न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 199, कुल 350 में से
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परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १७५
व्याप्यत्वासिद्धिरपरा नीलधूमादिके भवेत् ॥
भाषा- "पर्वतो वह्निमान् नीलधूमात्" इत्यादि स्थलमें व्याप्यत्वासिद्धि है.
नीलधूमादिक इति । नीलधूमत्वं गुरुतया न हेतुतावच्छेदकम्,
स्वसमानाधिकरणव्याप्यतावच्छेदकधम्र्म्मान्तराघटितस्यैव व्या-
प्यतावच्छेदकत्वात् ।
भाषा-ऐसे स्थलमें 'नीलधूमत्व' रूप धर्म गुरुभूत होनेसे हेतुताका अवच्छे-
दक नहीं होसकता; क्योंकि 'स्वसमानाधिकरणव्याप्यतावच्छेदक धर्मान्तराघटित
धर्मही व्याप्यतावच्छेदक होता है. यह नियम है. इसमें 'स्व' पदसेवि वक्षित
व्याप्यतावच्छेदक धर्मका ग्रहण है. प्रकृतमें वह धर्म 'नीलधूमत्व' है. 'स्व'
पदसे उसीका ग्रहण होगा. एवं नीलधूमत्वसमानाधिकरण व्याप्यतावच्छेदक
धर्मान्तर शुद्धधूमत्वरूप धर्मभी होसकता है. उस शुद्धधूमत्वरूप धर्मसे घटितही नीलधूम-
त्वरूप धर्म है, अघटित नहीं है; इसलिये नीलधूमत्वरूप धर्म अवच्छेदक होनेके
योग्य नहीं है. किन्तु 'धूमत्व' धर्म व्याप्यतावच्छेदक धर्मान्तराघटित होनेसे
पूर्वोक्त व्याप्यतावच्छेदकके लक्षणका लक्ष होसकता है.
धूमप्राग्भावत्वसंग्रहाय स्वसमानाधिकरणेति ।
भाषा-यहां व्याप्यतावच्छेदकके लक्षणमें 'स्वसमानाधिकरण' भागका निवेश
"यज्ञशाला वह्निमती भविष्यति धूमप्राग्भावात्" इत्यादि स्थलमें धूमप्राग्भावत्व
रूप धर्मके संग्रहके लिये समझना चाहिये अर्थात् यदि केवल 'व्याप्यताव-
च्छेदक धर्मान्तराघटित्व' मात्र कहेंगे तो 'धूमप्राग्भावत्व' रूप धर्म
व्याप्यतावच्छेदक धर्मान्तराघटित नहीं है; किन्तु व्याप्यतावच्छेदकीभूत 'धूम-
त्व' रूप धर्मसे घटितही है. एवं अवच्छेदक नहीं होसकेगा, परन्तु यदि
लक्षणमें 'स्वसमानाधिकरण' भागका निवेश करते हैं तो दोष नहीं. क्योंकि
'धूमप्राग्भावत्व' रूप धर्म धूमप्राग्भावमें रहता है और धूमत्व धूममें
रहता है. एवं इन दोनोंका परस्पर समानाधिकरण नहीं है. हमको स्वसमानाधिकरण
वृत्ति धर्मान्तराघटितत्व व्याप्यतावच्छेदकमें विवक्षित है; व्यधिकरणवृत्ति धर्मान्तर
चाहो व्याप्यतावच्छेदककी कुक्षिमें रहेभी तो हानि नहीं है.
विरुद्धयोः परामर्श हेतुत्वोः सत्प्रतिपक्षता ॥ ७७ ॥
भाषा-परस्पर विरोधि हेतुओंके परामर्शस्थलमें सत्प्रतिपक्ष होता है॥७७॥
विरुद्धयोरिति । कपिसंयोगतदभावव्याप्यवत्त्वपरामर्शोऽपि न
सत्प्रतिपक्षतत्वमत उक्तं विरुद्धयोरिति । तथा च स्वसाध्यवि-