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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६५
विनाशि दोषवशसे घटवाली जगहमें घटाभावव्याप्यवत्ता ज्ञान होनेसेभी पश्चात्
सम्यक् चक्षुःसम्बन्धसे वहांही घटवत्ताका ज्ञान होताहै. यह अनुभवसिद्ध है अर्थात्
ऐसे स्थलमें दोषसे चक्षुःसंयोगरूप गुण प्रबल होताहै.
यथा च शंखे सत्यपि पीतत्वाभावव्याप्यशंखत्ववत्ताज्ञाने पि-
त्तादिदोषेण पीतः शंख इति धीर्जायते । एवं कोटिद्वयव्याप्यव-
त्तादर्शनेपि कोटिद्वयस्य प्रत्यक्षरूपः संशयो भवति तथा सत्प्र-
तिपक्षस्थले संशयरूपानुमितिर्भवत्येव ।
भाषा-एवं जैसे अदूषितनेत्र पुरुषको शंखमें पीतत्वाभावव्याप्य शंखत्ववत्ता ज्ञान
होनेसेभी पश्चात् पित्तादि दोषवशसे 'पीतः शंखः' इत्याकारक बुद्धि होजातीहै, यहभी
अनुभवसिद्ध है अर्थात् ऐसे स्थलमें गुणसे दोषकी प्रबलता है. एवं जैसे मन्द अन्ध-
कारमें पुरुषको स्थाणुमें या पुरुषमें "स्थाणुर्वा पुरुषो वा" इत्याकारक कोटिद्वयावगाहि
यदि प्रत्यय हो तो ऐसे स्थलमें 'स्थाणुत्वव्याप्यवक्रकोटरादिमत्त्व' तथा 'पुरुषत्व-
व्याप्यकरचरणादिमत्त्व' रूप कोटिद्वय व्याप्यवत्ता दर्शनसेभी कोटिद्वयका प्रत्यक्षा-
त्मक संशयही होता है, यह अनुभवसिद्ध है अर्थात् ऐसे स्थलमें गुण या दोष कोई
निर्बल सबल नहीं है किन्तु दोनों समबल हैं. वैसेही सत्प्रतिपक्षस्थलमेंभी दोनों हेतु-
ओंको समबल होनेसे संशयात्मिक अनुमिति होसकतीहै.
यत्र चैककोटिव्याप्यदर्शनं तत्राधिकबलतया द्वितीयकोटिभान-
प्रतिबन्धान्न संशयः। फलबलेन चाधिकसमबलभावः कल्प्यत इति
वदन्ति । तन्न । तदभावव्याप्यवत्ताज्ञाने सति तदुपनीतभानवि-
शेषशाब्दबोधादेरनुदयाल्लौकिकसन्निकर्षजन्यदोषविशेषाजन्य-
ज्ञानमात्रे तस्य प्रतिबन्धकता लाघवात् ।
भाषा-और जहां एककोटिव्याप्यवत्ता ज्ञान निःसंदेह होचुका है वहां वह कोटि
अधिक बलवाली होनेसे द्वितीय कोटिका प्रतिबन्धक अवश्य होगी; इसलिये ऐसे
स्थलमें संशय नहीं होसकता. कोटियोंके अधिक समबलभावकी कल्पना फलानु-
रोधसे हरएक स्थलमें होसकती है; ( तन्न ) यह कथन रत्नकोशकारका युक्तियुक्त
नहीं है; क्योंकि ज्ञानोंका परस्पर प्रतिबध्यप्रतिबन्धकभाव जहां तक हो सके लाघवा-
नुरोधसे मानना उचित है और यह वार्ता विद्वान् लोगोंके अनुभवसिद्ध है कि जिस
स्थलमें साध्याभावव्याप्यवत्ताका ज्ञान साक्षात्कारात्मक हुआ है उसी स्थलमें उसी

१६६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
साध्यविषयक ( उपनीत ) अलौकिक सन्निकर्ष विशेषद्वारा भान अथवा अनुमिति
उपमिति या शाब्दबोध कुछभी नहीं होता और प्रतिबध्य कोटिक ज्ञानोंका भिन्नभिन्न
नामनिर्देश करनेसे नियमका शरीरभी गुरूभूत होताहै इसलिये कोई लघुभूत नियम
कहना चाहिये. वह यही होसकता है कि “ साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानस्य लौकिक
सन्निकर्षाजन्य दोषविशेषजन्यज्ञानत्वावच्छिन्ने प्रतिबन्धकत्वम्” अर्थात् साक्षात्कारा-
त्मक साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानकी लौकिकसन्निकर्षनिष्ठ जनकता निरूपित जन्य-
ताशून्य ज्ञानमात्रके प्रति तथा दोषविशेषनिष्ठ जनकता निरूपित जन्यताशून्य ज्ञानमा-
त्रके प्रति प्रतिबन्धकता है. भाव यह कि-शाब्दबोधादिज्ञान लौकिकसन्निकर्षजन्य
नहीं किंतु पदज्ञानादि जन्य है; एवं ‘ पीतः शंखः ’ यह ज्ञान दोष विशेषजन्य
नहीं किन्तु पित्तादि दोषविशेषसेही जन्य है. एवं साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानको
शाब्दबोधादिज्ञानोंके प्रति प्रतिबन्धकता और ‘ पीतः शंखः ’ इत्यादिज्ञानोंके प्रति
अप्रतिबन्धकता अतिलघुभूत नियमसे सिद्ध हुई.
न तूपनीतभानविशेषे शाब्दबोधे च पृथक्प्रतिबन्धकता गौरवात्,
तथा च प्रतिबन्धकसत्त्वात् कथमनुमितिः । न हि लौकिकस-
न्निकर्षस्थले प्रत्यक्षमिव सत्प्रतिपक्षस्थले संशयानुमितिः प्रमा-
णिकी, येनानुमितिभिन्नत्वेनापि विशेषणीयम् ।
भाषा-इसलिये साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानकी उपनीत भानविशेषमें और शाब्द-
बोधादिमें जुदी जुदी प्रतिबन्धकता माननी उचित नहीं क्योंकि गौरव होताहै. इस
रीतिसे सत्प्रतिपक्षस्थलमेंभी साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानरूप प्रतिबन्धकके विद्यमान
होनेसे अनुमिति कैसे होसकतीहै? अर्थात् कभी नहीं होसकती. क्योंकि साध्याभाव
व्याप्यवत्ताज्ञाननिष्ठ प्रतिबन्धकता निरूपित प्रतिबध्यतावच्छेदक कोटि प्रविष्टत्व
अनुमिति ज्ञानकोभी स्वतःसिद्ध है और रत्नकोशकारके अभिप्रायसे हम प्रतिबध्य
प्रतिबन्धकभाव नियमके शरीरमें (अनुमितिभिन्नत्वेन) प्रतिबध्यताका निवेशभी नहीं
करसकते; क्योंकि लौकिक सन्निकर्षस्थलमें प्रत्यक्षकी तरह सत्प्रतिपक्षस्थलमें संश-
यात्मिका अनुमिति प्रामाणिकलोगोंने प्रामाणिकी नहीं मानी अर्थात् प्रामाणिकलोग
लौकिक सन्निकर्षस्थलमें प्रत्यक्षमें प्रमाणता मानतेहैं और सत्प्रतिपक्षस्थलमें संशया-
नुमिति अप्रामाणिकी मानतेहैं.
यत्र कोटिद्वयव्याप्यवत्ताज्ञानं तत्रोभयत्राप्रामाण्यज्ञानात्संशयो
नान्यथा, अगृहीताप्रामाण्यकस्यैव विरोधिज्ञानस्य प्रतिबन्धक-
त्वादिति । ३ ।

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६७
भाषा--और रत्नकोशकारने जो " स्थाणुर्वा पुरुषो वा " इत्याकारक प्रत्यक्ष
संशयका उदाहरण देकर सत्प्रतिपक्षस्थलमें संशयात्मक अनुमितिका स्थापन
किया है, वहभी ठीक नहीं; क्योंकि संशय नियमसे वहांही हुआ करता है, जहां
उभयकोटिव्याप्यवत्ता ज्ञानमें अप्रमाणता गृहीत हो प्रकारान्तरसे कभी नहीं
होता और इतर ज्ञाननिष्ठ प्रतिबध्यतानिरूपित प्रतिबंधकता उसी ज्ञानमें रहती है,
जिसमें किसी तरहसे अप्रमाणता गृहीत न हुई हो; इसलिये संशयस्थलमेंभी यही
समझना चाहिये कि, जबतक उभय कोटिक निश्चयमें किसी एक निश्चयमें प्रामाण्य
ग्रहण नहीं हुआ तबतक संशयज्ञानका कोई अंश निर्बल या सबल होकर
अपनेमें प्रत्यक्षरूपताका भाव नहीं दिखला सकता और संशयज्ञानमें प्रमाणताभी
किसीने नहीं मानी, संशयस्थलमें जब एक कोटिमें प्रमाणताका निश्चय होगा तब
संशय आपही नहीं रहेगा इसलिये इसके निदर्शनसे सत्प्रतिपक्षस्थलमें संशयात्मिक
अनुमिति माननीभी केवल मनोरथ मात्र है ३ ।
आश्रयासिद्धयाद्यन्यतमत्वमसिद्धित्वम्। आश्रयासिद्धिः पक्षे पक्ष-
तावच्छेदकस्याभावः। यत्र च काञ्चनमयः पर्वतो वह्निमानिति
साध्यते तत्र पर्वतो न काञ्चनमय इति ज्ञाने विद्यमाने काञ्चन-
मयपर्वते परामर्शप्रतिबन्धः फलम् । १ ।
भाषा-आश्रयासिद्धयादि, भेदाभाववाले हेतुसमुदायका नाम आश्रयासिद्ध है
अर्थात् ' आश्रयासिद्धयादि ' पदसे स्वरूपासिद्ध व्याप्यत्वासिद्ध साध्यासिद्ध आदि
सबका ग्रहण है, इनका भेद इन सबको त्यागकर संसारमात्रमें है, उस भेदका
अभाव इन सबमें है; एवं लक्षण संगत हुआ, जिस हेतुके पक्षमें पक्षतावच्छेदक
धर्म न रहे वह हेतु आश्रयासिद्ध कहाता है; उदाहरणस्थल इसके " काञ्चनमय-
पर्वतो वह्निमान् धूमात् " इत्यादि अनेक हैं, " पर्वत कांचनमय नहीं है " इत्या-
कारक ज्ञानके विद्यमान होनेसे कांचनमय पर्वतमें "वह्निव्याप्यधूमवान् कांचनमय-
पर्वतः " इत्याकारक परामर्शका प्रतिबन्ध होना अर्थात् परामर्शने ना उत्पन्न होना
यही इसका फल है १ ।
स्वरूपासिद्धिस्तु पक्षे व्याप्यत्वाभिमतस्याभावः । अत्रच ह्रदो
द्रव्यं धूमादित्यादौ पक्षे व्याप्यत्वाभिमतस्य हेतोरभावे ज्ञाते
पक्षे साध्यव्याप्यहेतुमत्त्वज्ञानरूपपरामर्शप्रतिबन्धः फलम् । २ ।
भाषा-व्याप्यत्वेन अर्थात् हेतुत्वेनाभिमत हेतु यदि पक्षमें न रहे तो वह
स्वरूपासिद्ध कहा जाता है; उदाहरणस्थल इसके " ह्रदो द्रव्यं धूमात् " इत्यादि

१६८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
अनेक हैं, यहांभी हृदादि पक्षमें व्याप्यत्वेनाभिमत धूमरूप हेतुके अभावका ज्ञान
होनेसे " द्रव्यव्याप्यधूमवान् ह्रदः " इत्याकारक ज्ञानरूप परामर्शका प्रतिबन्ध
होनाही फल है २ ।
साध्याप्रसिद्धिरपि व्याप्यत्वासिद्धिः। सा च साध्ये साध्यतावच्छे-
दकाभावः । तथा च काञ्चनमयवह्निमानित्यादौ साध्ये साध्यता-
वच्छेदकाभावे ज्ञाते साध्यतावच्छेदकविशिष्टसाध्यव्याप्यवत्ता-
ज्ञानरूपपरामर्शप्रतिबन्धः फलम् ।
भाषा-साध्याप्रसिद्धिकी गणनाभी व्याप्यत्वासिद्धिकेही अंतर्भूत है. जिस
स्थलमें साध्यमें साध्यतावच्छेदक धर्मकी सम्भावना न हो वहां साध्याप्रसिद्धि
होती है; उदाहरणस्थल इसके " पर्वतः कांचनमयवन्हिमान् धूमात् " इत्यादि
अनेक होसकतेहैं. यहांभी ‘ कांचनमयवन्हित्व ’ रूप साध्यतावच्छेदक धर्मके
अभावका ज्ञान होनेसे " कांचनमयवन्हिव्याप्यधूमवान् पर्वतः " इत्याकारक
ज्ञानरूप परामर्शका प्रतिबन्ध होनाही फल है.
एवं हेतौ हेतुतावच्छेदकाभावः साधनाप्रसिद्धिः । यथा च काञ्च-
नमयधूमादित्यादौ अत्र हेतुतावच्छेदकविशिष्टहेतोर्ज्ञानाभावात्
तद्धेतुकव्याप्तिज्ञानादेरभावः फलम् । एवं वह्निमान् नीलधूमा-
दित्यादौ गुरुतया नीलधूमत्वं हेतुतानवच्छेदकमिति व्याप्यत्वा-
सिद्धिरित्यपि वदन्ति । ३ । ४ ।
भाषा-ऐसेही जिस स्थलमें हेतुमें हेतुतावच्छेदक धर्मका सम्भव न हो वहां
साधनाप्रसिद्धि होती है; उदाहरणस्थल इसके" पर्वतो वन्हिमान् कांचनमयधूमात् "
इत्यादि अनेक होसकतेहैं. ऐसे स्थलमें कांचनमयधूमत्वरूप हेतुतावच्छेदकविशिष्ट
‘ कांचनमयधूम ’ रूप हेतुके ज्ञानको न होनेसे उस हेतुसे उत्पन्न होनेवाले
व्याप्तिज्ञानकी अनुत्पत्ति ही फल है. ऐसेही गुरुधर्ममें अवच्छेदकताके
ना माननेवाले कई एक विद्वान् लोग " पर्वतो वन्हिमान् नीलधूमात् '
इत्यादि स्थलकोभी व्याप्यत्वासिद्धिका उदाहरण मानतेहैं. ऐसे स्थलमें
‘नीलधूमत्व ’ रूप धर्म समनियत लघुभूत धूमत्वरूप धर्म्मसे गुरुभूत होनेसे हेतु-
तावच्छेदक धर्म नहीं होसकता इसीसे तद्विशिष्ट व्याप्ति ज्ञानभी नहीं होसकता;
यही उनके कथनका भाव है; परन्तु यह सिद्धान्त सर्वसम्मत नहीं है ३ । ४ ।

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६९
बाधस्तु पक्षे साध्याभावादिः। एतस्यानुमितिप्रतिबन्धः फलम्।
तद्धर्मिकतदभावनिश्चयो लौकिकसन्निकर्षाजन्यदोषविशेषाज-
न्यतद्धर्मिकतज्ज्ञानमात्रे विरोधीति।
भाषा-जिस स्थलमें पक्षमें साध्य न रहे वहां बाधदोष होताहै. वही 'एकज्ञान-
विषयत्वसम्बन्धेन' हेतुके सिरपर जाताहै तो हेतुमें बाधित व्यवहार होताहै. उदा-
हरणस्थल इसके "वह्निरनुष्णः द्रव्यत्वात्" इत्यादि अनेक होसकतेहैं. साक्षात्
अनुमितिके प्रतिरोधक होना इस बाधरूप दोषका फल है. तद्धर्मिक तद-
भावनिश्चय अर्थात् अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानाऽनास्कन्दित तद्धर्मिक तद्भावनिश्चय
लौकिकसन्निकर्षाजन्य दोषविशेषाजन्य तद्धर्मिक तद्ज्ञानमात्रके प्रति विरोधी होताहै.
इस नियममें प्रथम 'तत्' पदसे प्रकृतोपयोगि धर्मका ग्रहण है; द्वितीय 'तत्' पदसे
धर्मीका ग्रहण है और बाधकालीन इच्छाजन्य ज्ञानका नाम आहार्यज्ञान है. 'शाल-
ग्रामशिलामें ईश्वरबुद्धि करनी, प्रतिमामें देवबुद्धि करनी' इत्यादि इस ज्ञानके
उदाहरणस्थल हैं. इस प्रकारका आहार्य्य जो न हो वह कहावे अनाहार्य्य; एवं
संशयादि ज्ञानोंका नाम 'अप्रामाण्य ज्ञान' है. 'स्कन्दित' नाम संमिश्रितका है.
अप्रामाण्यज्ञानसे स्कन्दित अर्थात् मिश्रित जो नहीं है उसका नाम 'अप्रामाण्यज्ञा-
नानास्कन्दित' है. ऐसे अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दित तद्धर्मिक तदभावनिश्चयको
लौकिकसन्निकर्षाजन्य दोषविशेषाजन्य तद्धर्मिक तद्ज्ञानमात्रके प्रति प्रतिबन्धकता
है. प्रत्यक्षभिन्न ज्ञानमात्र लौकिकसन्निकर्षाजन्य है, उन लौकिक सन्निकर्षजन्य ज्ञानों-
मेंसे एक दोषविशेषसे जन्य 'पीतः शंखः' इत्यादि ज्ञानको छोड़कर यावत् ज्ञानके
प्रति तद्धर्मिक तद्भावनिश्चयको विरोधिता है. एवं प्रकृतमें वह्नयात्मक पक्षमें अनुष्ण
त्वधर्मिक अनुष्णाभाववत्ता निश्चयको अर्थात् 'वह्निरुष्णः' इत्यादि स्पार्शनिक
साक्षात्कारकोभी अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दित तद्धर्मिक तदभावनिश्चयरूप
होनेसे 'वह्निरनुष्णः' इत्यादि अनुमितिके प्रति प्रतिबन्धकता होसकतीहै;क्योंकि अनु-
मित्यात्मक ज्ञानभी लौकिकसन्निकर्षाजन्य दोषविशेषाजन्य तद्धर्मिक तद्ज्ञानरूप
प्रतिबध्य कोटिके अंतर्भूतही है-इति.
न तु तत्र संशयसाधारणं पक्षे साध्यसंसृष्टत्वज्ञानमनुमितिकारणं
तद्विरोधितया च बाधसत्प्रतिपक्षयोर्हेत्वाभासत्वमिति युक्तम्।
अप्रसिद्धसाध्यकानुमित्यनापत्तेः, साध्यसंशयादिकं विनाऽप्यनु-
मित्युत्पत्तेश्च।
भाषा-किसीएक विद्वानका यह मत है कि-पक्षमें संशय साधारण साध्यसम्ब-
न्धका ज्ञान अनुमितिका कारण है और अनुमिति करणीभूत साध्यसंसृष्टत्व ज्ञानके

१७० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली-- [ अनुमान-
विरोधि होनेसे बाधसत्प्रतिपक्षमें हेत्वाभासता है, परन्तु यह कथन उसका युक्तियुक्त
नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा हो तो "पृथिव्यामितरभेदः" इत्याकारक अप्रसिद्ध
साध्यक अनुमिति उत्पन्न नहीं होनी चाहिये. भाव यह कि-ऐसे स्थलमें अनुमितिसे
पहिले पक्षमें साध्यसंसृष्टत्वका ज्ञान किसी तरहसेभी नहीं है और घनगर्जनादि स्थलोंमें
साध्यसंशय आदिकसे बिनाही अनुमितिज्ञानकी उत्पत्ति देखी जातीहै इसलिये
पक्षमें संशयसाधारणसाध्यसंसृष्टत्वज्ञानकी अनुमितिकेप्रति कारण मानना उचित नहीं.
एवं साध्याभावज्ञाने प्रमात्वज्ञानमपि न प्रतिबन्धकम्, प्रमाणा-
भावात् , गौरवाच्च ।
भाषा-एवं प्राचीन लोग साध्याभावज्ञानमें प्रमात्वबुद्धिको प्रतिबन्धक मानतेहैं
अर्थात् "हृदो वह्निमान्" इत्यादि अनुमितिज्ञानके प्रति "हृदो वह्न्यभाववान्"
इत्यादिज्ञानमें "इदं ज्ञानं प्रमा" इत्याकारक ज्ञानको प्रतिबन्धकता मानतेहैं परन्तु
ऐसा मानना उनका प्रमाणशून्य होनेसे समीचीन नहींहै. भाव यह कि-ज्ञाननिष्ठा
प्रतिबन्धकता ग्राह्याभावमुद्रिया होतीहै और "इदं ज्ञानं प्रमा" इत्याकारक ज्ञान तो
ग्राह्याभावानवगाहि है क्योंकि प्रकृतमें ग्राह्य वह्निरूप साध्य है, ग्राह्याभाव वह्न्यभाव
है. उसके अवगाहन करनेवाला ज्ञान "ह्रदो वह्न्यभाववान्" इत्याकारकही होसकता
है; इसलिये यही प्रतिबन्धक है. किन्तु "इदं ज्ञानं प्रमा" इत्याकारक नहीं और
पक्षविशेष्यक साध्याभाव ज्ञानमें प्रमात्वनिश्चयत्वेन गुरुभूत प्रतिबन्धकता कल्पना
करनकी अपेक्षा संशय निश्चय साधारणअप्रामाण्यज्ञानाभावत्वेन प्रतिबन्धकता
माननीही लाघव है.
अन्यथा सत्प्रतिपक्षादावपि तदभावव्याप्यवत्ताज्ञाने प्रमात्ववि-
षयकत्वेन प्रतिबन्धकतापत्तेः । किंतु भ्रमत्वज्ञानानास्कन्दित-
बाधादिबुद्धेः प्रतिबन्धकता,तत्र भ्रमत्वशङ्काविघटनेन प्रामाण्य-
ज्ञानं क्वचिदुपयुज्यते ।
भाषा-(अन्यथा)यदि साध्याभावज्ञानमें प्रमात्वज्ञानही प्रतिबन्धक मानें तो सत्प्रति-
पक्षादि स्थलोंमेंभी अनुमितिज्ञानके प्रति साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानमें प्रमात्वविषय-
कत्वेनही प्रतिबन्धकता होनी चाहिये; परन्तु यह वार्ता किसी विद्वान्के स्वीकृत
नहीं है, किन्तु भ्रमत्वज्ञानशून्य बाधज्ञानको प्रतिबन्धकता विद्वान्लोगोंके अभिमत
है. एवं ( तत्र ) बाधादि स्थलमें भ्रमत्वशंकानिवारणके लिये किसी एक स्थलमें
प्रामाण्यज्ञानकाभी उपयोग होताहै; अन्यथा नहीं.

Here is the complete, faithful line-by-line transcription of the text from the provided image:

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १७१
नच बाधस्थले पक्षे हेतुसत्त्वे व्यभिचारः, पक्षे हेत्वाभावे तु स्व-
रूपासिद्धिरेव दोष इति वाच्यम्। बाधज्ञानस्य व्यभिचारज्ञाना-
देर्भेदात् । किंच यत्र परामर्शानन्तरं बाधबुद्धिस्तत्र व्यभिचार-
ज्ञानादेरकिञ्चित्करत्वात् बाधस्यानुमितिप्रतिबन्धकत्वं वाच्यम् ।
शंका-जिस स्थलमें आप बाधरूप दोषको मानतेहैं वहां हम यह पूछतेहैं
कि-उस स्थलमें पक्षमें हेतु रहता है या नहीं ? यदि रहता है तो साध्याभाववद्वृत्ति
होनेसे साधारणनैकान्तिक हुआ और यदि नहीं रहता तो पक्षे हेत्वाभाव होनेसे
स्वरूपासिद्ध हुआ; एवं बाधदोषप्रयुक्त बाधित हेतुको पञ्चम हेत्वाभास मानना
अयुक्त है. समाधान-व्यभिचारादि ज्ञानोंसे बाधज्ञानका भेद है अर्थात् प्रतीति-
भेदसे भिन्न २ व्यवहार होताहै. (किञ्च) जब कहीं व्याप्तिज्ञानपक्षधर्मतापरामर्श
ज्ञानके पीछे पोल खुलनेसे बाधबुद्धि होवे तो वहां व्यभिचारज्ञान या स्वरूपासिद्धि
ज्ञान कुछ नहीं करसकता; क्योंकि यह ज्ञान तो परामर्शद्वारा अनुमितिके प्रतिब-
न्धक हैं, स्वतंत्र नहीं; सो परामर्श तो होही चुकाहै. इनमें प्रतिबन्धकताकी योग्यताही
नहीं, ऐसे स्थलमें बाधज्ञानही प्रतिबन्धक मानना होगा और व्यभिचारादि दोषोंसे
असंकीर्णभी बाधस्थल होसकताहै.
एवं यत्रोत्पत्तिक्षणावच्छिन्ने घटादौ गन्धव्याप्यपृथिवीत्ववत्त्वाज्ञानं
तत्र बाधस्यैव प्रतिबन्धकत्वं वाच्यम् ।
भाषा-जैसे "उत्पत्तिक्षणावच्छिन्नो घटो गन्धवान् पृथिवीत्वात्" इस स्थलमें उत्प-
त्तिक्षणावच्छिन्नघटात्मक पक्षमें पृथिवीत्वरूप हेतुके विद्यमान होनेसे पक्षे हेत्वाभावरूप
स्वरूपासिद्ध दोषभी नहीं है और प्रतियोगिव्यधिकरणसाध्याभाववद्वृत्तित्त्वरूप
व्यभिचारदोषभी नहीं है. एवं ऐसे स्थलमें गन्धव्याप्य पृथिवीत्ववत्त्वाज्ञानका केवल
"उत्पत्तिक्षणावच्छिन्नो घटो गन्धाभाववान्" इत्याकारक बाधज्ञानही प्रतिबन्धक
होसकताहै.
नच पक्षेघटे गन्धसत्त्वात् कथं बाध इति वाच्यम् । पक्षतावच्छे-
दकदेशकालाdynamicवच्छेदेनानुमितेरनुभवसिद्धत्वादिति ।
शंका-घटात्मक पक्षमें गन्ध तो रहताही है, फिर बाधज्ञान कैसा? समाधान-
पक्षतावच्छेदक देशकालाdynamicवच्छेदेन अनुमितिका होना विद्वानोंके अनुभवसिद्ध
है अर्थात् देशकालभी पक्षताके अवच्छेदक होते हैं. एवं घटरूप पक्षका उत्पत्ति-
क्षणात्मक कालभी अवच्छेदक है उस घटरूप पक्षमें गन्ध यद्यपि सर्वदा विद्यमान
है तथापि कार्यकारणानुरोधसे उत्पत्तिक्षणमें गन्धाभावभी अवश्यही है इस रीतिसे
यह असंकीर्ण बाधस्थल है.

१७२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
बाधसत्प्रतिपक्षभिन्ना ये हेत्वाभासव्याप्यास्ते तन्मध्य एवान्त-
र्भवन्ति, अन्यथा हेत्वाभासाधिक्यप्रसङ्गात् । बाधव्याप्यसत्प्र-
तिपक्षस्तु भिन्न एव, स्वतन्त्रेच्छेन मुनिना पृथगुपादानात् ।
सत्प्रतिपक्षव्याप्यस्तु न प्रतिबन्धक इति प्रघट्टकार्थः ॥७२ ॥
भाषा-बाधसत्प्रतिपक्षसे भिन्न सव्यभिचारादि हेत्वाभासोंके व्याप्य साधारणा-
नैकान्तिकादि हेत्वाभासभी उनहीके मध्यपाती गिने जाते हैं अर्थात् सव्यभिचारको
साधारणादिभेदसे दूषकता तीन प्रकारसे है परन्तु सव्यभिचार दोष एकहीहै ऐसेही
असिद्धकोभी जानना उचित है. यदि ऐसा नहीं मानें तो हेत्वाभासोंकी गणना
अधिक होजायंगी और बाधदोषका व्याप्यरूप सत्प्रतिपक्ष दोष तो भिन्नही मानना
उचित है; क्योंकि स्वतंत्र इच्छावाले गौतममुनिने इसको पृथक्ही ग्रहण किया है. एवं
सत्प्रतिपक्षके व्याप्य दोषोंकोभी पृथक् प्रतिबन्धकता नहीं है किन्तु प्रबल होनेसे ऐसे
स्थलमें सत्प्रतिपक्षदोषही प्रतिबन्धक होताहै यह संक्षेपसे समुदायार्थका निरूपण है ७२
यः सपक्षे विपक्षे च भवेत्साधारणस्तु सः ॥
भाषा-जो हेतु सपक्ष विपक्ष दोनोंमें रहे वह साधारण कहाजाता है.
यः सपक्ष इति । सपक्षविपक्षवृत्तिः साधारण इत्यर्थः । सपक्षो नि-
श्चितसाध्यवान्, विपक्षः साध्याभाववान् । विरुद्धवारणाय सप-
क्षवृत्तित्वमुक्तम्। वस्तुतो विपक्षवृत्तित्वमेव वाच्यम् । विरुद्धस्य
साधारणत्वेऽपि दूषकताबीजस्य भिन्नतया तस्य पार्थक्यात् ।
भाषा-जो हेतु निश्चित साध्यवाले तथा निश्चित साध्याभाववालेमें रहे वह
'साधारण' होताहै; निश्चित साध्यवाले स्थलका नाम 'सपक्ष' है निश्चित साध्याभाववाले
स्थलका नाम 'विपक्ष' है केवल विपक्षमात्रमें वर्तनेबाला हेतु विरुद्ध होताहै; एवं साधारणके
लक्षणमें यदि ' सपक्षवृत्तित्व' रूप विशेषण न दिया जाय किन्तु केवल 'विपक्षवृत्ति-
रसाधारणा'ऐसा कहा जाय तो विरुद्धमें इस लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी; उसके वारणार्थ
'सपक्षवृत्ति' यह विशेषण सफल है. वास्तवसे यदि 'विपक्षवृत्तित्व' इतनामात्रभी साधा-
रणका लक्षण किया जाय तो दोष नहीं. एवं लक्षणसे यद्यपि विरुद्धको साधारणता
प्रतीत होगी तथापि दूषकता बीजके भेदसे भेदही रहेगा. भाव यह कि-साधारण तो
अव्यभिचारज्ञानके प्रति प्रतिबन्धक है और विरुद्ध सामानाधिकरण्य ग्रहका प्रतिब-
न्धक है; इसलिये दोनों परस्पर भिन्न हैं.
यस्तूभयस्माद्व्यावृत्तः स त्वसाधारणो मतः ॥७३॥

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १७३
भाषा-जो हेतु सपक्ष विपक्ष दोनोंमें नहीं रहता किंतु केवल पक्षमात्रवृत्ति है वह
असाधारण कहा जाता है ॥ ७३ ॥
यस्तूभयस्मादिति । सपक्षविपक्षव्यावृत्त इत्यर्थः । सपक्षः सा-
ध्यवत्तया निश्चितः, विपक्षः साध्यशून्यतया निश्चितः । शब्दो
ऽनित्यः शब्दत्वादित्यादौ यदा शब्देऽनित्यत्वसन्देहस्तदा सप-
क्षत्वं घटादीनामेव, तद्व्यावृत्तं च शब्दत्वमिति तदा तदसाधार-
णम्।यदा तु शब्देऽनित्यत्वनिश्चयः तदा नासाधारणः।इदं च प्रा-
चां मतम्, नवीनमतं तु पूर्वमुक्तम् ॥ ७३ ॥
भाषा-सपक्षविपक्षसे व्यावृत्तहेतुका नाम ' असाधारण है ' यहां साध्यवत्त्वेन
निश्चितका सपक्षरूपसे ग्रहण है तथा साध्याभाववत्त्वेन निश्चित स्थलका विपक्षरूपसे
ग्रहण है;यहां निश्चयका विशेषरूपसे निवेश है.फल इसका यह है कि-“शब्दोऽनित्यः
शब्दत्वात्”इत्यादि स्थलमें यदि शब्दात्मक पक्षमें अनित्यत्वरूप साध्यका संदेह होगा
तो सपक्ष घटपटादि होंगे; क्योंकि वह अनित्यत्वरूप साध्यवत्त्वेन निश्चित है. विपक्ष
गगनादि होंगे;इन दोनोंसे व्यावृत्त केवल शब्दपक्षमात्रमें रहनेवाला शब्दत्वरूप हेतु तौ
असाधारण हो सकता है, परन्तु यदि शब्दमें कृतकत्वेन अनित्यत्वका निश्चय होचुका
है तौ शब्दत्वरूप हेतु असाधारण नहीं कहासकता. यह व्यवस्था माचीनसिद्धान्तसे है
और नवीन सिद्धान्त तौ वही है जो कि, हम “साध्यासमानाधिकरणो हेतुरसाधारणः”
इत्यादि लक्षणसे पूर्व कह चुकेहैं. ॥ ७३ ॥
तथैवानुपसंहारी केवलान्वयिपक्षकः ।
भाषा-एवं जिस हेतुका पक्ष केवलान्वयि हो वह अनुपसंहारी कहाजाताहै.
केवलान्वयिपक्षक इति । केवलान्वयिधर्मावच्छिन्नपक्षक इत्यर्थः ।
सर्वमभिधेयं प्रमेयत्वादित्यादौ सर्वस्यैव पक्षत्वात् सामानाधिक-
रण्यग्रहस्थलान्तराभावान्नानुमितिः । इदं तु न सम्यक् । पक्षै-
कदेशे सहचारग्रहेऽपि क्षतेरभावात् । अस्तु वा सहचाराग्रहस्ता-
वताप्यज्ञानरूपाऽसिद्धिरेव न तु हेत्वाभासत्वं तस्य, तथापि के-
वलान्वयिसाध्यकत्वं तत्त्वमित्युक्तम् ।
भाषा-अर्थात् केवलान्वयि धर्मावच्छिन्न पक्षस्थलमें अनुपसंहारी दोष होताहै;
वह पूर्वोक्त सम्बन्धसे हेतुमें भान होता है “ सर्वमभिधेयं प्रमेयत्वात् ”

१७४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
इत्यादि स्थल इसके लक्ष हैं. यहां वस्तुमात्रको पक्ष होनेसे साध्यके साथ
हेतुका सामानाधिकरण्य ग्रहण करनेके लिये कोई स्थल शेष नहीं है. एवं
सामानाधिकरण्य ग्रहरूप कारणीभूत व्याप्तिज्ञानके न होनेसे अनुमितिरूप कार्यभी
ऐसे स्थलमें नहीं होता. यह प्राचीन विद्वानोंका मन्तव्य है. परन्तु यह सम्यक् नहीं
है; क्योंकि सामानाधिकरण्य ग्रहणके लिये स्थलान्तर नाभी हो तोभी पक्षके एकदेशमें
साध्यहेतुके सहचारग्रहणसे अनुमिति होसकती है; अथवा साध्यके साथ हेतुके
सहचारका ग्रहणाभावही रहे तौभी ऐसे स्थलमें अज्ञानरूपा असिद्धीही माननी
उचित है. किन्तु ऐसे हेतुकी हेत्वाभासत्व नहीं है; तथापि केवलान्वयि साध्यस्थ-
लीय हेतुमें 'अनुपसंहारी' यह व्यवहार होता है. ऐसा कहना आवश्यक है.
यः साध्यवति नैवास्ति स विरुद्ध उदाहृतः ॥ ७४ ॥
भाषा-जो हेतु साध्यवाले स्थलमें न रहे वह विरुद्ध कहा जाता है ॥ ७४ ॥
यः साध्यवतीति । एवकारेण साध्यवत्त्वावच्छेदेन हेत्वभावो
बोधितः। तथा च साध्यव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वं तदर्थः७४॥
भाषा-मूलकारिकामें होनेवाले ' एव ' कारसे यह जानना चाहिये कि, साध्य-
वत्त्वावच्छेदेन कहींभी न रहनेवाला हेतु विरुद्ध कहा जाता है. एवं साध्यका व्याप-
कीभूत जो अभाव तादृशाभावप्रतियोगित्वही विरुद्धत्व समझना चाहिये ॥ ७४ ॥
असिद्धिं विभजते, आश्रयासिद्धिरित्यादि-
भाषा-'आश्रयासिद्धि' इत्यादि ग्रंथसे मूलकार असिद्धिका विभाग करतेहैं-
आश्रयासिद्धिराद्या स्यात्स्वरूपासिद्धिरप्यथ ॥
व्याप्यत्वासिद्धिरपरा स्यादसिद्धिरतस्त्रिधा ॥ ७५ ॥
भाषा-प्रथमका नाम आश्रयासिद्धि है; द्वितीयका नाम स्वरूपासिद्धि है; और
तीसरीका नाम व्याप्यत्वासिद्धि है इस भेदसे असिद्धि तीन प्रकारकी है ॥ ७५ ॥
पक्षासिद्धिर्यत्र पक्षो भवेन्मणिमयो गिरिः ॥
पक्षासिद्धिरिति । आश्रयासिद्धिरित्यर्थः ।
भाषा-“ मणिमयपर्वतो वह्निमान् धूमात् ” इत्यादि स्थलमें आश्रयासिद्धि है.
ह्रदो द्रव्यं धूमवत्त्वादत्रासिद्धिरथापरा ॥७६॥
अपरेति । स्वरूपासिद्धिरित्यर्थः ।
भाषा-'ह्रदो द्रव्यं धूमत्वात्' इत्यादि स्थलमें स्वरूपासिद्धि है ॥ ७६ ॥

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परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १७५
व्याप्यत्वासिद्धिरपरा नीलधूमादिके भवेत् ॥
भाषा- "पर्वतो वह्निमान् नीलधूमात्" इत्यादि स्थलमें व्याप्यत्वासिद्धि है.
नीलधूमादिक इति । नीलधूमत्वं गुरुतया न हेतुतावच्छेदकम्,
स्वसमानाधिकरणव्याप्यतावच्छेदकधम्र्म्मान्तराघटितस्यैव व्या-
प्यतावच्छेदकत्वात् ।
भाषा-ऐसे स्थलमें 'नीलधूमत्व' रूप धर्म गुरुभूत होनेसे हेतुताका अवच्छे-
दक नहीं होसकता; क्योंकि 'स्वसमानाधिकरणव्याप्यतावच्छेदक धर्मान्तराघटित
धर्मही व्याप्यतावच्छेदक होता है. यह नियम है. इसमें 'स्व' पदसेवि वक्षित
व्याप्यतावच्छेदक धर्मका ग्रहण है. प्रकृतमें वह धर्म 'नीलधूमत्व' है. 'स्व'
पदसे उसीका ग्रहण होगा. एवं नीलधूमत्वसमानाधिकरण व्याप्यतावच्छेदक
धर्मान्तर शुद्धधूमत्वरूप धर्मभी होसकता है. उस शुद्धधूमत्वरूप धर्मसे घटितही नीलधूम-
त्वरूप धर्म है, अघटित नहीं है; इसलिये नीलधूमत्वरूप धर्म अवच्छेदक होनेके
योग्य नहीं है. किन्तु 'धूमत्व' धर्म व्याप्यतावच्छेदक धर्मान्तराघटित होनेसे
पूर्वोक्त व्याप्यतावच्छेदकके लक्षणका लक्ष होसकता है.
धूमप्राग्भावत्वसंग्रहाय स्वसमानाधिकरणेति ।
भाषा-यहां व्याप्यतावच्छेदकके लक्षणमें 'स्वसमानाधिकरण' भागका निवेश
"यज्ञशाला वह्निमती भविष्यति धूमप्राग्भावात्" इत्यादि स्थलमें धूमप्राग्भावत्व
रूप धर्मके संग्रहके लिये समझना चाहिये अर्थात् यदि केवल 'व्याप्यताव-
च्छेदक धर्मान्तराघटित्व' मात्र कहेंगे तो 'धूमप्राग्भावत्व' रूप धर्म
व्याप्यतावच्छेदक धर्मान्तराघटित नहीं है; किन्तु व्याप्यतावच्छेदकीभूत 'धूम-
त्व' रूप धर्मसे घटितही है. एवं अवच्छेदक नहीं होसकेगा, परन्तु यदि
लक्षणमें 'स्वसमानाधिकरण' भागका निवेश करते हैं तो दोष नहीं. क्योंकि
'धूमप्राग्भावत्व' रूप धर्म धूमप्राग्भावमें रहता है और धूमत्व धूममें
रहता है. एवं इन दोनोंका परस्पर समानाधिकरण नहीं है. हमको स्वसमानाधिकरण
वृत्ति धर्मान्तराघटितत्व व्याप्यतावच्छेदकमें विवक्षित है; व्यधिकरणवृत्ति धर्मान्तर
चाहो व्याप्यतावच्छेदककी कुक्षिमें रहेभी तो हानि नहीं है.
विरुद्धयोः परामर्श हेतुत्वोः सत्प्रतिपक्षता ॥ ७७ ॥
भाषा-परस्पर विरोधि हेतुओंके परामर्शस्थलमें सत्प्रतिपक्ष होता है॥७७॥
विरुद्धयोरिति । कपिसंयोगतदभावव्याप्यवत्त्वपरामर्शोऽपि न
सत्प्रतिपक्षतत्वमत उक्तं विरुद्धयोरिति । तथा च स्वसाध्यवि-

१७६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
रुद्धसाध्याभावव्याप्यवत्तापरामर्शकालीनसाध्यव्याप्यवत्तापरा-
मर्शविषय इत्यर्थः ॥ ७७ ॥
भाषा-वृक्षत्वादि हेतुमें कपिसंयोग तथा कपिसंयोगाभाव व्याप्यवत्त्वपरामर्श
होनेसेभी सत्प्रतिपक्षत्वव्यवहार नहीं होता; क्योंकि ऐसे स्थलमें किसी हेतुका परस्पर
विरोध नहीं है. एवं स्वसाध्यसे विरुद्ध जो साध्य उस साध्यके अभावव्याप्यवत्ता
परामर्शकालहीमें साध्यव्याप्यवत्ता परामर्शका विषय सत्प्रतिपक्ष होताहै.“ ह्रदो वह्नि-
मान् धूमात्, ह्रदो वह्न्यभाववान् जलात्” इत्यादिस्थलमें ‘ स्व ’ पदसे जलरूप हेतु
उसका जो वह्न्यभावरूप साध्य उससे विरुद्ध जो वह्निरूप साध्य उस साध्यका जो
अभाव एतादृशाभाव व्याप्यवत्ता परामर्शकालहीमें स्वसाध्यव्याप्यवत्ता परामर्शका
विषय जलरूप हेतु है. ऐसेही हरएक सत्प्रतिपक्षस्थलमें जान लेना ॥७७॥
साध्यशून्यो यत्र पक्षस्त्वसौ बाध उदाहृतः ॥
उत्पत्तिकालीनघटे गन्धादिर्यत्र साध्यते ॥ ७८ ॥
भाषा-जिस स्थलमें पक्षमें साध्य न हो वहां बाधदोष होता है, जैसे-कोई ‘उत्प-
त्तिकालावच्छिन्नो घटः गन्धवान् पृथिवीत्वात् ’ ऐसी अनुमानरचना करे तो ऐसे स्थलमें
बाधदोष समझना चाहिये ॥ ७८ ॥
साध्यशून्य इति । पक्षः पक्षतावच्छेदकविशिष्ट इत्यर्थः । तेन
घटे गन्धसत्त्वेऽपि न क्षतिः। एवं मूलावच्छिन्नो वृक्षः कपिसंयो-
गीत्यत्रापि बोध्यम् ॥ ७८ ॥
इति श्रीविश्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्यविरचितायां सिद्धान्तमुक्ता-
वल्यामनुमानखण्डम् ॥ २ ॥
भाषा-‘पक्ष’शब्दसे पक्षतावच्छेदकदेशकालविशिष्ट पक्षका ग्रहण करना चाहिये.
एवं कालान्तरमें घटमें गन्ध रहेभी तो बाधलक्षणकी अव्याप्ति नहीं है; किंवा यह
स्थल बाधलक्षणका अलक्ष नहीं होसकता. ऐसेही “ मूलावच्छिन्नो वृक्षः कपिसंयोगी
एतद्वृक्षत्वात् ” इत्यादि स्थलमेंभी बाध समझना चाहिये पूर्वोक्त स्थलमें कालकी
तरह यहां देश अवच्छेदक है अर्थात् यद्यपि वृक्षमें शाखावच्छेदेन कपिसंयोग विद्यमान
है एवं पक्षमें साध्याभावरूप बाधदोष बननहीं सकता तथापि मूलावच्छेदेन कपिसंयोग
नहीं है. एवं मूलरूप देशके अवच्छेदक होनेसे यहां बाधदोष होसकताहै ॥ ७८ ॥
इति श्रीगोविन्दसिंहसाधुकृते आर्यभाषाविभूषित न्यायसिद्धान्तमुक्तावली
प्रकाशे अनुमान परिच्छेदः ॥ २ ॥

श्रीः।
अथोपमानपरिच्छेदः ३.
भाषाकारकृतमंगलाचरणम् ।
किं लोके, वेदशास्त्रेऽपि दुर्लभा यस्य चोपमा ॥
सच्चिदानन्दरूपेण वन्द्योऽसौ नानकों गुरुः ॥ १ ॥
उपमितिँ व्युत्पादयति , ग्रामीणस्येति-
भाषा-अवसर सङ्गतिके अभिप्रायसे ग्रन्थकार ' ग्रामीणस्य ' इत्यादि ग्रन्थसे
उपमितिका निरूपण करते हैं-
ग्रामीणस्य प्रथमतः पश्यतो गवयादिकम् ॥
सादृश्यधीर्गवादीनां या स्यात्सा करणं मतम् ॥ ७९ ॥
वाक्यार्थस्यातिदेशस्य स्मृतिर्व्यापार उच्यते ॥
गवयादिपदानां तु शक्तिधीरुपमाफलम् ॥ ८० ॥
भाषा-वनस्थ गवयादि पशुके प्रति प्रथमही देखनेवाले ग्रामीण पुरुषका जों
गवयादि विषयक गोनिरूपित सादृश्यदर्शन वह प्रकृतोपमितिका करण है ॥ ७९ ॥
अतिदेश वावयर्थका स्मरण मध्यमें व्यापार है. इस रीतिसे गवयादि शब्दोंकी व्यक्ति
विशेषमें शक्तिग्रहण करनी उपमितिका फल है;अर्थात् एतद्रूपही अनुमितिहै॥८०॥
यत्त्वारण्यकेन केनचिद्ग्रामीणं प्रत्युक्तं गोसदृशो गवयपदवाच्य
इति। पश्चाच्च ग्रामीणेन काचिदरण्ये गवयो दृष्टस्तत्र गोसादृश्य-
ज्ञानं यत्तदुपमितिकरणम् । तदनन्तरं गोसदृशो गवयपदवाच्य
इत्यतिदेशवाक्यार्थस्मरणं जायते तदेव व्यापारः ।
भाषा-जहां कहीं जंगलमें रहनेवाला पुरुष शहरमें रहनेवाले पुरुषको कदा-
चित् मिलकर यह कहे कि-जंगलमें एक ' गवय ' नामक पशु गौ जैसा होताहै.
उसके पीछे कभी दैवयोगात् कार्यवशसे वही शहरमें रहनेवाला पुरुष जंगलमें जावे
और उस 'गवय' नामक पशुको देखे तो ऐसे स्थलमें उस गवयमें जो गोसादृश्यक।
दर्शन वह होनेवाले उपमितिज्ञानका करण है. उस सादृश्यदर्शनके पीछे उसी
पुरुषको “ गोसदृशो गवयपदवाच्यः ” इत्याकारक जो अतिदेशका वाक्य अर्थात्
१५

१७६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ उपमानप० ३
जाङ्गली पुरुषका कहा हुआ वचन उस वचनके अर्थका स्मरण उस पुरुषको होताहै,
वह स्मरणही होनेवाली उपमितिके प्रति मध्यमें व्यापार है.
तदनन्तरं तत्र गवयो गवयपदवाच्य इति ज्ञानं जायते तदुप-
मितिः, न त्वयं गवयपदवाच्य इत्युपमितिः, गवयान्तरे शक्ति
ग्रहाभावप्रसङ्गात् ॥ ७९ ॥ ८० ॥
इति श्रीविश्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्यविरचितायां सिद्धान्त-
मुक्तावल्यामुपमानखण्डम् ॥ ३ ॥
भाषा-उसके पीछे उस पुरुषको “ गवयो गवयपदवाच्यः-अर्थात् ऐसे पशुका
नामही 'गवय' है ” इत्याकारक ज्ञान होताहै. इसीका नाम 'उपमितिज्ञान' है. यहां
“ अयं गवयपदवाच्यः ” इत्याकारक उपमितिका स्वरूप मानना अर्थात् उपमि-
तिके विषयको इदन्ताविशिष्ट करना उचित नहीं; क्योंकि ऐसा माननेसे अन्य
गवय व्यक्तियोंमें ' गवय ' पदकी शक्ति ग्रहण नहीं होसकती और वही पुरुष
प्रत्येक गवयव्यक्तिमें उपमितिसेही शक्तिग्रहण कराकरे यह वार्त्ताभी अनुभव-
विरुद्ध है.
इति श्रीगोविन्दसिंहसाधुकृते आर्यभाषाविभूषितन्यायसिद्धान्तमु-
क्तावलीप्रकाशे उपमानपरिच्छेदः ॥ ३ ॥

श्रीः।
अथ शब्दपरिच्छेदः ४.
भाषाकारकृतमंगलाचरणम् ।
चतुर्वर्गफलप्राप्तिकारकं क्लेशहारकम् ॥
वाचामगोचरं देवं वन्दे श्रीगुरुनानकम् ॥ १ ॥
शाब्दबोधप्रकारं दर्शयति,पदज्ञानं त्विति-
भाषा-शब्दोपमानकी परस्पर उपजीव्योपजीवक भावरूप संगतिके अभिप्रायसे
मूलकार 'पदज्ञानं तु' इत्यादिग्रन्थसे शाब्दबोधका प्रकार दिखलाते हैं-
पदज्ञानं तु करणं-
भाषा-शाब्दबोधमें पदज्ञान करण है.
न तु ज्ञायमानं पदं करणं पदाभावेऽपि मौनिश्लोकादौ शाब्द-
बोधात् ।
भाषा-शाब्दबोधमें पदका 'ज्ञानही' करण है, किन्तु ज्ञात हुआ पद 'करण' नहीं
क्योंकि पदोंके न होनेसेभी मौनिपुरुषनिर्मित श्लोकोंसे शाब्दबोध होताहै. भाव यह
कि-शब्दमात्रका श्रोत्रहीसे ज्ञान होना स्वभाव है और 'पद' भी शब्दविशेषहीका
नाम है. वहभी यदि ज्ञात होगा तो श्रोत्रहीसे हुआचाहिये; परन्तु जहां मौनि पुरुषने
अक्षर लेखसे या हस्तादिचेष्टासे दूसरे पुरुषको कुछ बोधन किया है वहां पदके न
होनेसेभी लिपि या चेष्टाद्वारा केवल पदके ज्ञानमात्रसे शाब्दबोध होताहै; इसलिये
ज्ञातहुआ पद 'करण' नहीं, किन्तु पदका ज्ञानही 'करण' हैः
-द्वारं तत्र पदार्थधीः ॥
शाब्दबोधः फलं तत्र शक्तिधीः सहकारिणी ॥८१॥
भाषा-पदजन्यपदार्थोपस्थितिबुद्धिमध्यमें व्यापार है पदशक्ति ज्ञान सहकारी
कारण है. ऐसे स्थलमें शाब्दबोधात्मक फल होताहै ॥ ८१ ॥
पदार्थधीरिरिति । पदजन्यपदार्थस्मरणं व्यापारः, अन्यथा पदज्ञा-
नवतः प्रत्यक्षादिना पदार्थोपस्थितावपि शाब्दबोधापत्तेः।तत्रापि

१८० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
वृत्त्यापदजन्यत्वं बोध्यम् । अन्यथा घटादिपदात्समवायसम्बन्धे-
नाकाशस्मरणे जाते आकाशास्यापि शाब्दबोधापत्तेः ।
भाषा-एवं पदजन्य पदार्थस्मरणमध्यमें व्यापार है. ( अन्यथा ) यदि पदज-
न्यपदार्थस्मरणको व्यापार नहीं मानें, किन्तु पदजन्यपदार्थज्ञानहीको मानें, वह ज्ञान
चाहो जैसाभी हो तौ पदज्ञानवाले पुरुषको प्रत्यक्षादि प्रमाणसे पदार्थ उपस्थिति
होनेसेभी शाब्दबोध होना चाहिये;परन्तु ऐसा होता कभी नहीं. यहां पदजन्यपदार्थ-
स्मरणभी पदकी वृत्तिद्वारा समझना चाहिये.(अन्यथा ) येनकेन सम्बन्धेन कहेंगे तो
घटादि पदोंसे समवायसम्बन्धसे आकाशका स्मरण हुए घटादि पदोंसे आकाशका
शाब्दबोध होना चाहिये.
वृत्तिश्च शक्तिलक्षणान्यतरः सम्बन्धः । अत्रैव शक्तिज्ञानस्योप-
योगः। पूर्वं शक्तिग्रहाभावे पदज्ञानेऽपि तत्सम्बन्धेन स्मरणानुप-
पत्तेः । पदज्ञानस्य च एकसम्बन्धिज्ञानविधयाऽर्थस्मारकत्वम् ।
भाषा-' वृत्ति ' नाम पदपदार्थके परस्परसम्बन्धका है वह सम्बन्ध वाच्यवाचक
बोध्यबोधक ज्ञाप्यज्ञापक भावादि अनेक प्रकारका है वह वृत्ति शक्ति तथा लक्षणा-
भेदसे दोप्रकारकी है. ( अत्रैव ) यहां पदजन्यपदार्थउपस्थितिहीमें शक्तिज्ञानका
उपयोग है; क्योंकि यदि पहले पदशक्तिका ग्रहण न हो तो पदज्ञान होनेसेभी उसके
सम्बन्धसे पदार्थका स्मरण नहीं होता. एवं पदज्ञानको " एक सम्बन्धिज्ञानविधया "
अर्थात् " एकसम्बन्धिज्ञानमपरसम्बन्धिस्मारकं " इस नियमसे जैसे हाथीको देखकर
हाथिवान् महावतका तथा महावतको देखकर हाथीका स्मरण होता है वैसेही पदज्ञा-
नकोभी सम्बन्धिज्ञानविधया अर्थस्मारकत्ता है.
शक्तिश्च पदेन सह पदार्थस्य सम्बन्धः, स चास्माच्छब्दादयमर्थो
बोद्धव्य इतीश्वरेच्छारूपः। आधुनिके नाम्नि शक्तिरस्त्येव।एका-
दशेऽहनि पिता नाम कुर्यादितीश्वरेच्छायाः सत्त्वात् । आधु-
निके तु सङ्केते न शक्तिरिति सम्प्रदायः । नव्यास्त्वीश्वरेच्छा न
शक्तिः, किन्त्विच्छैव । तेनाधुनिकसङ्केतेऽपि शक्तिरस्त्येवेति
वदन्ति । शक्तिग्रहश्च व्याकरणादितः ।
भाषा-पदके साथ पदार्थके सम्बन्धविशेषका नाम 'शक्ति' है. वह सम्बन्धविशेष
“अस्मात्पदादयमर्थो बोद्धव्यः” अर्थात् “ इस पदसे यह अर्थ जानना चाहिये ”

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८१
इत्याकारक ईश्वरकी इच्छारूपही है और माता पिता आदि करके संकेतित चैत्र मैत्रादि
आधुनिक नामोंमेंभी वही शक्ति विद्यमान है; क्योंकि वहांभी “एकादशेऽहनि पिता
नाम कुर्यात्” अर्थात् “ग्यारादिन पीछे पिता अपने पुत्रका नाम रक्खे” इस ईश्वरसंके-
तसे वह शक्ति सामान्यरूपसे विद्यमान है और आधुनिक संकेतित ‘नदी वृद्धि’
आदि पदोंमें वह शक्ति नहीं है, ऐसा साम्प्रदायिक लोग मानते हैं और नवीन लोगों-
का यह कथन है कि ईश्वरकी इच्छारूप पदमें शक्ति नहीं है किन्तु केवल इच्छारूपा
है; वह इच्छा चाहो किसीकी हो. एवं आधुनिक संकेतित पदोंमेंभी शक्ति हो सकतीहै
उस शक्तिके ग्राहक व्याकरणादि आठ हैं.
तथाहि । “शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोषाप्तवाक्याद्व्यवहारत-
श्च । वाक्यस्य शेषाद्विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य
वृद्धाः” ॥
भाषा-( तथाहि ) वही लिखतेहैं कि-पदशक्तिका ग्रहण व्याकरणसे, उपमानसे
कोशसे,आप्तवाक्यसे, व्यवहारसे, वाक्यशेषसे, विवरणसे और प्रसिद्ध पदके सान्निध्यसे
वृद्ध विद्वान् लोग कहतेहैं.
धातुप्रकृतिप्रत्ययादीनां शक्तिग्रहो व्याकरणाद्भवति, क्वचित्तु स-
ति बाधके त्यज्यतेऽपि । यथा वैयाकरणैराख्यातस्य कर्तरि
शक्तिरुच्यते । चैत्रः पचतीत्यादौ कर्त्रा सह चैत्रस्याभेदान्वयः,
तच्च गौरवात् त्यज्यते, किंतु कृतौ शक्तिर्लाघवात् । कृति-
श्चैत्रादौ प्रकारीभूय भासते ।
भाषा-धातुप्रकृति प्रत्ययआदिकी शक्तिका ग्रहण “भूसत्तायाम, वर्तमाने लट्”
इत्यादि व्याकरणसे होताहै; परन्तु यहभी किसी एक स्थलमें गौरवादि दोषके बाधक
होनेसे त्यागना पड़ता है. जैसे वैयाकरण लोग आख्यातकी शक्ति कर्त्तामें मानतेहैं
“चैत्रः पचति” इत्यादि स्थलमें आख्यातवाच्यकर्त्ताके साथ चैत्रका अभेदान्वय है
अर्थात् “लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः ३।४।६९” इत्यादि व्याकरणानुशासनसे
आख्यात वाच्य चैत्रही कर्त्ता है, परन्तु इस प्रकारका व्याकरणसे शक्तिग्रह गौरवभयसे
त्यागना पड़ता है; किन्तु लाघवानुरोधसे आख्यातकी कृतिमें शक्ति माननीही उचित है
भाव यह कि-यदि आख्यातकी कर्त्तामें शक्ति होगी तो शक्यतावच्छेदक कर्तृनिष्ठ
धर्मविशेष कृतिकोही मानना होगा.वह कृति प्रतिकर्तृ भिन्न२ है, एवं शक्यतावच्छेद-
कभी नानाही होंगे. ऐसे नाना अवच्छेदक धर्मके उपस्थित होनेसे उपस्थितिकृत महा-

१८२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
गौरव होगा इसलिये लाघवसे आख्यातकी कर्तृनिष्ठ धर्मविशेषकृतिहीमें शक्ति माननी
उचित है.एवं शक्यतावच्छेदक धर्म यावत् कृतियोंमें रहनेवाली 'कृतित्वरूपा' जाति
होगी वह यावत् कृतिके शिरपर एक है; इसलिये परमलाघव है-इति। न्यायसिद्धान्तमें
जिसमें आख्यातकी शक्ति मानी गई है वह कृति चैत्रादि कर्तामें प्रकारीभूत होकर
प्रतीत हुआ करती है.
न च कर्तुरनभिधानाच्चैत्रादिपदानन्तरं तृतीया स्यादिति वा-
च्यम् । कर्तृसंख्यानभिधानस्य तत्र तन्त्रत्वात् ।
शंका—आपके कथनानुसार लाघवानुरोधसे यदि आख्यात प्रत्ययका अर्थ
कृतिही मान लिया जाय तो अनुक्तकर्तामें "अनभिहिते २-३-१" इस अधिका-
रसे "कर्तृकरणयोस्तृतीया २-३-१८" इस सूत्रसे तृतीयाविभक्ति अर्थात् "चैत्रेण
पचति" इत्याकारक प्रयोगको साधुता होनी चाहिये. समाधान—आख्यातप्रत्ययके
कृति संख्या कालादि अनेक अर्थ विद्वान्लोगोंके अनुभवसिद्ध हैं, एवं जिस स्थलमें
कर्तृगतसंख्या आख्यातप्रत्ययसे अनुक्त होगी वहां तृतीयाका होना सम्भव है;
अन्यथा नहीं.
संख्याभिधानयोग्यश्च कर्मत्वाद्यनवरुद्धः प्रथमान्तपदोपस्था-
प्यः। कर्मत्वादीत्यस्य इतरविशेषणत्वतात्पर्याविषयत्वमर्थः ।
शंका—यही कैसे जाना जाय कि-कर्तृगत संख्या वहां उक्त है और कहां
अनुक्त है? समाधान—कर्मत्वाद्यनवरुद्ध और प्रथमान्तपदबोध्य कर्ता संख्याभि-
धानयोग्य होताहै. 'कर्मत्वाद्यनवरुद्ध' इस भागका इतर विशेषणत्वेन तात्पर्यावि-
षयस्वरूप सांकेतिक अर्थ समझना चाहिये. एवं "इतरविशेषणत्वेन तात्पर्याविषय-
त्वविशिष्टप्रथमान्तपदोपस्थाप्यः कर्ता संख्याभिधानयोग्यः" इत्याकारक समुदित
नियमका स्वरूप है.
तेन चैत्र इव मैत्रो मच्छतीत्यादौ न चैत्रे संख्यान्वयः। यत्र कर्मा-
दौ न विशेषणत्वे तात्पर्यं तद्वारणाय प्रथमान्तेति ।
भाषा—एवं "चैत्र इव मैत्रो गच्छति" इत्यादिस्थलोंमें (गच्छति) उत्तर-
वर्त्ति आख्यात वाच्य संख्याका चैत्रमें अन्वय नहीं होसकता, किन्तु मैत्रहीमें होगा;
क्योंकि चैत्रपदार्थ इव पदार्थसादृश्यमें विशेषणत्वेन तात्पर्यका विषय है. एवं ऐसे
स्थलमें "चैत्रनिरूपितं यत् सादृश्यं तादृशसादृश्येन यत् गमनं तद्गमनानु-
कूला वर्तमानकालिका या कृतिः तादृशकृत्याश्रय एकत्वसंख्याविशिष्टो मैत्रः" इत्या-
कारक शाब्दबोध होताहै. एवं "तण्डुलं पचति" इत्यादिस्थलमें आख्यातार्थ

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १८३
संख्याका तण्डुलमें अन्वयबोधवारणके लिये तथा “चैत्रेण सुप्यते” इत्यादि स्थलमें
धात्वर्थस्वापादिकमें संख्यान्वय बोधवारणके लिये “प्रथमान्तपदोपस्थाप्यः” इस-
भागका निवेश है.
यद्वा धात्वर्थातिरिक्ताविशेषणत्वं प्रथमदलार्थः। तेन चैत्र इव
मैत्रो गच्छतीत्यत्र चैत्रादेर्वारणम्। स्तोकं पचतीत्यादौ स्तोका-
देर्वारणाय च द्वितीयदलम् । तस्य द्वितीयान्तोपस्थाप्यत्वा-
द्वारणम् ।
भाषा-( यद्वा ) अथवा धात्वर्थसे अतिरिक्तका ना विशेषण होना प्रथमभागका
अर्थ है. इस रीतिसेभी “चैत्र इव मैत्रो गच्छति” इस स्थलमें चैत्रादिका वारण होस-
कताहै; क्योंकि चैत्रपदार्थ धात्वर्थसे अतिरिक्त ( इव ) अर्थसादृश्यमें विशेषणही है
और “ स्तोकं पचति मृदु पचति ” इत्यादि स्थलोंमें स्तोकादिमें आख्यातार्थ-
संख्याका अन्वयवारणके लिये ‘ प्रथमान्त ’ इत्यादि द्वितीय दलका निवेश है. भाव
यह कि- स्तोकादि पदार्थोंको क्रियाके विशेषण होनेसे यद्यपि उनमें धात्वर्थातिरि-
क्ताविशेषणत्व स्वतःसिद्ध है. वहां आख्यातार्थसंख्याका अन्वय अवश्य हुआ चाहिये.
तथापि ‘ प्रथमान्तपदोपस्थाप्यत्व ’ रूप नियमका द्वितीय अंश उनमें नहीं है
इसलिये आख्यातार्थसंख्या अन्वय योग्यताभी उनमें नहीं है; क्योंकि ‘क्रियाविशेष-
णानां कर्मत्वम् ’ इस अनुशासनसे स्तोकादिपदोंको द्वितीयान्त पदोपस्थाप्यता है.
एवं व्यापारेऽपि न शक्तिर्गौरवात् । रथो गच्छतीत्यादौ व्यापारे
आश्रयत्वे वा लक्षणा, जानातीत्यादौ त्वाश्रयत्वे, नश्यतीत्यादौ
प्रतियोगित्वे निरूढलक्षणा । १ ।
भाषा-एवं ‘लकारमात्रकी व्यापारमें शक्ति माननी’ यह मीमांसकमतभी समी-
चीन नहीं; क्योंकि जन्यत्वादि घटित व्यापारभी यत्नत्वजात्यापेक्षया गुरुभूतही है.
एवं “ रथो गच्छति-” इत्यादि स्थलमें गमनानुकूलव्यापारमें किंवा गमनानुकूल
व्यापारके आश्रयमें आख्यात प्रत्ययकी ( निरूढा ) नित्यतातपर्यवती लक्षणावृत्ति
है. एवं “चक्षुर्जानाति” इत्यादि स्थलमें ज्ञानानुकूल व्यापार आश्रयत्वमें तथा “घटो
नश्यति ” इत्यादि स्थलमें नाशानुकूल व्यापाराश्रयत्वमें अर्थात् प्रतियोगित्वमें
नित्यतात्पर्यवती निरूढ लक्षणाही समझनी चाहिये.-इति १ ।
उपमानाद्यथा शक्तिग्रहस्तथोक्तम् । २ ।
भाषा-एवं गोनिरूपित गवयनिष्ठ सादृश्यसाक्षात्काररूप उपमानसे जैसे

१८४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
“गवयो गवयपदवाच्यः” इत्याकारक शक्तिग्रहण होता है, वह हम उपमान निरूपण
अवसरमें कहचुकेहैं २ ।
एवं कोषादपि शक्तिग्रहः सति बाधके क्वचित्त्यज्यते । यथा
नीलादिपदानां नीलरूपादौ नीलादिविशिष्टे च शक्तिः कोष व्यु-
त्पादिता तथापि लाघवान्नीलादौ शक्तिः, नीलादिविशिष्टे तु ल-
क्षणेतिं । ३ ।
भाषा-एवं कोशसेभी पदशक्तिका ग्रहण होता है; परन्तु बाधक सद्भावस्थलमें
इसकाभी त्याग करना पड़ता है. जैसे अमरादिकोषोंमें “ गुणे शुक्लादयः पुंसि
गुणिलिंगास्तु तद्वति ” अर्थात् ' शुक्ल ' आदि शब्द रूपके वाचक नियत पुंलिंग
रहतेंहैं और रूपवालेके वाचक होवें तो रूपवालेके लिंगका आश्रयण करतेहैं. ऐसा
लिखा है. परन्तु यहांभी शुक्लनीलादिपदोंकी लाघवसे शुक्लनीलादिरूपहीमें शक्ति
माननी उचित है; क्योंकि ' नीलादिमत्त्व ' की अपेक्षासे 'नीलत्व आदि ' जातिके
शक्यतावच्छेदक माननेमें लाघव प्रतीत होता है और नीलादिरूप विशिष्टमें
नीलादि पदोंकी लक्षणा होती है; यह सिद्धान्त है. और कई एक विद्वान् यहभी
कहतेंहैं कि-ऐसे स्थलमें लक्षणा माननेका कुछ प्रयोजन नहीं है; क्योंकि “गुणव-
चनेभ्यो मतुपोलुगिष्टः” इस वार्तिकसे लुप्त 'मतुप्' प्रत्ययसेही बोध होसकता है फिर
लक्षणा माननी निष्फल है ३ ।
एवमाप्तवाक्यादपि, यथा कोकिलः पिकपदवाच्य इत्यादिश-
ब्दात् पिकादिपदशक्तिग्रहः । ४ ।
भाषा-ऐसेही यथार्थवक्ता पुरुषके कथनसेभी पदशक्तिका ग्रहण होता है जैसे
किसी ' पिक ' पदके अर्थके न जाननेवाले बालकने किसी योग्यपुरुषसे पूंछा कि-
' पिक ' किसको कहतेंहैं? तो उस योग्यपुरुषने कहा कि-'पिक' नाम कोकिलाका
है तो ऐसे स्थलमें ' पिक' पदके अर्थको न जाननेवाले बालकको उस आप्त पुरुषके
वचनसे ' पिक ' पदकी शक्तिका ग्रहण होजाता है ४ ।
एवं व्यवहारादपि । यथा प्रयोजकवृद्धेन घटमानयेत्युक्तं,तच्छ्रु-
त्वा प्रयोज्यवृद्धेन घट आनीतस्तदवधार्य पार्श्वस्थो बालो घटा-
नयनरूपं कार्यं घटमानयेति शब्दप्रयोज्यमित्यवधारयति
ततश्च घटं नय गामानयेत्यादावावापोद्वापाभ्यां घटादिपदानां