न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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अनेक हैं, यहांभी हृदादि पक्षमें व्याप्यत्वेनाभिमत धूमरूप हेतुके अभावका ज्ञान
होनेसे " द्रव्यव्याप्यधूमवान् ह्रदः " इत्याकारक ज्ञानरूप परामर्शका प्रतिबन्ध
होनाही फल है २ ।
साध्याप्रसिद्धिरपि व्याप्यत्वासिद्धिः। सा च साध्ये साध्यतावच्छे-
दकाभावः । तथा च काञ्चनमयवह्निमानित्यादौ साध्ये साध्यता-
वच्छेदकाभावे ज्ञाते साध्यतावच्छेदकविशिष्टसाध्यव्याप्यवत्ता-
ज्ञानरूपपरामर्शप्रतिबन्धः फलम् ।
भाषा-साध्याप्रसिद्धिकी गणनाभी व्याप्यत्वासिद्धिकेही अंतर्भूत है. जिस
स्थलमें साध्यमें साध्यतावच्छेदक धर्मकी सम्भावना न हो वहां साध्याप्रसिद्धि
होती है; उदाहरणस्थल इसके " पर्वतः कांचनमयवन्हिमान् धूमात् " इत्यादि
अनेक होसकतेहैं. यहांभी ‘ कांचनमयवन्हित्व ’ रूप साध्यतावच्छेदक धर्मके
अभावका ज्ञान होनेसे " कांचनमयवन्हिव्याप्यधूमवान् पर्वतः " इत्याकारक
ज्ञानरूप परामर्शका प्रतिबन्ध होनाही फल है.
एवं हेतौ हेतुतावच्छेदकाभावः साधनाप्रसिद्धिः । यथा च काञ्च-
नमयधूमादित्यादौ अत्र हेतुतावच्छेदकविशिष्टहेतोर्ज्ञानाभावात्
तद्धेतुकव्याप्तिज्ञानादेरभावः फलम् । एवं वह्निमान् नीलधूमा-
दित्यादौ गुरुतया नीलधूमत्वं हेतुतानवच्छेदकमिति व्याप्यत्वा-
सिद्धिरित्यपि वदन्ति । ३ । ४ ।
भाषा-ऐसेही जिस स्थलमें हेतुमें हेतुतावच्छेदक धर्मका सम्भव न हो वहां
साधनाप्रसिद्धि होती है; उदाहरणस्थल इसके" पर्वतो वन्हिमान् कांचनमयधूमात् "
इत्यादि अनेक होसकतेहैं. ऐसे स्थलमें कांचनमयधूमत्वरूप हेतुतावच्छेदकविशिष्ट
‘ कांचनमयधूम ’ रूप हेतुके ज्ञानको न होनेसे उस हेतुसे उत्पन्न होनेवाले
व्याप्तिज्ञानकी अनुत्पत्ति ही फल है. ऐसेही गुरुधर्ममें अवच्छेदकताके
ना माननेवाले कई एक विद्वान् लोग " पर्वतो वन्हिमान् नीलधूमात् '
इत्यादि स्थलकोभी व्याप्यत्वासिद्धिका उदाहरण मानतेहैं. ऐसे स्थलमें
‘नीलधूमत्व ’ रूप धर्म समनियत लघुभूत धूमत्वरूप धर्म्मसे गुरुभूत होनेसे हेतु-
तावच्छेदक धर्म नहीं होसकता इसीसे तद्विशिष्ट व्याप्ति ज्ञानभी नहीं होसकता;
यही उनके कथनका भाव है; परन्तु यह सिद्धान्त सर्वसम्मत नहीं है ३ । ४ ।