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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 350 में से

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पृष्ठ 211

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८७
भाषा-ऐसेही वाक्यशेषसेभी शब्दकी शक्तिका ग्रहण होताहै. जैसे ‘ यवमय-
श्रुर्भवति ’ इस वाक्यमें ( आर्य्य ) याजकलोग ‘ यव ’ पदकी दीर्घशूकवाले यव
विशेषमें शक्ति मानतेहैं और म्लेच्छलोग ‘ यव ’ पदसे ( कङ्गु ) कङ्गनीका ग्रहण
करतेहैं-ऐसा होनेसे ( तत्र हि ) “यवमयश्चरुर्भवति” इस स्थलमें सन्देह उत्पन्न
हुआ कि ‘ यव ’ पदसे जवोंका ग्रहण करना चाहिये या कङ्गनीका तो प्रकरणा-
न्तरमें ‘ अथान्या ओषधयः ’ इत्यादि वाक्यशेषसे अर्थात् वसन्तऋतुमें सब खेतीके
पत्र गिर जातेहैं परन्तु ( यव ) कणशशाली हुए अर्थात् दीर्घशूकविशिष्ट हुए प्रफुल्लित
खड़े रहतेहैं इत्यादि वाक्यशेषसे ‘यव’पदकी दीर्घशूकविशेषमें शक्तिका निर्धारण
होताहै. म्लेच्छोंका ‘यव’ पदसे कङ्गनीका ग्रहण करना शक्ति भ्रममूलक समझना
चाहिये. एक ‘ यव ’ पदकी कङ्गनी तथा दीर्घशूकविशिष्ट उभयमें शक्तिमाननीभी
उचित नहीं क्योंकि नानाशक्ति कल्पना करनेमें गौरव है और ‘ हरि ’ आदि
पदोंमें तो एकत्र शक्तिके नियमके अभाव होनेसे अनायत्या नानाशक्तिकी कल्पना
करनी पड़तीहै ६ ।
एवं विवरणादपि शक्तिग्रहः । विवरणं तु तत्समानार्थपदान्तरेण
तदर्थकथनम्।यथा घटोऽस्तीत्यस्य कलशोऽस्तीत्यनेन विवर-
णाद्घटपदस्य कलशे शक्तिग्रहः। एवं पचतीत्यस्य पाकं करोती-
त्यनेन विवरणादाख्यातस्य यत्नार्थकत्वं कल्प्यते । ७ ।
भाषा-ऐसेही विवरणसेभी शक्तिका ग्रहण होताहै; उसके समानार्थके कहनेवाले
पदान्तरसे उसी अर्थको कहनेका नाम विवरण है. जैसे किसीने किसीको ‘घटोऽस्ति’
यह कहा तो उसने न समझा तो फिर उसने समझानेके लिये उसी वाक्यका विवरण
किया कि ‘ कलशोऽस्ति ’ तब वह ‘ कलश ’ शब्दकी शक्तिको जानताही था-
विवरण सुनतेही प्रथम वाक्यका अर्थभी जानगया. ऐसेही ‘ पचति ’ इस पदका
‘ पाकं करोति ’ यह विवरण होनेसे आख्यातमें प्रयत्नवाचकत्वकी कल्पना
होसकती है ७।
एवं प्रसिद्धपदस्य सान्निध्यादपि शक्तिग्रहः । यथेह सहकारतरौ
मधुरं पिको रौतीत्यादौ पिकपदस्य कोकिले शक्तिग्रह इति ।८।
भाषा-ऐसेही प्रसिद्धार्थक पदकी सन्निधिसेभी पदकी शक्तिका ग्रहण होताहै-
जैसे किसीने कहा कि-“ इह सहकारतरौ मधुरं पिको रौति-अर्थात् इस आम्रके
पेड़पर कोकिला मीठा २ बोल रही है ” तो ऐसे स्थलमें ‘पिक’पदसे विना सभी