-
तघटेऽपि शक्तिं त्यक्त्वा घटपदस्य घटमात्रे शक्तिमवधारयति ।५।
भाषा—ऐसेही व्यवहारसेभी पदशक्तिका ग्रहण होता है; जैसे ( प्रयोजक )
आज्ञा करनेवाले बड़े वृद्धने छोटे वृद्धको आज्ञा करी कि, “ घटमानय–अर्थात् घटको
लेआओ ” तो ऐसे वचनको सुनकर छोटा वृद्ध घटको लाया. उस घटके लानेको
देखकर पास खड़ा हुआ बालक यह निश्चय करता है कि, ऐसा घटका लाना रूप कार्य
“ घटमानय ” इत्याकारकशब्दके उच्चारण करनेसे हुआ है. उसके कुछ काल पीछे
फिर बड़े वृद्धने छोटे वृद्धसे कहा कि—“ घटं नय, गामानय–अर्थात् घट लेजाओ
और गौको लेआओ.” जब छोटे वृद्धने आज्ञा मानकर वैसेही किया, तो समीप-
वर्त्ति बालक घटके लाने तथा लेजानेसे ‘ घट ’ पदकी शक्ति कम्बुग्रीवादिमद्
व्यक्तिविशेषमें निश्चित करता है. एवं इत्यादि व्यवहार जहां होता है वहांही
घटादि पदोंकी शक्ति कार्यान्वित घटादिमें बालक ग्रहण करलेता है परन्तु ऐसे
स्थलमें कोशको शक्तिका ग्राहक न माननेवाला प्रभाकर यह कहता है कि—
घटादि पदोंकी शक्तिका ग्रहण नियमसे कार्यान्वित घटादिमेंही होता है; अन्यथा
नहीं. ( इत्थञ्च ) इस रीतिसे “ भूतले नीलो घटः ” इत्यादि शब्दोंसे शाब्दबोध
नहीं होता; क्योंकि घटादि पदोंका कार्यान्वित घटादिके बोधमें सामर्थ्य निश्चित है
और कार्यता बोधनमें केवल लिङादिकों काही सामर्थ्य है और “भूतले नीलो घटः”
इत्यादि स्थलमें कार्यताके बोधक लिङादिका अभाव है. इसलिये इत्यादि
१८६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
स्थलमें शाब्दबोध नहीं होता यह सब प्रभाकरका मन्तव्य है; ( तन्न ) सो
समीचीन नहीं है. प्रथम कालमें बालकको यद्यपि घटादिके आवापोद्वापद्वारा घटादि
पदोंकी कार्यान्वित घटादिमेंही शक्तिका ग्रहण होताहै; तथापि 'कार्यान्वितघ-
टशाब्दत्व' की अपेक्षासे केवल 'घटशाब्दत्व' को कार्य्यतावच्छेदक माननेमें
लाघव है. इसलिये पीछेसे कार्यान्वितघटादिमें शक्तिअवधारणका परित्याग करनाही
उचित है. ( अतएव ) कार्य्यताविषयक बोधके प्रति पदोंको कारणता है, इसीलिये
मैत्रके चैत्रके प्रति “चैत्र!पुत्रस्ते जातः ' कन्या ते गर्भिणी जाता-अर्थात् हे चैत्र!
तेरे घर पुत्र उत्पन्न हुआहै और कन्या तेरी गर्भिणी होगईहै” इत्यादि वाक्य उच्चारण
स्थलमें समीपवर्त्ति तीसरा पुरुष एकही वाक्य सुननेसे चैत्रके मुखकी प्रसन्नता तथा
मलिनताको देखकर चैत्रके सुख तथा दुःखका अनुमान करके उस सुख-दुःखकी
कारणता उस कालमें और किसीमें प्रतीत नहीं होती तो परिशेषसे मैत्रके उच्चारण
किये शब्दजन्यबोधमें कारणताका निर्धारण करके तादृशशाब्दबोधहेतुत्वेन उस
मैत्रोच्चरित शब्दहीको निश्चय करताहै. ( तथाच ) एवं “घटादिपदानां कार्यान्वि-
तघटादिबोध एव सामर्थ्यम्” इत्याकारक नियमका 'चैत्र पुत्रस्ते' इत्यादिस्थलमें
व्यभिचार होनेसे घटादिपदोंकी कार्यान्वित घटादिमें शक्ति माननी उचित नहीं.
शंका-“चैत्र पुत्रस्ते” इत्यादि वाक्यस्थलमें 'तं पश्य' इत्यादि क्रियापदके
अध्याहार करनेसे पूर्वोक्त व्यभिचार नहीं है. समाधान-इत्यादि अध्याहारमें
कोई प्रमाण नहीं है और “चैत्र पुत्रस्ते जातो मृतश्च” इत्यादि स्थलमें 'तं पश्य'
इत्यादि कार्य्यताके बोधक पदके अध्याहारकाभी असम्भव है. ( इत्थञ्च ) इस
रीतिसे लाघवसे यही कहना उचित है कि अन्वितघटमेंभी शक्तिग्रहको त्यागकर
केवल घटमात्रमें घटपदकी शक्तिका अवधारण समीपवर्त्ति बालकको होताहै ५ ।
एवं वाक्यशेषादपि शक्तिग्रहः । यथा। यवमयश्चरुर्भवतीत्यत्र
यवपदस्य दीर्घशूकविशेषे आर्याणां प्रयोगः, कङ्गौ च म्लेच्छानां,
तत्रहि “अथान्या ओषधयो म्लायन्ते अथैते मोद्मानास्तिष्ठन्ति”
उक्तं च“ वसन्ते सर्वशस्यानां जायते पत्रशातनम् । मोदमाना-
श्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः” इति वाक्यशेषाद्दीर्घशूके
शक्तिर्निर्णयते कङ्गौ, तु शक्तिभ्रमात्प्रयोगो नानाशक्तिकल्पने
गौरवात् । हरिपदादौ तु विनिगमकाभावान्नानाशक्तिकल्प-
नम् । ६ ।
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८७
भाषा-ऐसेही वाक्यशेषसेभी शब्दकी शक्तिका ग्रहण होताहै. जैसे ‘ यवमय-
श्रुर्भवति ’ इस वाक्यमें ( आर्य्य ) याजकलोग ‘ यव ’ पदकी दीर्घशूकवाले यव
विशेषमें शक्ति मानतेहैं और म्लेच्छलोग ‘ यव ’ पदसे ( कङ्गु ) कङ्गनीका ग्रहण
करतेहैं-ऐसा होनेसे ( तत्र हि ) “यवमयश्चरुर्भवति” इस स्थलमें सन्देह उत्पन्न
हुआ कि ‘ यव ’ पदसे जवोंका ग्रहण करना चाहिये या कङ्गनीका तो प्रकरणा-
न्तरमें ‘ अथान्या ओषधयः ’ इत्यादि वाक्यशेषसे अर्थात् वसन्तऋतुमें सब खेतीके
पत्र गिर जातेहैं परन्तु ( यव ) कणशशाली हुए अर्थात् दीर्घशूकविशिष्ट हुए प्रफुल्लित
खड़े रहतेहैं इत्यादि वाक्यशेषसे ‘यव’पदकी दीर्घशूकविशेषमें शक्तिका निर्धारण
होताहै. म्लेच्छोंका ‘यव’ पदसे कङ्गनीका ग्रहण करना शक्ति भ्रममूलक समझना
चाहिये. एक ‘ यव ’ पदकी कङ्गनी तथा दीर्घशूकविशिष्ट उभयमें शक्तिमाननीभी
उचित नहीं क्योंकि नानाशक्ति कल्पना करनेमें गौरव है और ‘ हरि ’ आदि
पदोंमें तो एकत्र शक्तिके नियमके अभाव होनेसे अनायत्या नानाशक्तिकी कल्पना
करनी पड़तीहै ६ ।
एवं विवरणादपि शक्तिग्रहः । विवरणं तु तत्समानार्थपदान्तरेण
तदर्थकथनम्।यथा घटोऽस्तीत्यस्य कलशोऽस्तीत्यनेन विवर-
णाद्घटपदस्य कलशे शक्तिग्रहः। एवं पचतीत्यस्य पाकं करोती-
त्यनेन विवरणादाख्यातस्य यत्नार्थकत्वं कल्प्यते । ७ ।
भाषा-ऐसेही विवरणसेभी शक्तिका ग्रहण होताहै; उसके समानार्थके कहनेवाले
पदान्तरसे उसी अर्थको कहनेका नाम विवरण है. जैसे किसीने किसीको ‘घटोऽस्ति’
यह कहा तो उसने न समझा तो फिर उसने समझानेके लिये उसी वाक्यका विवरण
किया कि ‘ कलशोऽस्ति ’ तब वह ‘ कलश ’ शब्दकी शक्तिको जानताही था-
विवरण सुनतेही प्रथम वाक्यका अर्थभी जानगया. ऐसेही ‘ पचति ’ इस पदका
‘ पाकं करोति ’ यह विवरण होनेसे आख्यातमें प्रयत्नवाचकत्वकी कल्पना
होसकती है ७।
एवं प्रसिद्धपदस्य सान्निध्यादपि शक्तिग्रहः । यथेह सहकारतरौ
मधुरं पिको रौतीत्यादौ पिकपदस्य कोकिले शक्तिग्रह इति ।८।
भाषा-ऐसेही प्रसिद्धार्थक पदकी सन्निधिसेभी पदकी शक्तिका ग्रहण होताहै-
जैसे किसीने कहा कि-“ इह सहकारतरौ मधुरं पिको रौति-अर्थात् इस आम्रके
पेड़पर कोकिला मीठा २ बोल रही है ” तो ऐसे स्थलमें ‘पिक’पदसे विना सभी
१८८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
पदोंके अर्थके जाननेवाले पुरुषको ( सहकार ) आम्रादि पदोंकी सहकारतासे 'पिक'
पदकी शक्ति कोकिला नामक पक्षीविशेषमें स्वयं ग्रहण होजातीहै-इति ८ ।
तत्र जातावेव शक्तिर्न तु व्यक्तौ, व्यभिचारादानन्त्याच्च। व्यक्तिं
विना च जातिभानस्यासम्भवाद्यक्तेरपि भानमिति केचित् ।
तन्न। शक्तिं विना व्यक्तिभानानुपपत्तेः ।
भाषा-( तत्र ) उसमेंभी मीमांसक लोग यह कहतेहैं कि-घटादिपदोंकी घट-
त्वादिजातिहीमें शक्ति है, किन्तु कम्बुग्रीवादिमद्व्यक्तिमें नहीं. उसमें कारण यह है
कि, व्यक्तिमें शक्तिग्रहणका व्यभिचार है अर्थात् जिस व्यक्तिमें शक्ति ग्रहण नहींभी
करी वहांभी शाब्दबोधका उदय होताहै; परन्तु वहां शाब्दबोध कारणीभूत शक्तिज्ञान
नहीं है इसलिये व्यभिचार है और यदि जातिमें शक्ति स्वीकार करें तो व्यभिचार
नहीं है; क्योंकि जात्या वहांभी शक्ति गृहीत हो चुकी है और व्यक्तियां अनन्त हैं
इसलिये प्रत्येक व्यक्तिमें शक्ति माननेमें गौरवभी है और व्यक्तिसे विना केवल
जातिका भान तो होही नहीं सकता किन्तु जातिभासक सामग्रीही व्यक्तिका भास-
कभी माननी होगी; इसलिये व्यक्तिका भान तो अर्थसेही सिद्ध है; उसमें शक्ति मान
नेकी कोई आवश्यकता नहीं है. यह सब मीमांसकका मन्तव्य है । ( तन्न ) सो
समीचीन नहीं है; क्योंकि यदि व्यक्तिमें पदकी शक्ति न होय तो व्यक्तिका भान
नहीं हुआ चाहिये.
न च व्यक्तौ लक्षणा। अनुपपत्तिप्रतिसन्धानं विनापिव्यक्तिबोधात्।
न च व्यक्तिशक्तावानन्त्यम्, सकलव्यक्तावेकस्या एव शक्तेः स्वी-
कारात् । नचाननुगमः, गोत्वादेरेवानुगमकत्वात् ।
शंका-हम व्यक्तिमें लक्षणा मानलेंगे. समाधान-लक्षणा वहां मानी जातीहै.
जहां किसीतरहकी अनुपपत्ति होय और व्यक्तिमें तो किसीतरहकी अनुपपत्तिभी
दीखनहीं पड़ती. यहां लक्षणा माननेका कौन प्रयोजन है? शंका-व्यक्तिमें शक्ति
माननेमें गौरव तो है; क्योंकि व्यक्तियां अनन्त हैं इसलिये शक्तियांभी अनन्तही माननी
पड़ेंगी.समाधान-यावत् व्यक्तियोंमें हम एकही शक्तिका स्वीकार करतेहैं इसलिये
गौरव नहीं है.शंका-घटपटादि व्यक्ति योंको अननुगत होनेसे विषयतासम्बन्धसे शक्ति
ज्ञान कारणतामें अवच्छेदकत्वधर्मका अभावरूप अननुगम होगा. समाधान-
गोत्वघटत्वादि धर्मोंसे अनुगम होसक्ताहै अर्थात् गोव्यक्तिविषयक शाब्दबोधके प्रति
गोत्वविशिष्टविषयक शक्तिज्ञानत्वेन कारणताके होनेसे अननुगमरूप दोष नहीं है.
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८९
किंच गौः शक्येति शक्तिग्रहो यदि तदा व्यक्तौ शक्तिः, यदि तु
गोत्वं शक्यमिति शक्तिग्रहः तदा गोत्वप्रकारकपदार्थस्मरणं शा-
ब्दबोधश्च न स्यात्, समानप्रकारकत्वेन शक्तिज्ञानस्य पदार्थ-
स्मरणं शाब्दबोधं प्रति च हेतुत्वात् ।
भाषा-( किञ्च ) यदि “गौः गोपदशक्यः” इत्याकारक शक्तिज्ञान हुआ है
तो व्यक्तिहीमें शक्ति अनुभवसिद्ध है और यह विशिष्टज्ञान प्रमात्मकभी होसकताहै
क्योंकि आपके सिद्धान्तमें अन्यथा ख्यातिका अस्वीकार है और यदि “गोत्वं गोपा-
दशक्यम्” इत्याकारक शक्तिज्ञान हुआहै तो गोपदसे गोत्वप्रकारक पदार्थका अर्थात्
गोव्यक्तिका स्मरण तथा गोत्वप्रकारक गोविशेष्यक शाब्दबोधका उदय नहीं होना
चाहिये; क्योंकि यह नियमहै कि-यत्प्रकारक यद्विशेष्यक शब्दशक्तिका ग्रहण हुआहै
वह शब्दशक्तिग्रह तत्प्रकारक पदार्थस्मरणके प्रति तथा तत्प्रकारक तद्विशेष्यक
शाब्दबोधके प्रति कारण होताहै.
किंच गोत्वे यदि शक्तिस्तदा गोत्वत्वं शक्यतावच्छेदकं वाच्यम्,
गोत्वत्वं तु गवेतरासमवेतत्वे सति सकलगोसमवेतत्वं तथा च
गोव्यक्तीनां शक्यतावच्छेदकेऽनुप्रवेशात्तत्रैव गौरवम् ।
भाषा-( किञ्च ) यदि गोपदकी ( गोत्व ) जातिहीमें शक्ति मान लीजाय तो
शक्यतावच्छेदक धर्म गोत्वके सिरपर गोत्वत्वही कहना होगा. फिर वह गोत्वत्वंभी
‘किमाकारक’ है? ऐसी जिज्ञासावाले पुरुषको “गवेतरासमवेतत्वे सति सकलगोस-
मवेतत्वं--अर्थात् गोव्यक्तिसे इतर व्यक्तियोंमें असमवेत होना और केवल गोव्यक्तिमात्र
में समवेत होनाही गोत्वमें गोत्वत्व है” यही उत्तर कहना होगा.(तथाच) इस कथनसे
गोव्यक्तियोंकाभी शक्यतावच्छेदक कोटिमें प्रवेश होनेसे तथा शाब्दबोधकी कारणतावच्छे-
दककोटिमें प्रवेश होनेसे आपहीको गौरव होगा.
तस्मात्तत्तज्जात्याकृतिविशिष्टतत्तद्व्यक्तिबोधानुपपत्त्या कल्प्य-
माना शक्तिर्जात्याकृतिविशिष्टव्यक्तौ विश्राम्यतीति ।
भाषा-(तस्मात्) इसलिये केवल जातिमें या (आकृति) अवयवसंस्थानमें या
व्यक्तिमात्रमें शक्ति माननेसे (तत्तत्) उस २ गोत्वादिजाति तथा (तत्तत्)
उस २ शृङ्गशासनादि अवयवसंस्थानविशिष्ट (तत्तत्) उस २ गोआदि व्यक्तियोंके
बोधकी अनुपपत्ति होनेसे बुद्धिपूर्वक शक्तिकी कल्पना जात्याकृतिविशिष्ट व्यक्तिमें
विश्रान्त होतीहै-इति ।
१९० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
शक्तं पदम् । तच्चतुर्विधम् । क्वचिद्यौगिकं, क्वचिद्रूढं, क्वचिद्यो-
गरूढं क्वचिद्यौगिकरूढम् ।
भाषा-वाचकतासम्बन्धसे शक्तिविशिष्टका नाम 'पद' है; वह चार प्रकारका है
कहीं यौगिक है १, कहीं रूढ है २, कहीं योगरूढ है ३, और कहीं यौगिकरूढहै ४.
यत्रावयवार्थ एव बुध्यते तद्यौगिकम्, यथा पाचकादिपदम् । १ ।
भाषा-जो अपने अवयवोंसे स्वार्थका बोधक हो वह 'यौगिक' पद है; ऐसे पाचक
पाठकादि अनन्त पद हैं " पचतीति पाचकः" यहां 'पच' धातु कर्तामें 'ण्वुल
प्रत्ययका विधान है, एवं "पठतीति पाठकः" यहां 'पठ' धातु कर्तामें 'ण्वुल'
प्रत्ययका विधान है. एवं पाकक्रिया करनेवालेका नाम 'पाचक' तथा पाठक्रिया
करनेवालेका नाम 'पाठक' शब्दके अवयवोंहीसे लाभ हुआ १ ।
यत्रावयवशक्तितैरपेक्ष्येण समुदायशक्तिमात्रेण बुध्यते तद्रूढम्,
यथा गोमण्डलादिपदम् । २ ।
भाषा-जो अवयवशक्तिकी अपेक्षासे विना समुदाय शक्तिसे स्वार्थका बोधक हो
वह रूढ पद है, ऐसे 'गोमण्डलादि' अनन्त पद हैं अर्थात् यहां 'गो' पदकी समु-
दायशक्ति गौव्यक्तिमें है और मंडलपदकी समुदायशक्ति सूर्यादिरोधक कुण्डलाकार
परिवारादिमें है, एवं यहां समुदायशक्तिसे शाब्दबोध होताहै, इसलिये अवयवशक्ति
विचारकी कुछ आवश्यकता नहीं है. २ ।
यत्र त्ववयवशक्तिविषये समुदायशक्तिरप्यस्ति तद्योगरूढम्,
यथा पङ्कजादिपदम् । तथाहि । पङ्कजपदमवयवशक्त्या पङ्क-
जनिकर्तृत्वरूपमर्थं बोधयति,समुदायशक्त्या च पद्मत्वेन रूपेण
पद्मं बोधयति।न च केवलावयवशक्त्या कुमुदे प्रयोगः स्यादिति
वाच्यम् । रूढिज्ञानस्य केवलयौगिकार्थज्ञाने प्रतिबन्धकत्वादिति
प्राञ्चः ।
भाषा-एवं जो पद अवयव तथा समुदाय उभयशक्तिद्वारा स्वार्थका बोधक
हो वह 'योगरूढ' है, ऐसे पंकजादि पद हैं. ( तथाहि ) वह ऐसे है कि--एकही
'पंकज' पद अपनी " पंकात् जायते इति पंकजः" इत्याकारक अवयवशक्तिसे
पंकसे उत्पन्न होनेवाली वस्तुको कहता है और समुदायशक्तिसे पद्मत्वेन रूपेण
( पद्म ) कमलका बोधक है. शंका-केवल अवयवशक्तिहीसे यदि 'पंकज' पदका
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९१
( कुमुद ) श्वेतउत्पलमें प्रयोग मान लिया जाय तो हानि क्या है ? समाधान-
ऐसे स्थलमें प्राचीन लोग रूढिज्ञानको केवल यौगिकार्थज्ञानके प्रति प्रतिबन्धक
मानतेहैं; इसलिये अवयवशक्तिसे 'पंकज' पदका श्वेतोत्पलमें प्रयोग मानना उचित नहीं.
वस्तुतस्तु समुदायशक्त्योपस्थितपद्मेऽवयवार्थपङ्कजनिकर्तु-
रन्वयो भवति सान्निध्यात्। यत्र रूढ्यर्थस्य बाधः प्रतिसन्धीयते
तत्र लक्षणया कुमुदादेर्बोधः, यत्र तु कुमुदत्वेन रूपेण बोधे न
तात्पर्यज्ञानं पद्मत्वस्य च बाधस्तत्रावयवशक्तमात्रेण निर्वाह
इत्यप्याहुः। यत्र तु स्थलपद्मादावयवार्थबाधस्तत्र समुदा-
यशक्त्या पद्मत्वेन रूपेण बोधः । यदि तु स्थलपङ्कजं वि-
जातीयमेव तदा लक्षणैव । ३ ।
भाषा-और वास्तवमें तो यह वार्ता है कि-समुदायशक्तिद्वारा उपस्थित हुए
पद्ममें अवयवार्थ पंकसे उत्पन्न होनेवालेका सान्निध्यसे अन्वय होता है. भाव यह
कि- अवयवशक्तिसेभी प्रथम समुदायशक्तिद्वारा उपस्थितवस्तुहीका लाभ होता है
और जिस स्थलमें रूढिशक्तिसे अर्थका बाध प्रतीत होवे अर्थात् अर्थ न बन सके
वहां लक्षणावृत्तिसे कुमुदादि बोधमेंही वक्ताका तात्पर्य जानना उचित है और
जहां कुमुदत्वेन रूपेण कुमुदके बोधमें वक्ताका तात्पर्य ज्ञान नहीं है और पद्मत्वेन
रूपेण पद्मका जहां बाध प्रतीत होरहाहै वहां केवल अवयवशक्ति मात्रहीसे निर्वाह
करना उचित है. ऐसेभी कहतेहैं जहां कहीं ( स्थल ) सूकीभूमिमें उत्पन्न हुए पद्म
आदिमें 'पङ्कज' शब्दके अवयवार्थका बाध प्रतीत हो वहां समुदायशक्तिहीसे पद्म-
त्वेन रूपेण पद्मका बोध होताहै और यदि स्थलमें होनेवाला पद्म जलमें उत्पन्न
हुए पद्मसे विलक्षण अभिमत होय तौ उसमें ' पङ्कज ' पदकी लक्षणाही माननी
उचित है ३।
यत्रावयवार्थरूढ्यर्थयोः स्वातन्त्र्येण बोधस्तद्यौगिकरूढम्,
यथोद्भिदादिपदम् । तत्र हि उद्भेदनकर्ता तरुगुल्मादिरपि बु-
ध्यते यागविशेषोऽपीति । ४ ।
भाषा-एवं जिससे अवयवार्थका तथा रूढ्यर्थका स्वतन्त्ररूपसे बोध हो अर्थात्
वस्तुविशेषको अवयवशक्तिसे तथा अन्यवस्तुविशेषको समुदायशक्तिसे बोधन करै
वह पद ' यौगिकरूढ ' है; ऐसे उद्भिद आदि पद हैं. यह ' उद्भिद ' पद “ ऊर्द्धं
भिन्नत्ति इति उद्भिद् ” इस व्युत्पत्तिसे अवयवशक्तिद्वारा ( तरुगुल्म ) वृक्षलतादि
का बोधक है और समुदायशक्तिसे उद्भिद नामक यागकाभी बोधक है-इति ४ ।
१९२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
लक्षणा शक्यसम्बन्धस्तात्पर्यानुपपत्तितः ॥ ८२ ॥
भाषा-शक्यके सम्बन्धविशेषका नाम लक्षणा है और तात्पर्यानुपपत्ति लक्ष-
णमें बीज है ॥ ८२ ॥
लक्षणा शक्यसम्बन्धः इत्यादि । गङ्गायां घोष इत्यादौ गङ्गाप-
दस्य शक्यार्थे प्रवाहरूपे घोषस्यान्वयानुपपत्तिस्तात्पर्यानुपप-
त्तिर्वा यत्र प्रतिसन्धीयते तत्र लक्षणया तीरस्य बोधः ।
भाषा-“जहत्स्वार्था अजहत्स्वार्था भेदसे लक्षणा दो प्रकारकी है. उसमें प्रथम
कहतेहैं-“ गंगायां घोषः” इत्यादि वाक्यस्थलमें गंगापदके शक्यार्थ प्रवाहमें
(घोष) पदार्थ गोपालग्रामका अन्वय नहीं होसकता और घोष पदार्थ गोपाल
ग्रामका गंगापदके शक्यार्थ प्रवाहमें अन्वय करनेसे वक्ताका तात्पर्य्यभी नहीं बन
सकता; क्योंकि जलप्रवाहमें गोपालग्रामकी स्थितिकाही असम्भव है; इसलिये
“ गंगायां घोषः” इस वाक्यमें 'गंगा' पद स्वशक्यार्थ प्रवाहके तीरमें लाक्षणिक
है. परम्परा सम्बन्धसे स्वार्थबोधन करनेवाला पद लाक्षणिक होता है प्रकृतमें
स्वशक्य संयोगरूप 'गंगा' पदका तीरसे परम्परासम्बन्ध है; इसलिये 'गंगा'
पद लाक्षणिक है. ऐसे स्थलमें लक्षणावृत्तिहीसे तीरका बोध होता है.
सा च शक्यसम्बन्धरूपाः। तथाहि। प्रवाहरूपशक्यार्थसम्बन्धस्य
तीरे गृहीतत्वात्तीरस्य स्मरणं, ततः शाब्दबोधः । परंतु यद्य-
न्वयानुपपत्तिर्लक्षणाबीजं स्यात्तदा यष्टीः प्रवेशयेत्यत्र लक्षणा न
स्यात्, यष्टिषु प्रवेशान्वयस्यानुपपत्तेरभावात् , तत्र च यष्टिप्र-
वेशे भोजनतात्पर्यानुपपत्त्या यष्टिधरेषु लक्षणा ।
भाषा-वह लक्षणा शक्यका सम्बन्धरूप होती है. (तथाहि) वह ऐसे है कि-
प्रवाहरूप जो शक्यार्थ उसका संयोगसम्बन्ध तीरके साथ गृहीतही एव है. 'गंगा'
पदसे गंगातीरका स्मरण हुआ. तदनन्तर 'गंगातीरे घोषः' यह शाब्दबोध हुआ
परन्तु हरएक स्थलमें यदि अन्वयानुपपत्तिही लक्षणाका बीज मान लिया जाय
तो 'यष्टीः प्रवेशय' इत्यादि स्थलमें लक्षणा नहीं होनी चाहिये; क्योंकि (यष्टि)
लाठियोंमें प्रवेशरूप अन्वयकी अनुपपत्ति नहीं है अर्थात् केवल लाठियोंका प्रवेशभी
गृहमें बनसकता है परन्तु कहनेवालेने भोजनके तात्पर्य्यसे यष्टियोंके प्रवेशकी आज्ञा
करी है. एवं केवल लाठियोंके प्रवेशसे भोजनरूप तात्पर्य्यकी अनुपपत्ति होनेसे
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९३
‘ यष्टि ’ पदकी यष्टिधरमें लक्षणा करनी चाहिये अर्थात् वक्ता अपने भृत्यविशेषको
यह कहता है कि, लाठीवाले साधुओंको भोजन जिमानेके लिये गृहके भीतर
लेजाओ इत्यादि. औरभी अनेक उदाहरणस्थल जहत्स्वार्थाके होसकतेहैं.
एवं काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यादौ काकपदस्य दध्युपघातके
लक्षणा सर्वतो दधिरक्षायास्तात्पर्यविषयत्वात् । एवं छत्रिणो
यान्तीत्यादौ छत्रिपदस्यैकसार्थवाहित्वे लक्षणा । इयमेवाजह-
त्स्वार्था लक्षणेत्युच्यते, एकसार्थवाहित्वेन रूपेण छत्रित-
दन्ययोर्बोधात् ।
भाषा-एवं “ काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्, छत्रिणो यान्ति ” इत्यादि स्थलोंमें
‘ अजहत्स्वार्था लक्षणा ’ है. यहां ‘ काक ’ पदकी दधिके विघातक बिडालादि
जीवमात्रमें लक्षणा है; क्योंकि यहां वक्ताका भृत्यादिके प्रति कहनेका तात्पर्य यह
है कि-“ दधि रखना; काक या और कोई जीव दधिको भक्षण न करजावे ” इति ।
एवं ‘ छत्रिणो यान्ति ’ इस स्थलमेंभी ‘ छत्रि ’ पदकी एकसार्थवाहित्व विशिष्टमें
अर्थात् एकसाथ चलनेवाले पुरुषमात्रमें लक्षणा है; क्योंकि यहांभी छातेवाले पुरुषका
तथा उनके साथियोंका एकसार्थवाहित्वेन रूपेण बोध होताहै.
यदि चान्वयानुपपत्तिर्लक्षणाबीजं स्यात्तदा कचिद्गङ्गापदस्य
तीरे कचिद्घोषपदस्य मत्स्यादौ लक्षणेति नियमो न
स्यात् ।
भाषा-लक्षणास्थलमें यह नियम है कि-जिस स्थलमें जो पद वक्ताने जिस
अर्थबोधनके तात्पर्यसे उच्चारण किया है, वह पद उसी अर्थमें अवश्य लाक्षणिक
होता है, परन्तु यदि अन्वयानुपपत्ति लक्षणाका बीज मान लिया जाय तो कहीं
‘ गंगा ’ पदकी तीरमें और कहीं ‘ घोष ’ पदकी मत्स्यादि जलजीवोंमें लक्षणा नहीं
होनी चाहिये; क्योंकि ‘ गंगा ’ पदका तीरमें तात्पर्यग्रह स्थलमें एवं घोषपदका
मत्स्यादिमें तात्पर्यग्रह स्थलमें घोषकी तीरमें तथा मत्स्यादिकोंकी प्रवाहमें अन्व-
यानुपपत्ति नहीं है.
इदं तु बोध्यम् । शक्यार्थसम्बन्धो यदि तीरत्वेन रूपेण गृहीत-
स्तदा तीरत्वेन तीरबोधः, यदि तु गङ्गातीरत्वेन रूपेण गृही-
तस्तदा तेनैव रूपेण स्मरणम् ।
१६
१९४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ श० -
भाषा-( इदन्तु बोध्यम् ) यहभी यहां जानने योग्य है कि-शक्यार्थ प्रवाहका
सम्बन्ध यदि तीरत्वेन रूपेण तीरके साथ ग्रहण हुआ है तो शाब्दबोधभी तीरत्वेन
रूपेण तीरहीका होगा और यदि गंगातीरत्वेन रूपेण तीरका सम्बन्ध गृहीत हुआहै
तो शाब्दबोधभी गंगातीरत्वेन रूपेणही होगा.
अत एव लक्ष्यतावच्छेदके न लक्षणा, तत्प्रकारकबोधस्य तत्र
लक्षणां विनाऽप्युपपत्तेः । परं त्वेवं क्रमेण शक्यतावच्छेदकेऽपि
शक्तिर्न स्यात्, तत्प्रकारक शक्यार्थस्मरणं प्रति तत्पदस्य साम-
र्थ्यमित्यस्य सुवचत्वादिति विभावनीयम् ।
भाषा-( अतएव ) तद्धर्मविशिष्टमें लक्षणा ग्रहणको तिसी रूपसे पदार्थउप-
स्थिति तथा शाब्दबोधके प्रति हेतुता होनेहीसे लक्षतावच्छेदकतीरत्वादि धर्मोंमेंभी
लक्षणा माननेका कुछ काम नहीं; क्योंकि तीरत्वादि धर्मप्रकारक तीरविशेष्यक बोध
लक्षणासे विनाभी ऐसे स्थलमें उत्पन्न होसकताहै; परन्तु इसी क्रमसे शक्यतावच्छे-
दकमेंभी शक्ति नहीं माननी चाहिये; क्योंकि लक्षणास्थलकी तरह यहांभी “ तत्
घटत्वादिप्रकारक शब्दार्थ घटादिस्मरणके प्रति ( तत् ) घटादिपदका सामर्थ्य है ”
इत्याकारक नियम सुवच होसकताहै, परन्तु आचार्य्यलोगोंने लक्षतावच्छेदकमें
लक्षणाको नहीं माना और शक्यतावच्छेदकमें शक्तिको मानाहै इसका क्या कारण
है ? ( इति विभावनीयम् ) यह वार्ता विद्वान् लोगोंको विचारणीय है. जहत्स्वार्थल
क्षणाहीका भेद एक लक्षितलक्षणानामसे प्रसिद्ध है.
यत्र तु शक्यार्थस्य परम्परासम्बन्धरूपा लक्षणा सा लक्षितलक्ष-
णेत्युच्यते । यथा द्विरेफादिपदे रेफद्वयसम्बन्धो भ्रमरपदे ज्ञायते
भ्रमरपदस्य च सम्बन्धो भ्रमरे ज्ञायते तत्र लक्षितलक्षणा ।
भाषा-जिस स्थलमें शक्यार्थका परंपरासम्बन्धरूपा लक्षणा है वह लक्षितल-
क्षणा कही जातीहै. जैसे “ द्विरेफो रौति ” इस स्थलमें द्विरेफादि पदमें रेफद्वयका
सम्बन्ध ‘ भ्रमर ’ इस पदमें जाना जाताहै और ‘ भ्रमर ’ पदका सम्बन्ध ( भ्रमर )
मधुपजन्तुमें जाना जाताहै; ऐसे स्थलमें लक्षितलक्षणा होतीहै. “ द्विरेफो रौति ”
इत्यादि स्थलमें ‘ स्ववाच्यरेफद्वयघटितपदवाच्यत्व ’ आदिरूप परम्परासम्बन्ध है.
किंतु लाक्षणिकं पदं नानुभावकं लाक्षणिकार्थस्य शाब्दबोधे
तु पदान्तरं कारणम्, शक्तिलक्षणान्यतरसम्बन्धेनेतरपदार्थान्वि-
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९५
तस्स्वशक्यार्थशाब्दबोधं प्रति पदानां सामर्थ्यावधारणात् । वाक्ये
तु शक्तेरभावाच्छक्यसम्बन्धरूपा लक्षणाऽपि नास्ति ।
भाषा-( किन्तु ) परन्तु ‘ लाक्षणिक ’ पद ( अनुभावक ) शाब्दबोधका जनक
नहीं है किन्तु लाक्षणिकार्थके शाब्दबोधमें ( पदान्तर ) घोषादि पदान्तर कारण हैं;
क्योंकि शक्तिसम्बन्धसे या लक्षणासम्बन्धसे उपस्थित जो ( इतरपदार्थ ) तीरादि
उस तीरादिके साथ अन्वित जो ( स्व ) घोषादिपद शक्यार्थ गोपालग्राम तादृश
तीराद्यन्वित गोपालग्रामविषयक शाब्दबोधके प्रति ( पदानां ) घोषादि पदोंका
सामर्थ्य निश्चय होताहै; शक्तपदही होताहै; वाक्य नहीं होता. इसलिये वाक्यमें
शक्तिका अभाव होनेसे शक्यसम्बन्धरूपा लक्षणाभी वाक्यमें नहीं है.
यत्र गंभीरायां नद्यां घोष इत्युक्तं तत्र नदीपदस्य नदीतीरे लक्ष-
णा , गंभीरापदार्थस्य नद्या सहाभेदेनान्वयः क्वचिदेकदेशान्व-
यस्यापि स्वीकृतत्वात् ।
शंका-“ गम्भीरायां नद्यां घोषः ” इत्यादि वाक्यस्थलमें ‘ नदी ’ पदकी
नदीतीरमें लक्षणा माननेसे गम्भीरपदार्थका नदीरूप पदार्थके एकदेशके साथ
अन्वय मानना होगा अर्थात् नदीपदबोध्य जो ‘ नदीतीर ’ उसका एकदेश जो नदी
उसके साथ'गम्भीर'पदका अन्वय मानना होगा, परन्तु ऐसा माननेसे“पदार्थः पदार्थेना-
न्वेति न तु पदार्थैकदेशेन ” इस नियमके साथ विरोध होताहै और “ नीलो घटः ”
इत्यादि स्थलोंमें नीलपदार्थका घटपदार्थ एकदेश घटत्वादिमें अन्वय बोधवारणार्थ इस
नियमका माननाभी आवश्यक है; इसलिये “ गम्भीरायां नद्यां घोषः” इत्यादिस्थलमें
पदलक्षणाका असम्भव होनेसे वाक्यलक्षणाही माननी उचित है. समाधान-
“ गम्भीरायां नद्यां घोषः ” इत्यादि स्थलमें केवल ‘ नदी ’ पदकी नदीतीरमें लक्षणा
है और गम्भीरपदार्थका नदीके साथ अभेदान्वय है अर्थात् गम्भीराभिन्न जो नदी
तादृश नदीतीरमें घोष है; यह बोध हुआ. ( क्वचित् ) “ चैत्रस्य गुरुकुलम् ” इत्यादि
स्थलविशेषोंमें एकदेशअन्वयभी विद्वान् लोगोंके अभिमत है. यहां चैत्रोत्तरवर्त्ति षष्ठ्य-
र्थसम्बन्धका गुरुके साथ अन्वय है.
यदि तत्रैकदेशान्वयो न स्वीक्रियते तदा नदीपदस्य गंभीरनदी-
तीरे लक्षणा गंभीरापदं तात्पर्यग्राहकम् । बहुव्रीहावप्येवम् ।
तत्र हि चित्रगुपदादौ यद्येकदेशान्वयः स्वीक्रियते तदा गोपदस्य
१९६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
गोस्वामिनि लक्षणा गवि चित्राभेदान्वयः । यदि त्वेकदेशान्वयो
न स्वीक्रियते तदा गोपदस्य चित्रगोस्वामिनि लक्षणा चित्रपदं
तात्पर्यग्राहकम् ।
भाषा-परन्तु यदि यहां एकदेशान्वय न स्वीकार होय तो “ गम्भीरायां नद्यां
घोषः” इत्यादि स्थलमें 'नदी' पदकी गम्भीरनदीतीरमें लक्षणा करनी और 'गम्भीर'
पदको “ नदीपदं गम्भीरनदीतीरविषयकबोधजनकं भवतु ” इत्याकारक वक्ताकी
इच्छारूप जो तात्पर्य तादृश तात्पर्यका ग्राहक है. ऐसेही बहुव्रीहिसमासस्थलमेंभी
वाक्यके अवयवहीमें लक्षणा माननी उचित है. “ चित्रा गावो यस्यासौ चित्रगुः ”
इत्यादि बहुव्रीहिस्थलमें यदि एकदेशान्वय स्वीकृत होय तो 'गो'पदकी गैयोंके स्वामीमें
लक्षणा करनी और 'चित्रा'पदार्थका गोपदार्थके साथ अभेदान्वय करना परन्तु यदि
एकदेशान्वय न अभिमत होय तो गोपदकी चित्रगैयोंके स्वामीमें लक्षणा करनी और
‘ चित्र ’ पदको पूर्वोक्त रीतिसे वक्तृतात्पर्यका ग्राहक समझना.
एवमारूढवानरो वृक्ष इत्यत्र वानरपदस्य वानरावेशकर्मणि लक्ष-
णा, आरूढपदं च तात्पर्यग्राहकम् । एवमन्यत्रापि ।
भाषा-ऐसेही “ आरूढो वानरोऽयमसौ आरूढवानरो वृक्षः ” इत्यादि स्थलमें
'वानर' पदकी वानरके आरोहणरूप कर्ममें लक्षणा करनी और पूर्वोक्तरीतिसे 'आरूढ'
पद वक्तृतात्पर्यका ग्राहक समझना यही क्रम और और प्रयोग स्थलोंमेंभी जानलेना.
तत्पुरुषे तु पूर्वपदे लक्षणा । तथाहि । राजपुरुषादिपदे राज-
पदार्थेन पुरुषादिपदार्थस्य साक्षान्नान्वयो निपातातिरिक्तनामार्थ-
योर्भेदेनान्वयबोधस्याव्युत्पन्नत्वात्, अन्यथा राजा पुरुष इत्य-
त्रापि तथाऽन्वयबोधः स्यात् ।
भाषा-एवं तत्पुरुष समासस्थलमें पूर्वपदमें लक्षणा होतीहै अर्थात् पूर्वपद लाक्षणिक
होताहै. (तथाहि) जैसे “ राज्ञः पुरुषः राजपुरुषः ” इत्यादि षष्ठीतत्पुरुष समासस्थलमें
राजपदार्थके साथ पुरुषपदार्थका साक्षात् सम्बन्धसे अन्वय नहीं है;क्योंकि अव्ययनि-
पातातिरिक्त नामार्थ नामार्थोंका भेद सम्बन्धसे अन्वय बोध (अव्युत्पन्न) असिद्ध है;
( अन्यथा ) यदि अव्ययनिपातातिरिक्त नामार्थ नामार्थोंकाभी भेद सम्बन्धसे अन्वय-
बोध मानलिया जाय तो “ राजा पुरुषः ” इत्यादि स्थलोंमेंभी भेदसम्बन्धसे अन्व-
यबोध होना चाहिये.
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९७
पटो न घट इत्यादौ घटपटाभ्यां नञः साक्षादेवान्वयान्निपाता-
तिरिक्तेति नीलो घट इत्यादौ नामार्थयोरभेदसम्बन्धेनान्वया-
द्भेदेनेति ।
भाषा-“घटो न पटः” इत्यादि स्थलमें घटपटके साथ नञ् अर्थभेदका साक्षात् ही
अन्वय होताहै अर्थात् किसीप्रत्ययार्थके द्वारा नहीं होता; इसलिये नियममें निपाता-
तिरिक्त कहा. नञ् निपात है, इसीसे इसके योगसे भेदेन अन्वयबोध होसकताहै. परन्तु
निपातातिरिक्त नामार्थ नामार्थोंका भेदसम्बन्धसे अन्वयबोध नहीं होसकता “नीलो
घटः ” इत्यादि स्थलोंमें नामार्थनामार्थोंका अभेदसम्बन्धसे अन्वय होताहै; इसलिये
नियममें भेदेन कहा अर्थात् निपातातिरिक्त नामार्थनामार्थका अभेदेन अन्वयबोध तो
सिद्धही है परन्तु भेदसम्बन्धसे अन्वयबोध अव्युत्पन्न है “एवं राजपुरुषः” इत्यादि-
स्थलमेंभी निपातातिरिक्त नामार्थोंकी उपस्थिति होती है. यहांभी भेदेन अन्वयबोध
नहीं होसकेगा और अभेदेन विवक्षित नहींहै इसलिये कोई उपायान्तर सोचना चाहिये.
न च राजपुरुष इत्यादौ लुप्तविभक्तेः स्मरणं कल्प्यमिति वाच्य-
म् । अस्मृतविभक्तेरपि ततो बोधोदयात् । तस्माद्राजपदादौ
राजसम्बन्धिनि लक्षणा, तस्य च पुरुषेण सहाभेदान्वयः ।
द्वन्द्वे तु धवखदिरौ छिन्धीत्यादौ धवः खदिरश्च विभक्त्यर्थद्वि-
त्वप्रकारेण बुध्यते तत्र न लक्षणा ।
शंका-“राजपुरुषः” इत्यादिस्थलमें राजपदोत्तरवर्त्ति लुप्त हुई षष्ठीविभक्तिके
स्मरणकी कल्पना कर उस विभक्तिके सम्बन्धादि अर्थद्वाराही राजाका तथा पुरुषका
परस्पर अन्वय होगा इसलिये पूर्वोक्त नियमके साथ विरोध नहींहै. समाधान-जिस
पुरुषको विभक्तिका स्मरण नहींभी होता अर्थात् प्रकृतिप्रत्ययानभिज्ञ पुरुषकोभी
(ततो) “राजपुरुषः” इत्यादि वाक्यसे शाब्दबोधका उदय होना अनुभवसिद्ध है.
(तस्मात्) इसलिये‘राजपुरुषः’ इत्यादिस्थलोंमें राजादि पदोंकी राजसम्बन्धिमें लक्षणा
मानके उस सम्बन्धीका पुरुषके साथ अभेदान्वय बोध माननाही उचित है.
“एवं राजसम्बन्ध्यभिन्नः पुरुषः” इत्याकारक शाब्दबोध होगा. एवं “धवखदि-
रौ च्छिन्धि” इत्यादि इतरेतरद्वन्द्वस्थलमें द्वितीयाविभक्तिके द्विवचनार्थ द्वित्वप्रकारसे
धव तथा खदिर दोनोंका बोध होताहै इसलिये वहां लक्षणा माननेकी अवश्य-
कता नहीं है.
१९८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
न च साहित्ये लक्षणीति वाच्यम् । साहित्यशून्ययोरपि द्वन्द्वद-
र्शनात् ।
मीमांसक-धव खदिर उभयमें रहनेवाला जो सहवृत्तित्वरूप साहित्य उस
साहित्यके आश्रयमें यदि 'खदिर' पदकी लक्षणा मान लीजाय तो हानि क्या है?
समाधान-सहवृत्तित्वरूप साहित्यसे शून्य हिम विन्ध्यादिपदार्थोंकाभी " हिम
विन्ध्यौ " इत्याकारक ऐतरेतरयोगरूप द्वन्द्व देखा जाताहै इसलिये द्वन्द्वस्थलमें
उत्तरपदकी साहित्याश्रयमें लक्षणा माननी उचित नहीं है.
न चैकक्रियान्वयित्वरूपं साहित्यमस्तीति वाच्यम्।क्रियाभेदेपि
धवखदिरौ पश्य छिन्धीत्यादिदर्शनात् साहित्यस्याननुभवाच्च ।
तस्मात् साहित्यादिकं नार्थः । अतएव राजपुरोहितौ सायुज्य-
कामौ यजेयातामित्यत्र लक्षणाभावाद्द्वन्द्व आश्रीयते तस्मात्सा-
हित्यंनार्थः । किंतु वास्तवो भेदो यत्र तत्र द्वन्द्वः ।
शंका-हम सहवृत्तित्वरूप साहित्यके तात्पर्यसे यहां लक्षणा नहीं कहते किन्तु
एकक्रियान्वयित्वरूप साहित्यके तात्पर्यसे कहतेहैं. एवं छेदनरूपा जो एकक्रिया
तादृश एकक्रियान्वयित्व धव तथा खदिर उभयमें विद्यमान है. इस रीतिसे एक
क्रियान्वयित्वरूप साहित्यके आश्रयमें 'खदिर' पदकी लक्षणा मान लीजाय तो क्या
हानि है? समाधान-" धवखदिरौ छिन्धि पश्य" इत्यादि प्रयोगस्थलमें क्रियाके
भेद होनेसेभी द्वन्द्व देखाजाताहै.भाव यह कि-एक क्रियान्वयित्वरूप साहित्य यदि
नियमसे इतरेतरयोगद्वन्द्वस्थलमें रहे तो उसके आश्रयमें 'खदिर' पदकी लक्षणाभी
मान लीजाय; परन्तु उसका तो "धवखदिरौ छिन्धि पश्य" इत्यादि क्रियान्वयस्थलमें
व्यभिचार प्रतीत होताहै. इसलिये साहित्यमें लक्षणा माननी उचित नहीं और
वास्तवमें एकक्रियान्वयित्वरूप साहित्यका " धवखदिरौ छिन्धि " इत्यादिवाक्यके
शाब्दबोधमें अनुभवभी नहीं होता. ( अतएव ) द्वन्द्वस्थलमें लक्षणाके अभाव होने-
सेही " राजपुरोहितौ सायुज्यकामौ यजेयाताम्-अर्थात् सायुज्यमुक्तिकी कामनावाले
राजा तथा पुरोहित दोनों यजन करें " इत्यादि वाक्यस्थलमें लक्षणाके अभावसे
द्वन्द्वका आश्रयण पूर्व आचार्यलोगोंने कियाहै. ( तस्मात् ) इसलिये साहित्य किसी
पदका अर्थ नहींहै किन्तु पदार्थद्वयका जहां वास्तवभेद होताहै वहां द्वन्द्वसमास
होताहै.
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २९९
न च नीलघटयोरभेद इत्यादौ कथमिति वाच्यम् । तत्र नीलप-
दस्य नीलत्वे घटपदस्य घटत्वे लक्षणा, अभेद इत्यस्य चाश्रया-
भेद इत्यर्थात् । समाहारद्वन्द्वे तु यदि समाहारोऽप्यनुभूयत इ-
त्युच्यते तदाऽहिनकुलमित्यादौ परपदेऽहिनकुलसमाहारे लक्ष-
णा पूर्वपदं तात्पर्यग्राहकम् ।
शंका-“नीलो घटः-इत्यत्र नीलघटयोरभेदः” इत्यादिवाक्यस्थलमें “नील-
घटयोः” यह द्वन्द्व कैसे हुआ? अर्थात् यह वाक्य असंगतभी नहीं और समासभी
“नीलश्च घटश्च नीलघटौ, तयोः नीलघटयोः ‘नीलो घटः’ इत्यत्राभेदः” यही
मानना होगा, फिर वास्तवसे पदार्थद्वयभेदस्थलमें द्वन्द्व होताहै यह नियम आपका
कहां रहा? समाधान-ऐसे स्थलमें ‘नील’ पदकी नीलत्वमें तथा ‘घट’ पदकी घटत्वमें
लक्षणा मानकर द्वन्द्व हुआ है और ‘अभेद’ यह शब्द आश्रयाभेदका बोधक है
अर्थात् ‘नीलत्वघटत्वाश्रययोरभेदः” यह वाक्यार्थ हुआ. एवं समाहारद्वन्द्व स्थलमें
यदि किसी विद्वान्को (समाहार) समुच्चयका अनुभवभी होता होय तो “अहिन-
कुलम्’ इत्यादि वाक्योंमें (पर) नकुलादिपदोंकी अहिनकुलसमाहारमें लक्षणा
माननी और (पूर्व) अहिआदि पदको पूर्वोक्त रीतिसे तात्पर्यका ग्राहक जानना
उचित है.
न च भेरीमृदंगं वादयेत्यत्र कथं समाहारस्यान्वयः, अपेक्षाबुद्धि-
विशेषरूपस्य तस्य वादनासम्भवादिति वाच्यम् । परम्परास-
म्बन्धेन तदन्वयात् ।
शंका-“भेरीमृदङ्गं वादय” इत्यादि स्थलमें समाहारका वादन क्रियामें
अन्वय कैसे होगा? क्योंकि अनेक पदार्थोंमें एकत्वावगाहन करनेवाली अपेक्षा बुद्धिही
विशेषरूप समाहारका वादन नहीं बनसकता. भाव यह कि-अभिघाताख्य संयोगा-
वच्छिन्नक्रिया वादनपदार्थ है. सो उसका अपेक्षाबुद्धिविशेषरूप समाहारमें होनाही
असम्भव है. समाधान-ऐसे स्थलमें ‘स्वाश्रयवृत्तित्व’ रूप परम्परासम्बन्ध
मानके वादनक्रियाका समाहारमें अन्वय है. यहां ‘स्व’ शब्दसे अपेक्षाबुद्धिविशे-
षरूप समाहार, उसका आश्रयविषयतासम्बन्धसे भेरीमृदङ्गादि तद्वृत्तित्व वादन-
रूपा क्रियाको इति एतादृशपरम्परासम्बन्धसे अन्वय होसकताहै.
एवं पञ्चमूलीत्यादावपि । परे त्वहिनकुलमित्यादावहिश्च नकुलश्च
बुध्यते प्रत्येकमेकत्वान्वयः, समाहारसंज्ञा च यत्रैकत्वं नपुं-