सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 190

१६६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
साध्यविषयक ( उपनीत ) अलौकिक सन्निकर्ष विशेषद्वारा भान अथवा अनुमिति
उपमिति या शाब्दबोध कुछभी नहीं होता और प्रतिबध्य कोटिक ज्ञानोंका भिन्नभिन्न
नामनिर्देश करनेसे नियमका शरीरभी गुरूभूत होताहै इसलिये कोई लघुभूत नियम
कहना चाहिये. वह यही होसकता है कि “ साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानस्य लौकिक
सन्निकर्षाजन्य दोषविशेषजन्यज्ञानत्वावच्छिन्ने प्रतिबन्धकत्वम्” अर्थात् साक्षात्कारा-
त्मक साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानकी लौकिकसन्निकर्षनिष्ठ जनकता निरूपित जन्य-
ताशून्य ज्ञानमात्रके प्रति तथा दोषविशेषनिष्ठ जनकता निरूपित जन्यताशून्य ज्ञानमा-
त्रके प्रति प्रतिबन्धकता है. भाव यह कि-शाब्दबोधादिज्ञान लौकिकसन्निकर्षजन्य
नहीं किंतु पदज्ञानादि जन्य है; एवं ‘ पीतः शंखः ’ यह ज्ञान दोष विशेषजन्य
नहीं किन्तु पित्तादि दोषविशेषसेही जन्य है. एवं साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानको
शाब्दबोधादिज्ञानोंके प्रति प्रतिबन्धकता और ‘ पीतः शंखः ’ इत्यादिज्ञानोंके प्रति
अप्रतिबन्धकता अतिलघुभूत नियमसे सिद्ध हुई.
न तूपनीतभानविशेषे शाब्दबोधे च पृथक्प्रतिबन्धकता गौरवात्,
तथा च प्रतिबन्धकसत्त्वात् कथमनुमितिः । न हि लौकिकस-
न्निकर्षस्थले प्रत्यक्षमिव सत्प्रतिपक्षस्थले संशयानुमितिः प्रमा-
णिकी, येनानुमितिभिन्नत्वेनापि विशेषणीयम् ।
भाषा-इसलिये साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानकी उपनीत भानविशेषमें और शाब्द-
बोधादिमें जुदी जुदी प्रतिबन्धकता माननी उचित नहीं क्योंकि गौरव होताहै. इस
रीतिसे सत्प्रतिपक्षस्थलमेंभी साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानरूप प्रतिबन्धकके विद्यमान
होनेसे अनुमिति कैसे होसकतीहै? अर्थात् कभी नहीं होसकती. क्योंकि साध्याभाव
व्याप्यवत्ताज्ञाननिष्ठ प्रतिबन्धकता निरूपित प्रतिबध्यतावच्छेदक कोटि प्रविष्टत्व
अनुमिति ज्ञानकोभी स्वतःसिद्ध है और रत्नकोशकारके अभिप्रायसे हम प्रतिबध्य
प्रतिबन्धकभाव नियमके शरीरमें (अनुमितिभिन्नत्वेन) प्रतिबध्यताका निवेशभी नहीं
करसकते; क्योंकि लौकिक सन्निकर्षस्थलमें प्रत्यक्षकी तरह सत्प्रतिपक्षस्थलमें संश-
यात्मिका अनुमिति प्रामाणिकलोगोंने प्रामाणिकी नहीं मानी अर्थात् प्रामाणिकलोग
लौकिक सन्निकर्षस्थलमें प्रत्यक्षमें प्रमाणता मानतेहैं और सत्प्रतिपक्षस्थलमें संशया-
नुमिति अप्रामाणिकी मानतेहैं.
यत्र कोटिद्वयव्याप्यवत्ताज्ञानं तत्रोभयत्राप्रामाण्यज्ञानात्संशयो
नान्यथा, अगृहीताप्रामाण्यकस्यैव विरोधिज्ञानस्य प्रतिबन्धक-
त्वादिति । ३ ।