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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 350 में से

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पृष्ठ 197

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १७३
भाषा-जो हेतु सपक्ष विपक्ष दोनोंमें नहीं रहता किंतु केवल पक्षमात्रवृत्ति है वह
असाधारण कहा जाता है ॥ ७३ ॥
यस्तूभयस्मादिति । सपक्षविपक्षव्यावृत्त इत्यर्थः । सपक्षः सा-
ध्यवत्तया निश्चितः, विपक्षः साध्यशून्यतया निश्चितः । शब्दो
ऽनित्यः शब्दत्वादित्यादौ यदा शब्देऽनित्यत्वसन्देहस्तदा सप-
क्षत्वं घटादीनामेव, तद्व्यावृत्तं च शब्दत्वमिति तदा तदसाधार-
णम्।यदा तु शब्देऽनित्यत्वनिश्चयः तदा नासाधारणः।इदं च प्रा-
चां मतम्, नवीनमतं तु पूर्वमुक्तम् ॥ ७३ ॥
भाषा-सपक्षविपक्षसे व्यावृत्तहेतुका नाम ' असाधारण है ' यहां साध्यवत्त्वेन
निश्चितका सपक्षरूपसे ग्रहण है तथा साध्याभाववत्त्वेन निश्चित स्थलका विपक्षरूपसे
ग्रहण है;यहां निश्चयका विशेषरूपसे निवेश है.फल इसका यह है कि-“शब्दोऽनित्यः
शब्दत्वात्”इत्यादि स्थलमें यदि शब्दात्मक पक्षमें अनित्यत्वरूप साध्यका संदेह होगा
तो सपक्ष घटपटादि होंगे; क्योंकि वह अनित्यत्वरूप साध्यवत्त्वेन निश्चित है. विपक्ष
गगनादि होंगे;इन दोनोंसे व्यावृत्त केवल शब्दपक्षमात्रमें रहनेवाला शब्दत्वरूप हेतु तौ
असाधारण हो सकता है, परन्तु यदि शब्दमें कृतकत्वेन अनित्यत्वका निश्चय होचुका
है तौ शब्दत्वरूप हेतु असाधारण नहीं कहासकता. यह व्यवस्था माचीनसिद्धान्तसे है
और नवीन सिद्धान्त तौ वही है जो कि, हम “साध्यासमानाधिकरणो हेतुरसाधारणः”
इत्यादि लक्षणसे पूर्व कह चुकेहैं. ॥ ७३ ॥
तथैवानुपसंहारी केवलान्वयिपक्षकः ।
भाषा-एवं जिस हेतुका पक्ष केवलान्वयि हो वह अनुपसंहारी कहाजाताहै.
केवलान्वयिपक्षक इति । केवलान्वयिधर्मावच्छिन्नपक्षक इत्यर्थः ।
सर्वमभिधेयं प्रमेयत्वादित्यादौ सर्वस्यैव पक्षत्वात् सामानाधिक-
रण्यग्रहस्थलान्तराभावान्नानुमितिः । इदं तु न सम्यक् । पक्षै-
कदेशे सहचारग्रहेऽपि क्षतेरभावात् । अस्तु वा सहचाराग्रहस्ता-
वताप्यज्ञानरूपाऽसिद्धिरेव न तु हेत्वाभासत्वं तस्य, तथापि के-
वलान्वयिसाध्यकत्वं तत्त्वमित्युक्तम् ।
भाषा-अर्थात् केवलान्वयि धर्मावच्छिन्न पक्षस्थलमें अनुपसंहारी दोष होताहै;
वह पूर्वोक्त सम्बन्धसे हेतुमें भान होता है “ सर्वमभिधेयं प्रमेयत्वात् ”