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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 200

१७६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
रुद्धसाध्याभावव्याप्यवत्तापरामर्शकालीनसाध्यव्याप्यवत्तापरा-
मर्शविषय इत्यर्थः ॥ ७७ ॥
भाषा-वृक्षत्वादि हेतुमें कपिसंयोग तथा कपिसंयोगाभाव व्याप्यवत्त्वपरामर्श
होनेसेभी सत्प्रतिपक्षत्वव्यवहार नहीं होता; क्योंकि ऐसे स्थलमें किसी हेतुका परस्पर
विरोध नहीं है. एवं स्वसाध्यसे विरुद्ध जो साध्य उस साध्यके अभावव्याप्यवत्ता
परामर्शकालहीमें साध्यव्याप्यवत्ता परामर्शका विषय सत्प्रतिपक्ष होताहै.“ ह्रदो वह्नि-
मान् धूमात्, ह्रदो वह्न्यभाववान् जलात्” इत्यादिस्थलमें ‘ स्व ’ पदसे जलरूप हेतु
उसका जो वह्न्यभावरूप साध्य उससे विरुद्ध जो वह्निरूप साध्य उस साध्यका जो
अभाव एतादृशाभाव व्याप्यवत्ता परामर्शकालहीमें स्वसाध्यव्याप्यवत्ता परामर्शका
विषय जलरूप हेतु है. ऐसेही हरएक सत्प्रतिपक्षस्थलमें जान लेना ॥७७॥
साध्यशून्यो यत्र पक्षस्त्वसौ बाध उदाहृतः ॥
उत्पत्तिकालीनघटे गन्धादिर्यत्र साध्यते ॥ ७८ ॥
भाषा-जिस स्थलमें पक्षमें साध्य न हो वहां बाधदोष होता है, जैसे-कोई ‘उत्प-
त्तिकालावच्छिन्नो घटः गन्धवान् पृथिवीत्वात् ’ ऐसी अनुमानरचना करे तो ऐसे स्थलमें
बाधदोष समझना चाहिये ॥ ७८ ॥
साध्यशून्य इति । पक्षः पक्षतावच्छेदकविशिष्ट इत्यर्थः । तेन
घटे गन्धसत्त्वेऽपि न क्षतिः। एवं मूलावच्छिन्नो वृक्षः कपिसंयो-
गीत्यत्रापि बोध्यम् ॥ ७८ ॥
इति श्रीविश्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्यविरचितायां सिद्धान्तमुक्ता-
वल्यामनुमानखण्डम् ॥ २ ॥
भाषा-‘पक्ष’शब्दसे पक्षतावच्छेदकदेशकालविशिष्ट पक्षका ग्रहण करना चाहिये.
एवं कालान्तरमें घटमें गन्ध रहेभी तो बाधलक्षणकी अव्याप्ति नहीं है; किंवा यह
स्थल बाधलक्षणका अलक्ष नहीं होसकता. ऐसेही “ मूलावच्छिन्नो वृक्षः कपिसंयोगी
एतद्वृक्षत्वात् ” इत्यादि स्थलमेंभी बाध समझना चाहिये पूर्वोक्त स्थलमें कालकी
तरह यहां देश अवच्छेदक है अर्थात् यद्यपि वृक्षमें शाखावच्छेदेन कपिसंयोग विद्यमान
है एवं पक्षमें साध्याभावरूप बाधदोष बननहीं सकता तथापि मूलावच्छेदेन कपिसंयोग
नहीं है. एवं मूलरूप देशके अवच्छेदक होनेसे यहां बाधदोष होसकताहै ॥ ७८ ॥
इति श्रीगोविन्दसिंहसाधुकृते आर्यभाषाविभूषित न्यायसिद्धान्तमुक्तावली
प्रकाशे अनुमान परिच्छेदः ॥ २ ॥