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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

१७६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ उपमानप० ३
जाङ्गली पुरुषका कहा हुआ वचन उस वचनके अर्थका स्मरण उस पुरुषको होताहै,
वह स्मरणही होनेवाली उपमितिके प्रति मध्यमें व्यापार है.
तदनन्तरं तत्र गवयो गवयपदवाच्य इति ज्ञानं जायते तदुप-
मितिः, न त्वयं गवयपदवाच्य इत्युपमितिः, गवयान्तरे शक्ति
ग्रहाभावप्रसङ्गात् ॥ ७९ ॥ ८० ॥
इति श्रीविश्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्यविरचितायां सिद्धान्त-
मुक्तावल्यामुपमानखण्डम् ॥ ३ ॥
भाषा-उसके पीछे उस पुरुषको “ गवयो गवयपदवाच्यः-अर्थात् ऐसे पशुका
नामही 'गवय' है ” इत्याकारक ज्ञान होताहै. इसीका नाम 'उपमितिज्ञान' है. यहां
“ अयं गवयपदवाच्यः ” इत्याकारक उपमितिका स्वरूप मानना अर्थात् उपमि-
तिके विषयको इदन्ताविशिष्ट करना उचित नहीं; क्योंकि ऐसा माननेसे अन्य
गवय व्यक्तियोंमें ' गवय ' पदकी शक्ति ग्रहण नहीं होसकती और वही पुरुष
प्रत्येक गवयव्यक्तिमें उपमितिसेही शक्तिग्रहण कराकरे यह वार्त्ताभी अनुभव-
विरुद्ध है.
इति श्रीगोविन्दसिंहसाधुकृते आर्यभाषाविभूषितन्यायसिद्धान्तमु-
क्तावलीप्रकाशे उपमानपरिच्छेदः ॥ ३ ॥