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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 350 में से

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पृष्ठ 205

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८१
इत्याकारक ईश्वरकी इच्छारूपही है और माता पिता आदि करके संकेतित चैत्र मैत्रादि
आधुनिक नामोंमेंभी वही शक्ति विद्यमान है; क्योंकि वहांभी “एकादशेऽहनि पिता
नाम कुर्यात्” अर्थात् “ग्यारादिन पीछे पिता अपने पुत्रका नाम रक्खे” इस ईश्वरसंके-
तसे वह शक्ति सामान्यरूपसे विद्यमान है और आधुनिक संकेतित ‘नदी वृद्धि’
आदि पदोंमें वह शक्ति नहीं है, ऐसा साम्प्रदायिक लोग मानते हैं और नवीन लोगों-
का यह कथन है कि ईश्वरकी इच्छारूप पदमें शक्ति नहीं है किन्तु केवल इच्छारूपा
है; वह इच्छा चाहो किसीकी हो. एवं आधुनिक संकेतित पदोंमेंभी शक्ति हो सकतीहै
उस शक्तिके ग्राहक व्याकरणादि आठ हैं.
तथाहि । “शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोषाप्तवाक्याद्व्यवहारत-
श्च । वाक्यस्य शेषाद्विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य
वृद्धाः” ॥
भाषा-( तथाहि ) वही लिखतेहैं कि-पदशक्तिका ग्रहण व्याकरणसे, उपमानसे
कोशसे,आप्तवाक्यसे, व्यवहारसे, वाक्यशेषसे, विवरणसे और प्रसिद्ध पदके सान्निध्यसे
वृद्ध विद्वान् लोग कहतेहैं.
धातुप्रकृतिप्रत्ययादीनां शक्तिग्रहो व्याकरणाद्भवति, क्वचित्तु स-
ति बाधके त्यज्यतेऽपि । यथा वैयाकरणैराख्यातस्य कर्तरि
शक्तिरुच्यते । चैत्रः पचतीत्यादौ कर्त्रा सह चैत्रस्याभेदान्वयः,
तच्च गौरवात् त्यज्यते, किंतु कृतौ शक्तिर्लाघवात् । कृति-
श्चैत्रादौ प्रकारीभूय भासते ।
भाषा-धातुप्रकृति प्रत्ययआदिकी शक्तिका ग्रहण “भूसत्तायाम, वर्तमाने लट्”
इत्यादि व्याकरणसे होताहै; परन्तु यहभी किसी एक स्थलमें गौरवादि दोषके बाधक
होनेसे त्यागना पड़ता है. जैसे वैयाकरण लोग आख्यातकी शक्ति कर्त्तामें मानतेहैं
“चैत्रः पचति” इत्यादि स्थलमें आख्यातवाच्यकर्त्ताके साथ चैत्रका अभेदान्वय है
अर्थात् “लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः ३।४।६९” इत्यादि व्याकरणानुशासनसे
आख्यात वाच्य चैत्रही कर्त्ता है, परन्तु इस प्रकारका व्याकरणसे शक्तिग्रह गौरवभयसे
त्यागना पड़ता है; किन्तु लाघवानुरोधसे आख्यातकी कृतिमें शक्ति माननीही उचित है
भाव यह कि-यदि आख्यातकी कर्त्तामें शक्ति होगी तो शक्यतावच्छेदक कर्तृनिष्ठ
धर्मविशेष कृतिकोही मानना होगा.वह कृति प्रतिकर्तृ भिन्न२ है, एवं शक्यतावच्छेद-
कभी नानाही होंगे. ऐसे नाना अवच्छेदक धर्मके उपस्थित होनेसे उपस्थितिकृत महा-