न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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गौरव होगा इसलिये लाघवसे आख्यातकी कर्तृनिष्ठ धर्मविशेषकृतिहीमें शक्ति माननी
उचित है.एवं शक्यतावच्छेदक धर्म यावत् कृतियोंमें रहनेवाली 'कृतित्वरूपा' जाति
होगी वह यावत् कृतिके शिरपर एक है; इसलिये परमलाघव है-इति। न्यायसिद्धान्तमें
जिसमें आख्यातकी शक्ति मानी गई है वह कृति चैत्रादि कर्तामें प्रकारीभूत होकर
प्रतीत हुआ करती है.
न च कर्तुरनभिधानाच्चैत्रादिपदानन्तरं तृतीया स्यादिति वा-
च्यम् । कर्तृसंख्यानभिधानस्य तत्र तन्त्रत्वात् ।
शंका—आपके कथनानुसार लाघवानुरोधसे यदि आख्यात प्रत्ययका अर्थ
कृतिही मान लिया जाय तो अनुक्तकर्तामें "अनभिहिते २-३-१" इस अधिका-
रसे "कर्तृकरणयोस्तृतीया २-३-१८" इस सूत्रसे तृतीयाविभक्ति अर्थात् "चैत्रेण
पचति" इत्याकारक प्रयोगको साधुता होनी चाहिये. समाधान—आख्यातप्रत्ययके
कृति संख्या कालादि अनेक अर्थ विद्वान्लोगोंके अनुभवसिद्ध हैं, एवं जिस स्थलमें
कर्तृगतसंख्या आख्यातप्रत्ययसे अनुक्त होगी वहां तृतीयाका होना सम्भव है;
अन्यथा नहीं.
संख्याभिधानयोग्यश्च कर्मत्वाद्यनवरुद्धः प्रथमान्तपदोपस्था-
प्यः। कर्मत्वादीत्यस्य इतरविशेषणत्वतात्पर्याविषयत्वमर्थः ।
शंका—यही कैसे जाना जाय कि-कर्तृगत संख्या वहां उक्त है और कहां
अनुक्त है? समाधान—कर्मत्वाद्यनवरुद्ध और प्रथमान्तपदबोध्य कर्ता संख्याभि-
धानयोग्य होताहै. 'कर्मत्वाद्यनवरुद्ध' इस भागका इतर विशेषणत्वेन तात्पर्यावि-
षयस्वरूप सांकेतिक अर्थ समझना चाहिये. एवं "इतरविशेषणत्वेन तात्पर्याविषय-
त्वविशिष्टप्रथमान्तपदोपस्थाप्यः कर्ता संख्याभिधानयोग्यः" इत्याकारक समुदित
नियमका स्वरूप है.
तेन चैत्र इव मैत्रो मच्छतीत्यादौ न चैत्रे संख्यान्वयः। यत्र कर्मा-
दौ न विशेषणत्वे तात्पर्यं तद्वारणाय प्रथमान्तेति ।
भाषा—एवं "चैत्र इव मैत्रो गच्छति" इत्यादिस्थलोंमें (गच्छति) उत्तर-
वर्त्ति आख्यात वाच्य संख्याका चैत्रमें अन्वय नहीं होसकता, किन्तु मैत्रहीमें होगा;
क्योंकि चैत्रपदार्थ इव पदार्थसादृश्यमें विशेषणत्वेन तात्पर्यका विषय है. एवं ऐसे
स्थलमें "चैत्रनिरूपितं यत् सादृश्यं तादृशसादृश्येन यत् गमनं तद्गमनानु-
कूला वर्तमानकालिका या कृतिः तादृशकृत्याश्रय एकत्वसंख्याविशिष्टो मैत्रः" इत्या-
कारक शाब्दबोध होताहै. एवं "तण्डुलं पचति" इत्यादिस्थलमें आख्यातार्थ