सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

Here is the complete, faithful line-by-line transcription of the text from the provided image:

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १७१
नच बाधस्थले पक्षे हेतुसत्त्वे व्यभिचारः, पक्षे हेत्वाभावे तु स्व-
रूपासिद्धिरेव दोष इति वाच्यम्। बाधज्ञानस्य व्यभिचारज्ञाना-
देर्भेदात् । किंच यत्र परामर्शानन्तरं बाधबुद्धिस्तत्र व्यभिचार-
ज्ञानादेरकिञ्चित्करत्वात् बाधस्यानुमितिप्रतिबन्धकत्वं वाच्यम् ।
शंका-जिस स्थलमें आप बाधरूप दोषको मानतेहैं वहां हम यह पूछतेहैं
कि-उस स्थलमें पक्षमें हेतु रहता है या नहीं ? यदि रहता है तो साध्याभाववद्वृत्ति
होनेसे साधारणनैकान्तिक हुआ और यदि नहीं रहता तो पक्षे हेत्वाभाव होनेसे
स्वरूपासिद्ध हुआ; एवं बाधदोषप्रयुक्त बाधित हेतुको पञ्चम हेत्वाभास मानना
अयुक्त है. समाधान-व्यभिचारादि ज्ञानोंसे बाधज्ञानका भेद है अर्थात् प्रतीति-
भेदसे भिन्न २ व्यवहार होताहै. (किञ्च) जब कहीं व्याप्तिज्ञानपक्षधर्मतापरामर्श
ज्ञानके पीछे पोल खुलनेसे बाधबुद्धि होवे तो वहां व्यभिचारज्ञान या स्वरूपासिद्धि
ज्ञान कुछ नहीं करसकता; क्योंकि यह ज्ञान तो परामर्शद्वारा अनुमितिके प्रतिब-
न्धक हैं, स्वतंत्र नहीं; सो परामर्श तो होही चुकाहै. इनमें प्रतिबन्धकताकी योग्यताही
नहीं, ऐसे स्थलमें बाधज्ञानही प्रतिबन्धक मानना होगा और व्यभिचारादि दोषोंसे
असंकीर्णभी बाधस्थल होसकताहै.
एवं यत्रोत्पत्तिक्षणावच्छिन्ने घटादौ गन्धव्याप्यपृथिवीत्ववत्त्वाज्ञानं
तत्र बाधस्यैव प्रतिबन्धकत्वं वाच्यम् ।
भाषा-जैसे "उत्पत्तिक्षणावच्छिन्नो घटो गन्धवान् पृथिवीत्वात्" इस स्थलमें उत्प-
त्तिक्षणावच्छिन्नघटात्मक पक्षमें पृथिवीत्वरूप हेतुके विद्यमान होनेसे पक्षे हेत्वाभावरूप
स्वरूपासिद्ध दोषभी नहीं है और प्रतियोगिव्यधिकरणसाध्याभाववद्वृत्तित्त्वरूप
व्यभिचारदोषभी नहीं है. एवं ऐसे स्थलमें गन्धव्याप्य पृथिवीत्ववत्त्वाज्ञानका केवल
"उत्पत्तिक्षणावच्छिन्नो घटो गन्धाभाववान्" इत्याकारक बाधज्ञानही प्रतिबन्धक
होसकताहै.
नच पक्षेघटे गन्धसत्त्वात् कथं बाध इति वाच्यम् । पक्षतावच्छे-
दकदेशकालाdynamicवच्छेदेनानुमितेरनुभवसिद्धत्वादिति ।
शंका-घटात्मक पक्षमें गन्ध तो रहताही है, फिर बाधज्ञान कैसा? समाधान-
पक्षतावच्छेदक देशकालाdynamicवच्छेदेन अनुमितिका होना विद्वानोंके अनुभवसिद्ध
है अर्थात् देशकालभी पक्षताके अवच्छेदक होते हैं. एवं घटरूप पक्षका उत्पत्ति-
क्षणात्मक कालभी अवच्छेदक है उस घटरूप पक्षमें गन्ध यद्यपि सर्वदा विद्यमान
है तथापि कार्यकारणानुरोधसे उत्पत्तिक्षणमें गन्धाभावभी अवश्यही है इस रीतिसे
यह असंकीर्ण बाधस्थल है.