न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६५
विनाशि दोषवशसे घटवाली जगहमें घटाभावव्याप्यवत्ता ज्ञान होनेसेभी पश्चात्
सम्यक् चक्षुःसम्बन्धसे वहांही घटवत्ताका ज्ञान होताहै. यह अनुभवसिद्ध है अर्थात्
ऐसे स्थलमें दोषसे चक्षुःसंयोगरूप गुण प्रबल होताहै.
यथा च शंखे सत्यपि पीतत्वाभावव्याप्यशंखत्ववत्ताज्ञाने पि-
त्तादिदोषेण पीतः शंख इति धीर्जायते । एवं कोटिद्वयव्याप्यव-
त्तादर्शनेपि कोटिद्वयस्य प्रत्यक्षरूपः संशयो भवति तथा सत्प्र-
तिपक्षस्थले संशयरूपानुमितिर्भवत्येव ।
भाषा-एवं जैसे अदूषितनेत्र पुरुषको शंखमें पीतत्वाभावव्याप्य शंखत्ववत्ता ज्ञान
होनेसेभी पश्चात् पित्तादि दोषवशसे 'पीतः शंखः' इत्याकारक बुद्धि होजातीहै, यहभी
अनुभवसिद्ध है अर्थात् ऐसे स्थलमें गुणसे दोषकी प्रबलता है. एवं जैसे मन्द अन्ध-
कारमें पुरुषको स्थाणुमें या पुरुषमें "स्थाणुर्वा पुरुषो वा" इत्याकारक कोटिद्वयावगाहि
यदि प्रत्यय हो तो ऐसे स्थलमें 'स्थाणुत्वव्याप्यवक्रकोटरादिमत्त्व' तथा 'पुरुषत्व-
व्याप्यकरचरणादिमत्त्व' रूप कोटिद्वय व्याप्यवत्ता दर्शनसेभी कोटिद्वयका प्रत्यक्षा-
त्मक संशयही होता है, यह अनुभवसिद्ध है अर्थात् ऐसे स्थलमें गुण या दोष कोई
निर्बल सबल नहीं है किन्तु दोनों समबल हैं. वैसेही सत्प्रतिपक्षस्थलमेंभी दोनों हेतु-
ओंको समबल होनेसे संशयात्मिक अनुमिति होसकतीहै.
यत्र चैककोटिव्याप्यदर्शनं तत्राधिकबलतया द्वितीयकोटिभान-
प्रतिबन्धान्न संशयः। फलबलेन चाधिकसमबलभावः कल्प्यत इति
वदन्ति । तन्न । तदभावव्याप्यवत्ताज्ञाने सति तदुपनीतभानवि-
शेषशाब्दबोधादेरनुदयाल्लौकिकसन्निकर्षजन्यदोषविशेषाजन्य-
ज्ञानमात्रे तस्य प्रतिबन्धकता लाघवात् ।
भाषा-और जहां एककोटिव्याप्यवत्ता ज्ञान निःसंदेह होचुका है वहां वह कोटि
अधिक बलवाली होनेसे द्वितीय कोटिका प्रतिबन्धक अवश्य होगी; इसलिये ऐसे
स्थलमें संशय नहीं होसकता. कोटियोंके अधिक समबलभावकी कल्पना फलानु-
रोधसे हरएक स्थलमें होसकती है; ( तन्न ) यह कथन रत्नकोशकारका युक्तियुक्त
नहीं है; क्योंकि ज्ञानोंका परस्पर प्रतिबध्यप्रतिबन्धकभाव जहां तक हो सके लाघवा-
नुरोधसे मानना उचित है और यह वार्ता विद्वान् लोगोंके अनुभवसिद्ध है कि जिस
स्थलमें साध्याभावव्याप्यवत्ताका ज्ञान साक्षात्कारात्मक हुआ है उसी स्थलमें उसी