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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 350 में से

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पृष्ठ 196

१७२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
बाधसत्प्रतिपक्षभिन्ना ये हेत्वाभासव्याप्यास्ते तन्मध्य एवान्त-
र्भवन्ति, अन्यथा हेत्वाभासाधिक्यप्रसङ्गात् । बाधव्याप्यसत्प्र-
तिपक्षस्तु भिन्न एव, स्वतन्त्रेच्छेन मुनिना पृथगुपादानात् ।
सत्प्रतिपक्षव्याप्यस्तु न प्रतिबन्धक इति प्रघट्टकार्थः ॥७२ ॥
भाषा-बाधसत्प्रतिपक्षसे भिन्न सव्यभिचारादि हेत्वाभासोंके व्याप्य साधारणा-
नैकान्तिकादि हेत्वाभासभी उनहीके मध्यपाती गिने जाते हैं अर्थात् सव्यभिचारको
साधारणादिभेदसे दूषकता तीन प्रकारसे है परन्तु सव्यभिचार दोष एकहीहै ऐसेही
असिद्धकोभी जानना उचित है. यदि ऐसा नहीं मानें तो हेत्वाभासोंकी गणना
अधिक होजायंगी और बाधदोषका व्याप्यरूप सत्प्रतिपक्ष दोष तो भिन्नही मानना
उचित है; क्योंकि स्वतंत्र इच्छावाले गौतममुनिने इसको पृथक्ही ग्रहण किया है. एवं
सत्प्रतिपक्षके व्याप्य दोषोंकोभी पृथक् प्रतिबन्धकता नहीं है किन्तु प्रबल होनेसे ऐसे
स्थलमें सत्प्रतिपक्षदोषही प्रतिबन्धक होताहै यह संक्षेपसे समुदायार्थका निरूपण है ७२
यः सपक्षे विपक्षे च भवेत्साधारणस्तु सः ॥
भाषा-जो हेतु सपक्ष विपक्ष दोनोंमें रहे वह साधारण कहाजाता है.
यः सपक्ष इति । सपक्षविपक्षवृत्तिः साधारण इत्यर्थः । सपक्षो नि-
श्चितसाध्यवान्, विपक्षः साध्याभाववान् । विरुद्धवारणाय सप-
क्षवृत्तित्वमुक्तम्। वस्तुतो विपक्षवृत्तित्वमेव वाच्यम् । विरुद्धस्य
साधारणत्वेऽपि दूषकताबीजस्य भिन्नतया तस्य पार्थक्यात् ।
भाषा-जो हेतु निश्चित साध्यवाले तथा निश्चित साध्याभाववालेमें रहे वह
'साधारण' होताहै; निश्चित साध्यवाले स्थलका नाम 'सपक्ष' है निश्चित साध्याभाववाले
स्थलका नाम 'विपक्ष' है केवल विपक्षमात्रमें वर्तनेबाला हेतु विरुद्ध होताहै; एवं साधारणके
लक्षणमें यदि ' सपक्षवृत्तित्व' रूप विशेषण न दिया जाय किन्तु केवल 'विपक्षवृत्ति-
रसाधारणा'ऐसा कहा जाय तो विरुद्धमें इस लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी; उसके वारणार्थ
'सपक्षवृत्ति' यह विशेषण सफल है. वास्तवसे यदि 'विपक्षवृत्तित्व' इतनामात्रभी साधा-
रणका लक्षण किया जाय तो दोष नहीं. एवं लक्षणसे यद्यपि विरुद्धको साधारणता
प्रतीत होगी तथापि दूषकता बीजके भेदसे भेदही रहेगा. भाव यह कि-साधारण तो
अव्यभिचारज्ञानके प्रति प्रतिबन्धक है और विरुद्ध सामानाधिकरण्य ग्रहका प्रतिब-
न्धक है; इसलिये दोनों परस्पर भिन्न हैं.
यस्तूभयस्माद्व्यावृत्तः स त्वसाधारणो मतः ॥७३॥