न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
“गवयो गवयपदवाच्यः” इत्याकारक शक्तिग्रहण होता है, वह हम उपमान निरूपण
अवसरमें कहचुकेहैं २ ।
एवं कोषादपि शक्तिग्रहः सति बाधके क्वचित्त्यज्यते । यथा
नीलादिपदानां नीलरूपादौ नीलादिविशिष्टे च शक्तिः कोष व्यु-
त्पादिता तथापि लाघवान्नीलादौ शक्तिः, नीलादिविशिष्टे तु ल-
क्षणेतिं । ३ ।
भाषा-एवं कोशसेभी पदशक्तिका ग्रहण होता है; परन्तु बाधक सद्भावस्थलमें
इसकाभी त्याग करना पड़ता है. जैसे अमरादिकोषोंमें “ गुणे शुक्लादयः पुंसि
गुणिलिंगास्तु तद्वति ” अर्थात् ' शुक्ल ' आदि शब्द रूपके वाचक नियत पुंलिंग
रहतेंहैं और रूपवालेके वाचक होवें तो रूपवालेके लिंगका आश्रयण करतेहैं. ऐसा
लिखा है. परन्तु यहांभी शुक्लनीलादिपदोंकी लाघवसे शुक्लनीलादिरूपहीमें शक्ति
माननी उचित है; क्योंकि ' नीलादिमत्त्व ' की अपेक्षासे 'नीलत्व आदि ' जातिके
शक्यतावच्छेदक माननेमें लाघव प्रतीत होता है और नीलादिरूप विशिष्टमें
नीलादि पदोंकी लक्षणा होती है; यह सिद्धान्त है. और कई एक विद्वान् यहभी
कहतेंहैं कि-ऐसे स्थलमें लक्षणा माननेका कुछ प्रयोजन नहीं है; क्योंकि “गुणव-
चनेभ्यो मतुपोलुगिष्टः” इस वार्तिकसे लुप्त 'मतुप्' प्रत्ययसेही बोध होसकता है फिर
लक्षणा माननी निष्फल है ३ ।
एवमाप्तवाक्यादपि, यथा कोकिलः पिकपदवाच्य इत्यादिश-
ब्दात् पिकादिपदशक्तिग्रहः । ४ ।
भाषा-ऐसेही यथार्थवक्ता पुरुषके कथनसेभी पदशक्तिका ग्रहण होता है जैसे
किसी ' पिक ' पदके अर्थके न जाननेवाले बालकने किसी योग्यपुरुषसे पूंछा कि-
' पिक ' किसको कहतेंहैं? तो उस योग्यपुरुषने कहा कि-'पिक' नाम कोकिलाका
है तो ऐसे स्थलमें ' पिक' पदके अर्थको न जाननेवाले बालकको उस आप्त पुरुषके
वचनसे ' पिक ' पदकी शक्तिका ग्रहण होजाता है ४ ।
एवं व्यवहारादपि । यथा प्रयोजकवृद्धेन घटमानयेत्युक्तं,तच्छ्रु-
त्वा प्रयोज्यवृद्धेन घट आनीतस्तदवधार्य पार्श्वस्थो बालो घटा-
नयनरूपं कार्यं घटमानयेति शब्दप्रयोज्यमित्यवधारयति
ततश्च घटं नय गामानयेत्यादावावापोद्वापाभ्यां घटादिपदानां