न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 203, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीः।
अथ शब्दपरिच्छेदः ४.
भाषाकारकृतमंगलाचरणम् ।
चतुर्वर्गफलप्राप्तिकारकं क्लेशहारकम् ॥
वाचामगोचरं देवं वन्दे श्रीगुरुनानकम् ॥ १ ॥
शाब्दबोधप्रकारं दर्शयति,पदज्ञानं त्विति-
भाषा-शब्दोपमानकी परस्पर उपजीव्योपजीवक भावरूप संगतिके अभिप्रायसे
मूलकार 'पदज्ञानं तु' इत्यादिग्रन्थसे शाब्दबोधका प्रकार दिखलाते हैं-
पदज्ञानं तु करणं-
भाषा-शाब्दबोधमें पदज्ञान करण है.
न तु ज्ञायमानं पदं करणं पदाभावेऽपि मौनिश्लोकादौ शाब्द-
बोधात् ।
भाषा-शाब्दबोधमें पदका 'ज्ञानही' करण है, किन्तु ज्ञात हुआ पद 'करण' नहीं
क्योंकि पदोंके न होनेसेभी मौनिपुरुषनिर्मित श्लोकोंसे शाब्दबोध होताहै. भाव यह
कि-शब्दमात्रका श्रोत्रहीसे ज्ञान होना स्वभाव है और 'पद' भी शब्दविशेषहीका
नाम है. वहभी यदि ज्ञात होगा तो श्रोत्रहीसे हुआचाहिये; परन्तु जहां मौनि पुरुषने
अक्षर लेखसे या हस्तादिचेष्टासे दूसरे पुरुषको कुछ बोधन किया है वहां पदके न
होनेसेभी लिपि या चेष्टाद्वारा केवल पदके ज्ञानमात्रसे शाब्दबोध होताहै; इसलिये
ज्ञातहुआ पद 'करण' नहीं, किन्तु पदका ज्ञानही 'करण' हैः
-द्वारं तत्र पदार्थधीः ॥
शाब्दबोधः फलं तत्र शक्तिधीः सहकारिणी ॥८१॥
भाषा-पदजन्यपदार्थोपस्थितिबुद्धिमध्यमें व्यापार है पदशक्ति ज्ञान सहकारी
कारण है. ऐसे स्थलमें शाब्दबोधात्मक फल होताहै ॥ ८१ ॥
पदार्थधीरिरिति । पदजन्यपदार्थस्मरणं व्यापारः, अन्यथा पदज्ञा-
नवतः प्रत्यक्षादिना पदार्थोपस्थितावपि शाब्दबोधापत्तेः।तत्रापि