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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 350 में से

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पृष्ठ 193

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६९
बाधस्तु पक्षे साध्याभावादिः। एतस्यानुमितिप्रतिबन्धः फलम्।
तद्धर्मिकतदभावनिश्चयो लौकिकसन्निकर्षाजन्यदोषविशेषाज-
न्यतद्धर्मिकतज्ज्ञानमात्रे विरोधीति।
भाषा-जिस स्थलमें पक्षमें साध्य न रहे वहां बाधदोष होताहै. वही 'एकज्ञान-
विषयत्वसम्बन्धेन' हेतुके सिरपर जाताहै तो हेतुमें बाधित व्यवहार होताहै. उदा-
हरणस्थल इसके "वह्निरनुष्णः द्रव्यत्वात्" इत्यादि अनेक होसकतेहैं. साक्षात्
अनुमितिके प्रतिरोधक होना इस बाधरूप दोषका फल है. तद्धर्मिक तद-
भावनिश्चय अर्थात् अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानाऽनास्कन्दित तद्धर्मिक तद्भावनिश्चय
लौकिकसन्निकर्षाजन्य दोषविशेषाजन्य तद्धर्मिक तद्ज्ञानमात्रके प्रति विरोधी होताहै.
इस नियममें प्रथम 'तत्' पदसे प्रकृतोपयोगि धर्मका ग्रहण है; द्वितीय 'तत्' पदसे
धर्मीका ग्रहण है और बाधकालीन इच्छाजन्य ज्ञानका नाम आहार्यज्ञान है. 'शाल-
ग्रामशिलामें ईश्वरबुद्धि करनी, प्रतिमामें देवबुद्धि करनी' इत्यादि इस ज्ञानके
उदाहरणस्थल हैं. इस प्रकारका आहार्य्य जो न हो वह कहावे अनाहार्य्य; एवं
संशयादि ज्ञानोंका नाम 'अप्रामाण्य ज्ञान' है. 'स्कन्दित' नाम संमिश्रितका है.
अप्रामाण्यज्ञानसे स्कन्दित अर्थात् मिश्रित जो नहीं है उसका नाम 'अप्रामाण्यज्ञा-
नानास्कन्दित' है. ऐसे अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दित तद्धर्मिक तदभावनिश्चयको
लौकिकसन्निकर्षाजन्य दोषविशेषाजन्य तद्धर्मिक तद्ज्ञानमात्रके प्रति प्रतिबन्धकता
है. प्रत्यक्षभिन्न ज्ञानमात्र लौकिकसन्निकर्षाजन्य है, उन लौकिक सन्निकर्षजन्य ज्ञानों-
मेंसे एक दोषविशेषसे जन्य 'पीतः शंखः' इत्यादि ज्ञानको छोड़कर यावत् ज्ञानके
प्रति तद्धर्मिक तद्भावनिश्चयको विरोधिता है. एवं प्रकृतमें वह्नयात्मक पक्षमें अनुष्ण
त्वधर्मिक अनुष्णाभाववत्ता निश्चयको अर्थात् 'वह्निरुष्णः' इत्यादि स्पार्शनिक
साक्षात्कारकोभी अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दित तद्धर्मिक तदभावनिश्चयरूप
होनेसे 'वह्निरनुष्णः' इत्यादि अनुमितिके प्रति प्रतिबन्धकता होसकतीहै;क्योंकि अनु-
मित्यात्मक ज्ञानभी लौकिकसन्निकर्षाजन्य दोषविशेषाजन्य तद्धर्मिक तद्ज्ञानरूप
प्रतिबध्य कोटिके अंतर्भूतही है-इति.
न तु तत्र संशयसाधारणं पक्षे साध्यसंसृष्टत्वज्ञानमनुमितिकारणं
तद्विरोधितया च बाधसत्प्रतिपक्षयोर्हेत्वाभासत्वमिति युक्तम्।
अप्रसिद्धसाध्यकानुमित्यनापत्तेः, साध्यसंशयादिकं विनाऽप्यनु-
मित्युत्पत्तेश्च।
भाषा-किसीएक विद्वानका यह मत है कि-पक्षमें संशय साधारण साध्यसम्ब-
न्धका ज्ञान अनुमितिका कारण है और अनुमिति करणीभूत साध्यसंसृष्टत्व ज्ञानके