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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 350 में से

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पृष्ठ 198

१७४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
इत्यादि स्थल इसके लक्ष हैं. यहां वस्तुमात्रको पक्ष होनेसे साध्यके साथ
हेतुका सामानाधिकरण्य ग्रहण करनेके लिये कोई स्थल शेष नहीं है. एवं
सामानाधिकरण्य ग्रहरूप कारणीभूत व्याप्तिज्ञानके न होनेसे अनुमितिरूप कार्यभी
ऐसे स्थलमें नहीं होता. यह प्राचीन विद्वानोंका मन्तव्य है. परन्तु यह सम्यक् नहीं
है; क्योंकि सामानाधिकरण्य ग्रहणके लिये स्थलान्तर नाभी हो तोभी पक्षके एकदेशमें
साध्यहेतुके सहचारग्रहणसे अनुमिति होसकती है; अथवा साध्यके साथ हेतुके
सहचारका ग्रहणाभावही रहे तौभी ऐसे स्थलमें अज्ञानरूपा असिद्धीही माननी
उचित है. किन्तु ऐसे हेतुकी हेत्वाभासत्व नहीं है; तथापि केवलान्वयि साध्यस्थ-
लीय हेतुमें 'अनुपसंहारी' यह व्यवहार होता है. ऐसा कहना आवश्यक है.
यः साध्यवति नैवास्ति स विरुद्ध उदाहृतः ॥ ७४ ॥
भाषा-जो हेतु साध्यवाले स्थलमें न रहे वह विरुद्ध कहा जाता है ॥ ७४ ॥
यः साध्यवतीति । एवकारेण साध्यवत्त्वावच्छेदेन हेत्वभावो
बोधितः। तथा च साध्यव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वं तदर्थः७४॥
भाषा-मूलकारिकामें होनेवाले ' एव ' कारसे यह जानना चाहिये कि, साध्य-
वत्त्वावच्छेदेन कहींभी न रहनेवाला हेतु विरुद्ध कहा जाता है. एवं साध्यका व्याप-
कीभूत जो अभाव तादृशाभावप्रतियोगित्वही विरुद्धत्व समझना चाहिये ॥ ७४ ॥
असिद्धिं विभजते, आश्रयासिद्धिरित्यादि-
भाषा-'आश्रयासिद्धि' इत्यादि ग्रंथसे मूलकार असिद्धिका विभाग करतेहैं-
आश्रयासिद्धिराद्या स्यात्स्वरूपासिद्धिरप्यथ ॥
व्याप्यत्वासिद्धिरपरा स्यादसिद्धिरतस्त्रिधा ॥ ७५ ॥
भाषा-प्रथमका नाम आश्रयासिद्धि है; द्वितीयका नाम स्वरूपासिद्धि है; और
तीसरीका नाम व्याप्यत्वासिद्धि है इस भेदसे असिद्धि तीन प्रकारकी है ॥ ७५ ॥
पक्षासिद्धिर्यत्र पक्षो भवेन्मणिमयो गिरिः ॥
पक्षासिद्धिरिति । आश्रयासिद्धिरित्यर्थः ।
भाषा-“ मणिमयपर्वतो वह्निमान् धूमात् ” इत्यादि स्थलमें आश्रयासिद्धि है.
ह्रदो द्रव्यं धूमवत्त्वादत्रासिद्धिरथापरा ॥७६॥
अपरेति । स्वरूपासिद्धिरित्यर्थः ।
भाषा-'ह्रदो द्रव्यं धूमत्वात्' इत्यादि स्थलमें स्वरूपासिद्धि है ॥ ७६ ॥