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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 350 में से

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पृष्ठ 209

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८५
कार्यान्वितघटादौ शक्तिं गृह्णाति । इत्थं च भूतले नीलो घट इ-
त्यादिशब्दान्न शाब्दबोधः, घटादिपदानां कार्यान्वितघटादि-
बोधे सामर्थ्यावधारणात्, कार्यताबोधं प्रति च लिङादीनां सा-
मर्यात् तदभावान्न शाब्दबोध इति केचित् । तन्न । प्रथमतः
कार्यान्वितघटादौ शक्त्यवधारणेऽपि लाघवेन पश्चात्तस्य परि-
त्यागौचित्यात् । अत एव ‘चैत्र पुत्रस्ते जातः कन्या ते गर्भिणी
जाता’इत्यादौ मुखप्रसादमुखमालिन्याभ्यां सुखदुःखे अनुमाय त-
त्कारणत्वेन परिशेषाच्छाब्दबोधं निर्णीय तद्धेतुतया तं शब्दम-
वधारयति । तथाच व्यभिचारात् कार्यान्विते न शक्तिः । न च
तत्र तं पश्येत्यादिशब्दान्तरमध्याहार्यम्, मानाभावात् । ‘चैत्र
पुत्रस्ते जातो मृतश्च’इत्यादौ तदभावाच्च। इत्थं च लाघवादान्वि-
तघटेऽपि शक्तिं त्यक्त्वा घटपदस्य घटमात्रे शक्तिमवधारयति ।५।
भाषा—ऐसेही व्यवहारसेभी पदशक्तिका ग्रहण होता है; जैसे ( प्रयोजक )
आज्ञा करनेवाले बड़े वृद्धने छोटे वृद्धको आज्ञा करी कि, “ घटमानय–अर्थात् घटको
लेआओ ” तो ऐसे वचनको सुनकर छोटा वृद्ध घटको लाया. उस घटके लानेको
देखकर पास खड़ा हुआ बालक यह निश्चय करता है कि, ऐसा घटका लाना रूप कार्य
“ घटमानय ” इत्याकारकशब्दके उच्चारण करनेसे हुआ है. उसके कुछ काल पीछे
फिर बड़े वृद्धने छोटे वृद्धसे कहा कि—“ घटं नय, गामानय–अर्थात् घट लेजाओ
और गौको लेआओ.” जब छोटे वृद्धने आज्ञा मानकर वैसेही किया, तो समीप-
वर्त्ति बालक घटके लाने तथा लेजानेसे ‘ घट ’ पदकी शक्ति कम्बुग्रीवादिमद्
व्यक्तिविशेषमें निश्चित करता है. एवं इत्यादि व्यवहार जहां होता है वहांही
घटादि पदोंकी शक्ति कार्यान्वित घटादिमें बालक ग्रहण करलेता है परन्तु ऐसे
स्थलमें कोशको शक्तिका ग्राहक न माननेवाला प्रभाकर यह कहता है कि—
घटादि पदोंकी शक्तिका ग्रहण नियमसे कार्यान्वित घटादिमेंही होता है; अन्यथा
नहीं. ( इत्थञ्च ) इस रीतिसे “ भूतले नीलो घटः ” इत्यादि शब्दोंसे शाब्दबोध
नहीं होता; क्योंकि घटादि पदोंका कार्यान्वित घटादिके बोधमें सामर्थ्य निश्चित है
और कार्यता बोधनमें केवल लिङादिकों काही सामर्थ्य है और “भूतले नीलो घटः”
इत्यादि स्थलमें कार्यताके बोधक लिङादिका अभाव है. इसलिये इत्यादि