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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 350 में से

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पृष्ठ 210

१८६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
स्थलमें शाब्दबोध नहीं होता यह सब प्रभाकरका मन्तव्य है; ( तन्न ) सो
समीचीन नहीं है. प्रथम कालमें बालकको यद्यपि घटादिके आवापोद्वापद्वारा घटादि
पदोंकी कार्यान्वित घटादिमेंही शक्तिका ग्रहण होताहै; तथापि 'कार्यान्वितघ-
टशाब्दत्व' की अपेक्षासे केवल 'घटशाब्दत्व' को कार्य्यतावच्छेदक माननेमें
लाघव है. इसलिये पीछेसे कार्यान्वितघटादिमें शक्तिअवधारणका परित्याग करनाही
उचित है. ( अतएव ) कार्य्यताविषयक बोधके प्रति पदोंको कारणता है, इसीलिये
मैत्रके चैत्रके प्रति “चैत्र!पुत्रस्ते जातः ' कन्या ते गर्भिणी जाता-अर्थात् हे चैत्र!
तेरे घर पुत्र उत्पन्न हुआहै और कन्या तेरी गर्भिणी होगईहै” इत्यादि वाक्य उच्चारण
स्थलमें समीपवर्त्ति तीसरा पुरुष एकही वाक्य सुननेसे चैत्रके मुखकी प्रसन्नता तथा
मलिनताको देखकर चैत्रके सुख तथा दुःखका अनुमान करके उस सुख-दुःखकी
कारणता उस कालमें और किसीमें प्रतीत नहीं होती तो परिशेषसे मैत्रके उच्चारण
किये शब्दजन्यबोधमें कारणताका निर्धारण करके तादृशशाब्दबोधहेतुत्वेन उस
मैत्रोच्चरित शब्दहीको निश्चय करताहै. ( तथाच ) एवं “घटादिपदानां कार्यान्वि-
तघटादिबोध एव सामर्थ्यम्” इत्याकारक नियमका 'चैत्र पुत्रस्ते' इत्यादिस्थलमें
व्यभिचार होनेसे घटादिपदोंकी कार्यान्वित घटादिमें शक्ति माननी उचित नहीं.
शंका-“चैत्र पुत्रस्ते” इत्यादि वाक्यस्थलमें 'तं पश्य' इत्यादि क्रियापदके
अध्याहार करनेसे पूर्वोक्त व्यभिचार नहीं है. समाधान-इत्यादि अध्याहारमें
कोई प्रमाण नहीं है और “चैत्र पुत्रस्ते जातो मृतश्च” इत्यादि स्थलमें 'तं पश्य'
इत्यादि कार्य्यताके बोधक पदके अध्याहारकाभी असम्भव है. ( इत्थञ्च ) इस
रीतिसे लाघवसे यही कहना उचित है कि अन्वितघटमेंभी शक्तिग्रहको त्यागकर
केवल घटमात्रमें घटपदकी शक्तिका अवधारण समीपवर्त्ति बालकको होताहै ५ ।
एवं वाक्यशेषादपि शक्तिग्रहः । यथा। यवमयश्चरुर्भवतीत्यत्र
यवपदस्य दीर्घशूकविशेषे आर्याणां प्रयोगः, कङ्गौ च म्लेच्छानां,
तत्रहि “अथान्या ओषधयो म्लायन्ते अथैते मोद्मानास्तिष्ठन्ति”
उक्तं च“ वसन्ते सर्वशस्यानां जायते पत्रशातनम् । मोदमाना-
श्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः” इति वाक्यशेषाद्दीर्घशूके
शक्तिर्निर्णयते कङ्गौ, तु शक्तिभ्रमात्प्रयोगो नानाशक्तिकल्पने
गौरवात् । हरिपदादौ तु विनिगमकाभावान्नानाशक्तिकल्प-
नम् । ६ ।