न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८३
संख्याका तण्डुलमें अन्वयबोधवारणके लिये तथा “चैत्रेण सुप्यते” इत्यादि स्थलमें
धात्वर्थस्वापादिकमें संख्यान्वय बोधवारणके लिये “प्रथमान्तपदोपस्थाप्यः” इस-
भागका निवेश है.
यद्वा धात्वर्थातिरिक्ताविशेषणत्वं प्रथमदलार्थः। तेन चैत्र इव
मैत्रो गच्छतीत्यत्र चैत्रादेर्वारणम्। स्तोकं पचतीत्यादौ स्तोका-
देर्वारणाय च द्वितीयदलम् । तस्य द्वितीयान्तोपस्थाप्यत्वा-
द्वारणम् ।
भाषा-( यद्वा ) अथवा धात्वर्थसे अतिरिक्तका ना विशेषण होना प्रथमभागका
अर्थ है. इस रीतिसेभी “चैत्र इव मैत्रो गच्छति” इस स्थलमें चैत्रादिका वारण होस-
कताहै; क्योंकि चैत्रपदार्थ धात्वर्थसे अतिरिक्त ( इव ) अर्थसादृश्यमें विशेषणही है
और “ स्तोकं पचति मृदु पचति ” इत्यादि स्थलोंमें स्तोकादिमें आख्यातार्थ-
संख्याका अन्वयवारणके लिये ‘ प्रथमान्त ’ इत्यादि द्वितीय दलका निवेश है. भाव
यह कि- स्तोकादि पदार्थोंको क्रियाके विशेषण होनेसे यद्यपि उनमें धात्वर्थातिरि-
क्ताविशेषणत्व स्वतःसिद्ध है. वहां आख्यातार्थसंख्याका अन्वय अवश्य हुआ चाहिये.
तथापि ‘ प्रथमान्तपदोपस्थाप्यत्व ’ रूप नियमका द्वितीय अंश उनमें नहीं है
इसलिये आख्यातार्थसंख्या अन्वय योग्यताभी उनमें नहीं है; क्योंकि ‘क्रियाविशेष-
णानां कर्मत्वम् ’ इस अनुशासनसे स्तोकादिपदोंको द्वितीयान्त पदोपस्थाप्यता है.
एवं व्यापारेऽपि न शक्तिर्गौरवात् । रथो गच्छतीत्यादौ व्यापारे
आश्रयत्वे वा लक्षणा, जानातीत्यादौ त्वाश्रयत्वे, नश्यतीत्यादौ
प्रतियोगित्वे निरूढलक्षणा । १ ।
भाषा-एवं ‘लकारमात्रकी व्यापारमें शक्ति माननी’ यह मीमांसकमतभी समी-
चीन नहीं; क्योंकि जन्यत्वादि घटित व्यापारभी यत्नत्वजात्यापेक्षया गुरुभूतही है.
एवं “ रथो गच्छति-” इत्यादि स्थलमें गमनानुकूलव्यापारमें किंवा गमनानुकूल
व्यापारके आश्रयमें आख्यात प्रत्ययकी ( निरूढा ) नित्यतातपर्यवती लक्षणावृत्ति
है. एवं “चक्षुर्जानाति” इत्यादि स्थलमें ज्ञानानुकूल व्यापार आश्रयत्वमें तथा “घटो
नश्यति ” इत्यादि स्थलमें नाशानुकूल व्यापाराश्रयत्वमें अर्थात् प्रतियोगित्वमें
नित्यतात्पर्यवती निरूढ लक्षणाही समझनी चाहिये.-इति १ ।
उपमानाद्यथा शक्तिग्रहस्तथोक्तम् । २ ।
भाषा-एवं गोनिरूपित गवयनिष्ठ सादृश्यसाक्षात्काररूप उपमानसे जैसे