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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 350 में से

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पृष्ठ 194

१७० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली-- [ अनुमान-
विरोधि होनेसे बाधसत्प्रतिपक्षमें हेत्वाभासता है, परन्तु यह कथन उसका युक्तियुक्त
नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा हो तो "पृथिव्यामितरभेदः" इत्याकारक अप्रसिद्ध
साध्यक अनुमिति उत्पन्न नहीं होनी चाहिये. भाव यह कि-ऐसे स्थलमें अनुमितिसे
पहिले पक्षमें साध्यसंसृष्टत्वका ज्ञान किसी तरहसेभी नहीं है और घनगर्जनादि स्थलोंमें
साध्यसंशय आदिकसे बिनाही अनुमितिज्ञानकी उत्पत्ति देखी जातीहै इसलिये
पक्षमें संशयसाधारणसाध्यसंसृष्टत्वज्ञानकी अनुमितिकेप्रति कारण मानना उचित नहीं.
एवं साध्याभावज्ञाने प्रमात्वज्ञानमपि न प्रतिबन्धकम्, प्रमाणा-
भावात् , गौरवाच्च ।
भाषा-एवं प्राचीन लोग साध्याभावज्ञानमें प्रमात्वबुद्धिको प्रतिबन्धक मानतेहैं
अर्थात् "हृदो वह्निमान्" इत्यादि अनुमितिज्ञानके प्रति "हृदो वह्न्यभाववान्"
इत्यादिज्ञानमें "इदं ज्ञानं प्रमा" इत्याकारक ज्ञानको प्रतिबन्धकता मानतेहैं परन्तु
ऐसा मानना उनका प्रमाणशून्य होनेसे समीचीन नहींहै. भाव यह कि-ज्ञाननिष्ठा
प्रतिबन्धकता ग्राह्याभावमुद्रिया होतीहै और "इदं ज्ञानं प्रमा" इत्याकारक ज्ञान तो
ग्राह्याभावानवगाहि है क्योंकि प्रकृतमें ग्राह्य वह्निरूप साध्य है, ग्राह्याभाव वह्न्यभाव
है. उसके अवगाहन करनेवाला ज्ञान "ह्रदो वह्न्यभाववान्" इत्याकारकही होसकता
है; इसलिये यही प्रतिबन्धक है. किन्तु "इदं ज्ञानं प्रमा" इत्याकारक नहीं और
पक्षविशेष्यक साध्याभाव ज्ञानमें प्रमात्वनिश्चयत्वेन गुरुभूत प्रतिबन्धकता कल्पना
करनकी अपेक्षा संशय निश्चय साधारणअप्रामाण्यज्ञानाभावत्वेन प्रतिबन्धकता
माननीही लाघव है.
अन्यथा सत्प्रतिपक्षादावपि तदभावव्याप्यवत्ताज्ञाने प्रमात्ववि-
षयकत्वेन प्रतिबन्धकतापत्तेः । किंतु भ्रमत्वज्ञानानास्कन्दित-
बाधादिबुद्धेः प्रतिबन्धकता,तत्र भ्रमत्वशङ्काविघटनेन प्रामाण्य-
ज्ञानं क्वचिदुपयुज्यते ।
भाषा-(अन्यथा)यदि साध्याभावज्ञानमें प्रमात्वज्ञानही प्रतिबन्धक मानें तो सत्प्रति-
पक्षादि स्थलोंमेंभी अनुमितिज्ञानके प्रति साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानमें प्रमात्वविषय-
कत्वेनही प्रतिबन्धकता होनी चाहिये; परन्तु यह वार्ता किसी विद्वान्के स्वीकृत
नहीं है, किन्तु भ्रमत्वज्ञानशून्य बाधज्ञानको प्रतिबन्धकता विद्वान्लोगोंके अभिमत
है. एवं ( तत्र ) बाधादि स्थलमें भ्रमत्वशंकानिवारणके लिये किसी एक स्थलमें
प्रामाण्यज्ञानकाभी उपयोग होताहै; अन्यथा नहीं.