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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 350 में से

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पृष्ठ 201

श्रीः।
अथोपमानपरिच्छेदः ३.
भाषाकारकृतमंगलाचरणम् ।
किं लोके, वेदशास्त्रेऽपि दुर्लभा यस्य चोपमा ॥
सच्चिदानन्दरूपेण वन्द्योऽसौ नानकों गुरुः ॥ १ ॥
उपमितिँ व्युत्पादयति , ग्रामीणस्येति-
भाषा-अवसर सङ्गतिके अभिप्रायसे ग्रन्थकार ' ग्रामीणस्य ' इत्यादि ग्रन्थसे
उपमितिका निरूपण करते हैं-
ग्रामीणस्य प्रथमतः पश्यतो गवयादिकम् ॥
सादृश्यधीर्गवादीनां या स्यात्सा करणं मतम् ॥ ७९ ॥
वाक्यार्थस्यातिदेशस्य स्मृतिर्व्यापार उच्यते ॥
गवयादिपदानां तु शक्तिधीरुपमाफलम् ॥ ८० ॥
भाषा-वनस्थ गवयादि पशुके प्रति प्रथमही देखनेवाले ग्रामीण पुरुषका जों
गवयादि विषयक गोनिरूपित सादृश्यदर्शन वह प्रकृतोपमितिका करण है ॥ ७९ ॥
अतिदेश वावयर्थका स्मरण मध्यमें व्यापार है. इस रीतिसे गवयादि शब्दोंकी व्यक्ति
विशेषमें शक्तिग्रहण करनी उपमितिका फल है;अर्थात् एतद्रूपही अनुमितिहै॥८०॥
यत्त्वारण्यकेन केनचिद्ग्रामीणं प्रत्युक्तं गोसदृशो गवयपदवाच्य
इति। पश्चाच्च ग्रामीणेन काचिदरण्ये गवयो दृष्टस्तत्र गोसादृश्य-
ज्ञानं यत्तदुपमितिकरणम् । तदनन्तरं गोसदृशो गवयपदवाच्य
इत्यतिदेशवाक्यार्थस्मरणं जायते तदेव व्यापारः ।
भाषा-जहां कहीं जंगलमें रहनेवाला पुरुष शहरमें रहनेवाले पुरुषको कदा-
चित् मिलकर यह कहे कि-जंगलमें एक ' गवय ' नामक पशु गौ जैसा होताहै.
उसके पीछे कभी दैवयोगात् कार्यवशसे वही शहरमें रहनेवाला पुरुष जंगलमें जावे
और उस 'गवय' नामक पशुको देखे तो ऐसे स्थलमें उस गवयमें जो गोसादृश्यक।
दर्शन वह होनेवाले उपमितिज्ञानका करण है. उस सादृश्यदर्शनके पीछे उसी
पुरुषको “ गोसदृशो गवयपदवाच्यः ” इत्याकारक जो अतिदेशका वाक्य अर्थात्
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