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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 350 में से

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पृष्ठ 191

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६७
भाषा--और रत्नकोशकारने जो " स्थाणुर्वा पुरुषो वा " इत्याकारक प्रत्यक्ष
संशयका उदाहरण देकर सत्प्रतिपक्षस्थलमें संशयात्मक अनुमितिका स्थापन
किया है, वहभी ठीक नहीं; क्योंकि संशय नियमसे वहांही हुआ करता है, जहां
उभयकोटिव्याप्यवत्ता ज्ञानमें अप्रमाणता गृहीत हो प्रकारान्तरसे कभी नहीं
होता और इतर ज्ञाननिष्ठ प्रतिबध्यतानिरूपित प्रतिबंधकता उसी ज्ञानमें रहती है,
जिसमें किसी तरहसे अप्रमाणता गृहीत न हुई हो; इसलिये संशयस्थलमेंभी यही
समझना चाहिये कि, जबतक उभय कोटिक निश्चयमें किसी एक निश्चयमें प्रामाण्य
ग्रहण नहीं हुआ तबतक संशयज्ञानका कोई अंश निर्बल या सबल होकर
अपनेमें प्रत्यक्षरूपताका भाव नहीं दिखला सकता और संशयज्ञानमें प्रमाणताभी
किसीने नहीं मानी, संशयस्थलमें जब एक कोटिमें प्रमाणताका निश्चय होगा तब
संशय आपही नहीं रहेगा इसलिये इसके निदर्शनसे सत्प्रतिपक्षस्थलमें संशयात्मिक
अनुमिति माननीभी केवल मनोरथ मात्र है ३ ।
आश्रयासिद्धयाद्यन्यतमत्वमसिद्धित्वम्। आश्रयासिद्धिः पक्षे पक्ष-
तावच्छेदकस्याभावः। यत्र च काञ्चनमयः पर्वतो वह्निमानिति
साध्यते तत्र पर्वतो न काञ्चनमय इति ज्ञाने विद्यमाने काञ्चन-
मयपर्वते परामर्शप्रतिबन्धः फलम् । १ ।
भाषा-आश्रयासिद्धयादि, भेदाभाववाले हेतुसमुदायका नाम आश्रयासिद्ध है
अर्थात् ' आश्रयासिद्धयादि ' पदसे स्वरूपासिद्ध व्याप्यत्वासिद्ध साध्यासिद्ध आदि
सबका ग्रहण है, इनका भेद इन सबको त्यागकर संसारमात्रमें है, उस भेदका
अभाव इन सबमें है; एवं लक्षण संगत हुआ, जिस हेतुके पक्षमें पक्षतावच्छेदक
धर्म न रहे वह हेतु आश्रयासिद्ध कहाता है; उदाहरणस्थल इसके " काञ्चनमय-
पर्वतो वह्निमान् धूमात् " इत्यादि अनेक हैं, " पर्वत कांचनमय नहीं है " इत्या-
कारक ज्ञानके विद्यमान होनेसे कांचनमय पर्वतमें "वह्निव्याप्यधूमवान् कांचनमय-
पर्वतः " इत्याकारक परामर्शका प्रतिबन्ध होना अर्थात् परामर्शने ना उत्पन्न होना
यही इसका फल है १ ।
स्वरूपासिद्धिस्तु पक्षे व्याप्यत्वाभिमतस्याभावः । अत्रच ह्रदो
द्रव्यं धूमादित्यादौ पक्षे व्याप्यत्वाभिमतस्य हेतोरभावे ज्ञाते
पक्षे साध्यव्याप्यहेतुमत्त्वज्ञानरूपपरामर्शप्रतिबन्धः फलम् । २ ।
भाषा-व्याप्यत्वेन अर्थात् हेतुत्वेनाभिमत हेतु यदि पक्षमें न रहे तो वह
स्वरूपासिद्ध कहा जाता है; उदाहरणस्थल इसके " ह्रदो द्रव्यं धूमात् " इत्यादि