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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५१
भाषा-पीछे "व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्वधीः परामर्श उच्यते" इस परामर्शके लक्ष-
णमें 'पक्षवृत्तित्व' यह कहा उसमें पक्षत्व क्या है इसी वार्ताको 'सिषाधयिषा'
इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कहते हैं-
सिषाधयिषया शून्या सिद्धिर्यत्र न विद्यते ॥
स पक्षस्तत्र वृत्तित्वज्ञानादनुमितिर्भवेत् ॥ ७० ॥
भाषा-साध्यके सिद्ध करनेकी इच्छाका नाम 'सिषाधयिषा' है. उस सिषाधयि-
षासे शून्य जो सिद्धि अर्थात् सिषाधयिषाविरहविशिष्ट प्रत्यक्षात्मक ज्ञान जहां नहीं
है वह 'पक्ष' है; उसमें हेतुकी वृत्तिताके ज्ञानसे अनुमिति होतीहै ॥ ७० ॥
सिषाधयिषाविरहविशिष्टायाः सिद्धेरभावः पक्षता, तद्वान् पक्ष
इत्यर्थः । सिषाधयिषामात्रं न पक्षता, विनापि सिषाधयिषां घन-
गर्जितेन मेघानुमानात् । अत एव साध्यसंदेहोऽपि न पक्षता,
विनापि संदेहं तदनुमानात् ।
भाषा-सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो सिद्धि, उस सिद्धिका अभाव 'पक्षता' है; उस
पक्षतारूप धर्मवालेका नाम 'पक्ष' है "गगनं मेघवत् गर्जनात्" इत्यादि स्थलोंमें सिषा-
धयिषासे विनाभी पुरुषोंको अनुमिति होतीहै. इसलिये साध्य सिद्ध करनेकी
इच्छा मात्रका नाम 'पक्षता' नहीं कह सकते. इसीलिये "साध्यसन्देहः पक्षता" इत्या-
कारक प्राचीनोंका लक्षणभी सम्यक् नहीं है, क्योंकि विनापि मेघरूप साध्यके सन्दे-
हसे गर्जनेसे गगनाधिकरणमें मेघकी अनुमिति होतीहै.
सिद्धौ सत्यामपि सिषाधयिषासत्त्वेऽनुमितिर्भवत्येव, अतः सिषा-
धयिषाविरहविशिष्टत्वं सिद्धौ विशेषणम् ।
भाषा-'सिद्धि' नाम इन्द्रियसन्निकर्षजन्य ज्ञानका है. उसके प्राप्त होतेपि अर्थात्
पर्वतादि पक्षोंमें 'पर्वतो वह्निमान्' इत्याकारक चाक्षुष ज्ञान हुएभी 'पर्वतो वह्निमान् विषय-
यकानुमितिर्मे स्यात्' इत्याकारक इच्छा होनेसे अनुमिति होतीहै. इसलिये 'सिषा-
धयिषाविरहविशिष्टत्व' सिद्धिमें विशेषण दिया है. भाव यह कि-यद्यपि प्रत्यक्षात्मक
ज्ञान अनुमितिज्ञानका प्रतिबन्धक है, इसलिये सिद्धि होत संते अनुमितिज्ञानका
होना सम्भव नहीं तथापि सिषाधयिषाको विद्वानोंने उत्तेजक माना है. प्रतिबन्धक
होतेभी सामग्रीकी सहकारतासे कार्यजनकका नाम 'उत्तेजक' है. एवं सिषाधयिषारूप
उत्तेजकके बलसे सिद्धिरूप प्रतिबन्धकके सत्त्वकालमेंभी अनुमितिरूप कार्य होताहै

बुद्धि खण्ड: प्रत्यक्ष, अनुमान, परामर्श, व्याप्ति, उपमान व शब्द प्रमाण

१५२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
इससे यह सिद्धान्त हुआ कि-सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो केवल सिद्धि वह अनुमि-
तिक प्रति प्रतिबन्धक है. उसीका अभाव जहां तहां पक्षता है. प्रकृतमें जहां सिद्धि
और सिषाधयिषा दोनों हैं वहांभी सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो देशान्तरीय काला-
न्तरीय सिद्धि उसका अभाव वहां विद्यमान है. इसलिये पक्षताकी क्षति नहीं है.
ऐसे स्थलमें विशेषाणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव जानना चाहिये; क्योंकि 'सिषाधयि-
पाविरह' विशेषण है और 'सिद्धि' विशेष्य है. जहां सिषाधयिषाका विरह नहीं किन्तु
सिषाधयिषा विद्यमान है वहां सिषाधयिषाविरहरूप विशेषणके न होनेसे तद्विशिष्ट
सिद्धिका अभावभी कहसकतेंहैं याते सिद्धि सिषाधयिषाउभय सत्त्वस्थलमें पक्षतानिर्दोषहै.
तथाच यत्र सिद्धिर्नास्ति तत्र सिषाधयिषायां सत्यामसत्यामपि
पक्षता । यत्र च सिषाधयिषाऽस्ति तत्र सिद्धौ सत्यामसत्यामपि
पक्षता । यत्र च सिद्धिरस्ति सिषाधयिषा च नास्ति तत्र न
पक्षता, सिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्धेः सत्त्वात् ।
भाषा-( तथाच ) एवं जिस स्थलमें ( सिद्धि ) प्रत्यक्षज्ञान नहीं है वहां सिषा-
धयिषा होय तो उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव जानना चाहिये अर्थात् सिषाधयि-
पाके होनेसे सिषाधयिषाविरहरूप विशेषणभी नहीं है और सिद्धिके न होनेसे सिद्धि-
रूप विशेष्यभी नहीं है. इसलिये विशेषणविशेष्य उभयके अभावसे विशिष्टका अभाव
कहना उचित है. ऐसे स्थलमेंभी पक्षता निर्दोष है. एवं जहां सिद्धि सिषाधयिषा-
दोनों नहीं हैं वहां विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव जानना चाहिये अर्थात् सिषाधयि-
पाके न होनेसे सिषाधयिषाविरहरूप विशेषण तो है परन्तु सिद्धिरूप विशेष्यके न
होनेसे विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव कह सकतेंहैं; ऐस स्थलमेंभी पक्षता निर्दोष
है. एवं जहां सिषाधयिषा विद्यमान है वहां सिद्धि होय तो पूर्ववत् विशेषाणाभावप्रयुक्त
विशिष्ट[भावप्रयुक्त प]क्षता जाननी चाहिये और सिद्धि न होय तौ पूर्ववत् उभयाभावप्रयुक्त
विशिष्टाभाव [अवच्छेदक] जाननी चाहिये; परन्तु जिस स्थलमें केवल ( सिद्धि ) प्रत्यक्षा-
त्मक ज्ञान [तो] है, किन्तु अनुमित्सारूप उत्तेजक नहीं है, वहां पक्षता नहीं है क्योंकि
सिषाधयिषाविरहविशिष्ट ( सिद्धेः ) प्रत्यक्षात्मक ज्ञानको वहां अनुमिति तत्सामग्रीके
प्रति प्रतिबन्धकता है इसीसे यह सिद्ध हुआ कि अनुमित्साविरहविशिष्ट ( सिद्धिः )
प्रत्यक्षात्मक ज्ञान अनुमितिज्ञानका सर्वथा प्रतिबन्धक है. ऐसे स्थल में पक्षता नहीं है.
ननु यत्र परामर्शानन्तरं सिद्धिस्ततः सिषाधयिषा, तत्र सिषाधयि-
पाकाले परामर्शनाशान्नानुमितिः, यत्र सिद्धिपरामर्शसिषाधयिषाः

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५३
क्रमेणभवन्ति तत्रसिषाधयिषाकाले सिद्धेर्नाशात् प्रतिबन्धकाभा-
वादेवानुमितिः, यत्र सिषाधयिषासिद्धिपरामर्शाः सन्ति तत्र पराम-
र्शकाले सिषाधयिषैव नास्ति, एवमन्यत्रापि सिद्धिकाले परामर्शका-
ले वा न सिषाधयिषा, योग्यविभुविशेषगुणानां यौगपद्यनिषेधात्,
तत् कथं सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्वं सिद्धेर्विशेषणमिति चेत्। न
शंका—सिद्धिमें सिषाधयिषाविरहविशिष्टता आपको एक कालावच्छेदेन एकात्मवृ-
त्तित्व सम्बन्धसे विवक्षित है परन्तु परामर्शरूप कारणके सत्त्वकालमें और सिद्धिरूप विरो-
धिके सत्त्वकालमें यदि सिषाधयिषाका होना सम्भव होय तो सिषाधयिषाको उत्तेजकता
और तद्विरहविशिष्ट सिद्धिको प्रतिबन्धकता आप कहसकें सो विचारसे यह वार्त्ता बन
नहीं सकती; क्योंकि जिस पुरुषको प्रथम क्षणमें परामर्शात्मक ज्ञान हुआ है उसके
पीछे द्वितीय क्षणमें सिद्धात्मक ज्ञान हुआ और तृतीय क्षणमें सिषाधयिषा हुई तो
सिषाधयिषाकालमें अनुमिति कारणीभूत परामर्शात्मक ज्ञानका क्षणिकत्वेन नाश होनेसे
अनुमिति नहीं होगी १। और जिस आत्मामें प्रथम क्षणमें सिद्धात्मक ज्ञान हुआ है,
द्वितीयक्षणमें परामर्शात्मक ज्ञान हुआ है और तृतीय क्षणमें सिषाधयिषा हुई है वहां
सिषाधयिषाकालमें सिद्धात्मक ज्ञान क्षणिक होनेसे नाश होचुका है, इसलिये प्रति-
बन्धकके अभावसेही अनुमितिज्ञान निर्बाध होगा २। और जिस आत्मामें प्रथमक्षणमें
सिषाधयिषा हुई, द्वितीय क्षणमें सिद्धात्मक ज्ञान हुआ, तृतीयक्षणमें परामर्श हुआ
वहाँ परामर्शकालमें सिषाधयिषाही क्षणिक होनेसे नाश होचुकी है; सिषाधयिषाके
न होनेसे अनुमितिज्ञान नहीं होगा ३। (एवमन्यत्रापि) ऐसे और स्थलोंमेंभी जहां
प्रथमक्षणमें परामर्शात्मक ज्ञान हुआ है द्वितीयक्षणमें सिषाधयिषा हुई है तृतीयक्षणमें
सिद्धात्मक ज्ञान हुआ है वहां अनुमितिकारणीभूत परामर्शात्मक ज्ञान नहीं है इसलिये
अनुमिति न होगी ४। एवं जहां प्रथमक्षणमें सिद्धिहै द्वितीयक्षणमें सिषाधयिषा है तृतीय
क्षणमें परामर्श है वहां तृतीयक्षणमें प्रतिबन्धकके अभावसेही अनुमिति होसकती है ५।
एवं जिस आत्मामें प्रथमक्षणमें सिषाधयिषा हुई है, द्वितीयक्षणमें परामर्श
हुआ है, तृतीय क्षणमें सिद्धात्मकज्ञान हुआ है वहां सिद्धिकालमें सिषाधयिषा
ज्ञान नहीं है इसलिये अनुमिति नहीं होगी ६। एवं प्रत्यक्षके योग्य विभुके
विशेषगुणोंको एककालावच्छेदेन अनुत्पन्न होनेसे सिद्धिकालमें अथवा परामर्शकालमें
सिषाधयिषाका होना सम्भव नहींहै इसलिये सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्व सिद्धिमें विशे-
षण देना व्यर्थ है किन्तु "सिद्धयभावः पक्षता" इतना मात्र कहनेसे निर्वाह होसकताहै.
यत्र वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमानिति प्रत्यक्षं स्मरणं वा,
१३

१५४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
ततः सिषाधयिषा तत्र पक्षतासम्पत्तये सिषाधयिषाविरहविशिष्ट-
त्वविशेषणस्यावश्यकत्वात् ।
समाधान-जिस आत्मामें "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक
प्रत्यक्षात्मक अथवा स्मरणात्मक ज्ञान हुआ हो और उसके पीछे द्वितीयक्षणमें
“पर्वते वह्न्यनुमितिर्मे जायताम् ” इत्याकारक इच्छा उत्पन्न होय तो ऐसे
स्थलमें पक्षतासम्पत्तिके लिये सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्व सिद्धिमें विशेषण
देना आवश्यक है. भाव यह कि-ऐसे स्थलमें सिषाधयिषाके पूर्वक्षणमें होने-
वाला ज्ञान सिद्धिविशिष्टपरामर्शात्मक है. द्वितीयक्षणमें सिषाधयिषारूप उत्ते-
जकके होनेसे यही ज्ञान परामर्शत्वेन अनुमितिका कारण हो जाता है और
सिषाधयिषाके न होनेसे यही ज्ञान सिद्धिरूपेण प्रतिबन्धक होय जाताहै एवं
यदि सिद्धिमें सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्वरूप विशेषण न दिया जाय तो ऐसे स्थलमें
पक्षताभी न बनसके; क्योंकि यहां केवल सद्द्यभाव तो नहीं है किंतु सिद्ध्यत्मक
परामर्शही बैठा है और जब विशेषण देते हैं तो पक्षता बनसकती है; क्योंकि यहां
यद्यपि केवल सिद्ध्यभाव नहीं है तथापि सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो सिद्धि उसका
अभाव यहांपर है, इसलिये पक्षता निर्बाध है.
अत्रेदं बोध्यम् । यादृशयादृशसिषाधयिषासत्त्वे सिद्धिसत्त्वे यल्लि-
ङ्गकानुमितिस्तादृशतादृशसिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्ध्यभाव-
स्तल्लिङ्गकानुमितौ पक्षता । तेन सिद्धिपरामर्शसत्त्वेऽपि यत्किं-
चिज्ज्ञानं जायतामितीच्छायामपि नानुमितिः ।
भाषा-यहां यहभी जानना उचित है कि-जैसी २ सिषाधयिषाके सत्त्वकालमें
तथा सिद्धिके सत्त्वकालमें यद्धेतुक अनुमिति होती है वैसी २ सिषाधयिषाविर-
हविशिष्ट सिद्धिका अभाव उसी प्रकृत हेतुक अनुमितिमें पक्षता है. (तेन) एवं "वह्नि-
व्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक सिद्ध्यात्मक परामर्शसत्त्वकालमेंभी
"यत्किञ्चित् ज्ञानं मे जायताम्” इत्याकारक इच्छाके होनेसे अनुमितिकी आपत्ति
नहीं है; क्योंकि इस इच्छाको यत्किञ्चित् ज्ञान विषयक होनेसे प्रकृतानुमिति साम-
ग्रीमें उत्तेजकता नहीं है.
वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमानितिप्रत्यक्षसत्त्वे प्रत्यक्षादि
भिन्नं वह्निज्ञानं जायतामितीच्छायां तु भवत्येव । एवं धूमपरा-
मर्शसत्त्वे आलोकेन वह्निमनुमिनुयामितीच्छायामपि नानुमितिः।

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५५
भाषा—और यदि "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक प्रत्यक्षा-
त्मक परामर्शसत्त्वकालमें "प्रत्यक्षादिभिन्नं वह्निज्ञानं मे जायताम्" इत्याकारक
इच्छा उत्पन्न होय तो अनुमिति होय सकतीहै; क्योंकि यह इच्छा प्रत्यक्षादिभिन्न
वह्निअनुमितिज्ञानमें उत्तेजकरूपेण विद्यमान है. ( एवं ) प्रकृतानुगममें यद्धेतुकका
निवेश करनेसे "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक धूम परामर्श-
सत्त्वकालमें "आलोकेन हेतुना अनुमितिर्मे जायताम्" इत्याकारक इच्छासेभी
अनुमितिकी आपत्ति नहीं होसकती; क्योंकि यह इच्छा यद्धेतुक परामर्श है तद्धेतुक
नहीं है इसलिये प्रकृतपरामर्शमें उत्तेजकभी नहीं है.
सिषाधयिषाविरहकाले यादृशसिद्धिसत्त्वे नानुमितिस्तादृशी
सिद्धिवैशिष्ट्यैव तत्तदनुमितिप्रतिबन्धिका वक्तव्या ।
भाषा—सिषाधयिषाके अभावकालमें जैसी सिद्धिके होत संते अनुमिति नहीं
होती वह २ सिद्धि विशेषरूपसे उसउस अनुमितिमें प्रतिबन्धक कहनी चाहिये अर्थात्
"पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक अनुमितिमें पर्वतत्वावच्छिन्नविशेष्यता निरूपित वह्नित्वाव-
च्छिन्न प्रकारताशालिनिश्चयत्वेन सिद्धात्मक ज्ञानको प्रतिबन्धकता कहनी उचित है.
तेन पर्वतस्तेजस्वी पाषाणमयो वह्निमानिति ज्ञानसत्त्वेऽप्यनु-
मितेर्न विरोधः ।
भाषा—इससे "पर्वतः तेजस्वी" अथवा "पाषाणमयो वह्निमान्" इत्याकारक
सिद्धात्मक ज्ञान होनेसेभी "पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक अनुमितिज्ञान रुक
नहीं सकता; क्योंकि यह नियम है कि—तद्विशेष्यक तत्प्रकारक अनुमितिज्ञानके
प्रति तद्विशेष्यक तत्प्रकारक सिद्धात्मक ज्ञानको प्रतिबन्धकता है, इतरको नहीं;
और प्रकृतमें अनुमितिज्ञान तो पर्वतत्वावच्छिन्न विशेष्यतानिरूपित वह्नित्वावच्छिन्न
प्रकारताशालि है परन्तु सिद्धिज्ञान प्रथम तो प्रकारतामें विपरीत है अर्थात् तेज-
स्त्वावच्छिन्न प्रकारक है और द्वितीयविशेष्यतामें विपरीत है अर्थात् पाषाणमयत्वा-
वच्छिन्न विशेष्यक है इसलिये यह ज्ञानप्रतिबन्धक नहीं होसकते.
परंतु पक्षतावच्छेदकसामानाधिकरण्येन साध्यसिद्धावपि तद-
वच्छेदेनानुमितिदर्शनात् पक्षतावच्छेदकावच्छेदेनानुमिति प्रति
पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन साध्यसिद्धिरेव प्रतिबन्धिका, पक्षताव-
च्छेदकसामानाधिकरण्येनानुमितिंप्रति तु सिद्धिमात्रं विरोधि ।

१५६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
भाषा-परन्तु प्रतिबध्य प्रतिबन्धक भावस्थलमें यहभी ख्याल रखना चाहिये कि
पक्षतावच्छेदक समानाधिकरणमें अर्थात् पर्वतके किसी एक शिखरमें वह्निरूप साध्यकी
सिद्धि होनेसेभी (तदवच्छेदेन) पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन अर्थात् पर्वतके यावत् शिखरोंमें
अनुमिति होय सकती है इसलिये "पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन अर्थात् पर्वतके यावत्
शिखरोंमें होनेवाली अनुमितिके प्रति "पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन साध्यसिद्धिः-अर्थात्
पर्वतके यावत् शिखरोंमें वह्निविषयक चाक्षुष ज्ञानही प्रतिबन्धक होयसकता है और
पर्वतके शिखरमें होनेवाली अनुमितिके प्रति तो सिद्धिज्ञान मात्र प्रतिबन्धक है
अर्थात् एकशिखरमें होनेवाली अनुमितिके प्रति एकशिखरमें होनेवाला सिद्धिज्ञानभी
प्रतिबन्धक है और यावत् शिखरमें होनेवाला सिद्धिज्ञानभी प्रतिबन्धक है. भाव
यह कि-ज्ञानोंका प्रतिबध्य प्रतिबन्धक भाव समानविषयकत्वेन किंवा अधिक विषय-
कत्वेन होता है; परन्तु प्रतिबध्य ज्ञानसे न्यून विषयावगाहि ज्ञान कदापि प्रतिबन्धक
नहीं होयसकता; इसीलिये यावत् शिखरमें होनेवाली अनुमितिके प्रति एक शिखर-
निष्ठ सिद्धि ज्ञान प्रतिबन्धक नहीं है.
इदं तु बोध्यम् । यत्र अयं पुरुषो न वेति संशयानन्तरं पुरुषत्व-
व्याप्यकरादिमानयमिति ज्ञानं तत्रासत्यामनुमित्सायां पुरुषत्व-
स्य प्रत्यक्षं भवति, न त्वनुमितिः । अतोऽनुमित्साविरहविशि-
ष्टसमानविषयकप्रत्यक्षसामग्री कामिनीजिज्ञासादिवत् स्वात-
न्त्र्येण प्रतिबन्धिका ।
भाषा-( इदं तु बोध्यम्) इतना यहां औरभी विशेष जानने योग्य है कि-जिस
स्थलमें दोषवशसे पुरुषविषे " अयं पुरुषो न वा " इत्याकारक संशय हुआ पश्चात्
सम्यक् चक्षुःसंयोग होनेसे "पुरुषत्वव्याप्यकरचरणादिमानयं " इत्याकारक
परामर्श हुआ ऐसे स्थलमें संशयपक्षताविशिष्ट परामर्शरूप अनुमितिकी सामग्रीभी
विद्यमान है और चक्षुःसंयोगरूप प्रत्यक्षकी सामग्रीभी विद्यमान है परन्तु ऐसे
स्थलमें यदि अनुमिति सामग्रीकी अनुमित्सा सहकारिणी न होवे तो पुरुषविषयक
प्रत्यक्ष ज्ञानही होता है; अनुमिति नहीं होती. इसलिये अनुमित्साविरहविशिष्ट अनुमि-
तिसामग्रीके प्रति ( समानविषयक ) तुल्यविषयणी अर्थात् यद्विषयक अनुमितिसा-
मग्री है तद्विषयक प्रत्यक्षसामग्री ( कामिनी ) सुन्दरस्त्रीकी जिज्ञासाकी तरह स्वभा-
विक प्रतिबन्धक है अर्थात् जैसे आसक्त वियोगी पुरुषको सुन्दरस्त्रीके मिलापकी
इच्छा कार्यमात्रमें प्रतिबन्धक है क्योंकि वियोगीका किसी कार्यमें मन नहीं लगता;

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५७
वैसेही अनुमित्साविरहविशिष्ट प्रत्यक्षज्ञानकी सामग्रीभी समानविषयक अनुमिति
सामग्रीके प्रति स्वाभाविक प्रतिबन्धक जाननी चाहिये.
एवं परामर्शानन्तरं विनापि प्रत्यक्षेच्छां पक्षादिप्रत्यक्षानुत्पत्तेः
प्रत्यक्षेच्छाविरहविशिष्टानुमितिसामग्री भिन्नविषयकप्रत्यक्षे प्र-
तिबन्धिकेति ॥ ७० ॥
भाषा-एवं "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतः" इत्यादि परामर्शानन्तरं यदि
"पक्षादिविषयकं प्रत्यक्षं मे जायताम्" इत्याकारक प्रत्यक्ष इच्छा उत्तेजक न होय तो
पक्षादि विषयक प्रत्यक्ष नहीं होता किंतु "पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक समुदित अ-
नुमितिज्ञानही होता है इसलिये अनुमितिके विषयसे भिन्नविषयक प्रत्यक्षत्वावच्छिन्नके
प्रति प्रत्यक्ष इच्छाविरहविशिष्ट अनुमितिसामग्रीभी प्रतिबन्धक माननी उचित
है-इति ॥ ७० ॥
प्रसङ्गसङ्गत्त्या हेत्वाभासान् विभजते , अनैकान्त इत्यादि-
भाषा-वादिविजयरूप एककार्यकारित्वरूप प्रसंगसंगतिसे मूलकार "अनै-
कान्तः" इत्यादिग्रंथसे हेत्वाभासोंका विभाग करतेहैं-
अनैकान्तो विरुद्धश्चाप्यसिद्धः प्रतिपक्षितः॥
कालात्ययापदिष्टश्च हेत्वाभासास्तु पञ्चधा ॥७१॥
भाषा-अनैकान्त विरुद्ध, असिद्ध, सत्प्रतिपक्ष, कालात्ययापदिष्ट यह पांच हेत्वा-
भास बोलेजाते हैं ॥ ७१ ॥
तल्लक्षणं तु यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्त्वम् ।
भाषा-हेत्वाभासका लक्षण तो 'यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्त्वं'
इतना मात्र है असद्हेतु मात्र इस लक्षणका लक्ष्य है; ( यद्विषयकत्वेन ) व्यभिचा-
रादिविषयकत्वेन ( ज्ञानस्य) 'पर्वतो वह्निमान् प्रमेयत्वात् इत्यादौ अयं हेतुर्व्यभिचारी'
इत्यादि ज्ञानस्य "पर्वतो वह्निमान्" इत्यादि अनुमिति विरोधित्व है वही हेत्वाभा-
समें हेत्वाभासत्व है अर्थात् जिन 'प्रमेयत्वादि' हेतुओंमें व्यभिचारादि दोषोंका
निश्चय होजाता है उनसे "पर्वतो वह्निमान्" इत्यादि अनुमिति ज्ञानोंकी उत्पत्ति
नहीं होती. एवं "ह्रदो वह्निमान् धूमात्" इत्यादि बाधित स्थलमें वह्न्यभाव
प्रयुक्त ह्रदादिं विषयकत्वेन "ह्रदो वह्न्यभाववान्" इत्याकारक ज्ञानको "ह्रदो
वह्निमान्" इत्यादि अनुमिति प्रतिबन्धकत्व है; वही उसमें बाधितत्वरूप
हेत्वाभासत्व है.

१५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-

तथाहि। व्यभिचारादिविषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वा-
त्तेदोषाः । यद्विषयकत्वं च यादृशविशिष्टविषयकत्वं बोध्यम् ।
तेन बाधभ्रमस्यानुमितिविरोधित्वेऽपि न क्षतिः । तत्र पर्वतो
वह्न्यभाववानिति विशिष्टस्याप्रसिद्धत्वान्न हेतुदोषः ।
भाषा-'तथाहि' इस ग्रन्थसे लक्षणको स्वयं स्फुट करतेहैं कि-व्यभिचारादि
दोष विषयकत्वेन “अयं हेतुः व्यभिचारी” इत्यादि ज्ञानको व्यभिचारहेतुक यावत्
अनुमिति विरोधिता है इसलिये व्यभिचारादि दोष हैं. लक्षणघटित 'यद्विषयक'
पदका “यादृश विशिष्ट विषयक” विवरण जानना चाहिये. एवं “पर्वतो वह्निमान्”
इत्यादि सद्स्थलमें अतिव्याप्ति नहीं है क्योंकि यद्यपि वह्न्यभावप्रयुक्त पर्वतविषयक-
त्वेन “पर्वतो वह्न्यभाववान्” इत्याकारक ज्ञानको “पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक
सद्अनुमितिके प्रतिविरोधिता होसकतीहै इसलिये अतिव्याप्ति होनी चाहिये तथापि
'यादृशविशिष्ट' शब्दसे प्रकृतमें वह्न्यभावविशिष्ट पर्वतका ग्रहण है सो वह संसारमा-
त्रमें अप्रसिद्ध है इसलिये अतिव्याप्ति नहीं है. भाव यह कि-पक्षमें वास्तवसे
साध्याभाव होय तो बाध होताहै और यदि वास्तवसे साध्याभाव पक्षमें न रहे
किन्तु पक्षमें साध्याभावका भ्रम हो जावे तो उससे प्रकृत हेतु दुष्ट नहीं होय
सकताहै.
न च वह्न्यभावव्याप्यपाषाणमयत्ववान् पर्वत इति परामर्शकाले
वह्निव्याप्यधूमस्याभासत्वं न स्यात्, तत्र वह्न्यभावव्याप्यवान्
पक्ष इति विशिष्टस्याप्रसिद्धत्वादिति वाच्यम् । इष्टापत्तेः ।
शंका-जिस कालमें जिस स्थलमें सिद्धान्तीको “पर्वतो वह्निमान् धूमात्” इत्या-
कारक हेतुसे “वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वत:” इत्याकारक परामर्श हुआहै. उसकालमें
उसी स्थलमें वादीको “पर्वतो वह्न्यभाववान् पाषाणमयत्वात्” इत्याकारक हेतुसे
“वह्न्यभावव्याप्यपाषाणमयत्ववान् पर्वत:” इत्याकारक परामर्श होता है. यहां
द्वितीय परामर्शसे प्रथम परामर्श कुक्षिप्रविष्ट धूमरूप हेतु सत्प्रतिपक्षत्वेन हेत्वा-
भास गिना जाता है. अब आपके 'यादृशविशिष्टविषयक' कथनानुसार उसम
हेत्वाभासत्वव्यवहार करनेकी कुछ आवश्यकता नहीं है; क्योंकि उसमें आभास-
त्वका सम्पादक जो “वह्न्यभावव्याप्यपाषाणमयत्ववान् पर्वत:” इत्याकारक विरोधी
परामर्श है इसमें वह्न्यभावविशिष्ट पर्वतअंश अप्रसिद्ध है; अर्थात् पाषाणमयत्वरूप
हेतुमें वह्न्यभावनिरूपित व्याप्यता नहीं है. इसलिये पाषाणमयत्व हेतुसे धूमरूप

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५९
हेतुका आभास होना युक्तियुक्त नहीं है. समाधान-हमको यह वार्ता इष्ट है.
हमभी धूमादि सद्धेतुओंमें विरोधि हेतुके होनेसेभी दुष्टव्यवहार नहीं कर सकते.
अन्यथा बाधस्याप्यनित्यदोषत्वापत्तिः । तस्मात्तत्र वह्न्यभाव-
व्याप्यपाषाणमयत्ववान् इति परामर्शकाले वह्निव्याप्यधूमस्य
नाभासत्वं भ्रमादनुमितिप्रतिबन्धमात्रं, हेतुस्तु न दुष्ट इति ।
भाषा-अन्यथा यदि प्रतिबन्धकीभूत भ्रमविषयकोभी दोषत्वेन ग्रहण किया
जाय तो बाधभी अनित्य दोषही होय जावेगा. भाव यह कि-पक्षमें साध्याभावका
भ्रम होनेसे सद्धेतु वास्तवमें दुष्ट नहीं होय सकता; परन्तु यदि पूर्वोक्त रीतिसेभी
हेतुमें सत्प्रतिपक्षता स्वीकार हो तो पक्षमें साध्याभावका भ्रम होनेसेभी सद्धेतुमें
बाधदोषसे दुष्ट व्यवहार कर लेना चाहिये; परन्तु यह वार्ता किसी विद्वान्‌को संमत
नहीं है. इसलिये वहांभी यही मानना उचित है कि-“वन्ह्यभावव्याप्यपाषाणमय-
त्ववान् पर्वत: ” इत्याकारक परामर्शकालमें वह्निव्याप्य धूमरूप हेतुको आभासत्व
नहीं है किन्तु भ्रमसे अनुमिति प्रतिरोध मात्र है, परन्तु हेतु दुष्ट नहीं है.
इत्थंच साध्याभाववद्वृत्तित्त्वहेत्वादिकं दोषः, तद्वत्ता च हेतौ येन
केनापि सम्बन्धेनेति नव्याः ।
भाषा-(इत्थं) इस रीतिसे जब यादृशविशिष्ट विषयकत्वेन ज्ञानको प्रतिबन्धकता
है तादृश विशिष्टका दोषत्वेन ग्रहण किया तो वास्तवसे साध्याभाव वालेमें वर्तनेवाले
हेत्वादिकही दोष हैं. यहां ‘आदि’ पदसे साध्याभावविशिष्ट पक्षकोभी दोष जानना
चाहिये. एतादृश दोषवत्ता हेतुमें व्यभिचारादि स्थलोंमें तो तादात्म्येन है और
बाधादि स्थलोंमें “साध्याभाववान् पक्षो हेतुश्च” इत्याकारक एकज्ञानविषयत्वेन है;
एवं यथासम्भव जिस किसी संबन्धसेभी जानलेनी चाहिये. यह नव्य नैयायिक
लोगोंका कथन है इनके सिद्धान्तसे “हेतुवदाभासन्ते इति हेत्वाभासाः”इस व्युत्पत्तिसे
हेत्वाभास ’ शब्द दुष्ट हेतुपर है.
परे तु यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तद्वत्त्वं हेत्वा-
भासत्वम्, सत्प्रतिपक्षे विरोधिव्याप्त्यादिकमेव तथा, तद्वत्त्वं च
हेतोर्ज्ञानरूपसम्बन्धेन ।
भाषा-और कईएक विद्वान्‌लोग सत्प्रतिपक्षादिदोषोंको अनित्य दोष मानतेहैं.
उनके मतसे “हेतोराभासाहेत्वाभासाः” इस व्युत्पत्तिसे ‘हेत्वाभास’ शब्द दोषपर है

१६० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
एवं दोषवत्ता हेतुमें एकज्ञानविषयत्व सम्बन्धसे सर्वत्र रहती है. एवं 'यद्विषयकत्वेन
ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं' यह लक्षण उनके मतमें दोषका है तादृश दोषवालेमें एक
ज्ञानविषयत्वसम्बन्धसे हेत्वाभासत्वव्यवहार होताहै. सत्प्रतिपक्षादि स्थलोंमें विरो-
धिव्याप्त्यादिकोंकाही दोषरूपेण ग्रहण कियाजाताहै; तादृश दोषवत्ता हेतुमें "अयं
विरुद्धव्याप्तिविशिष्टो हेतुः" इत्याकारक एकज्ञानविषयत्व सम्बन्धसे जाननी चाहिये
न चैवं वह्निमान् धूमादित्यादौ पक्षे बाधभ्रमस्य साध्याभाववि-
षयकत्वेनानुमितिविरोधित्वात् ज्ञानरूपसम्बन्धेन तद्वत्त्वस्यापि
सत्त्वात् सद्धेतोरपि बाधितत्वापत्तिरिति वाच्यम् । तत्र ज्ञानस्य
सम्बन्धत्वाकल्पनात् ।
शंका-इस रीतिसे सत्प्रतिपक्षको अनित्य दोष माननेवालेके मतमें बाधभी
अनित्य दोष होना चाहिये; क्योंकि "वह्निमान् धूमात्" इत्यादि सद्धेतुस्थलमें पक्षमें
साध्याभावके न होनेसे यद्यपि बाध नहीं है तथापि "पर्वतो वह्न्यभाववान्" इत्याकारक
बाधका भ्रम हो सकताहै; वह भ्रमज्ञानही साध्याभाव विषयकत्वेन "पर्वतो वह्निमान्"
इत्याकारक अनुमितिका विरोधीभी होसकताहै और "वह्न्यभाववान् पर्वतो धूमश्च"
इत्याकारक भ्रमात्मक एक ज्ञान विषयत्वसम्बन्धसे धूमरूप हेतुकोभी दोषवत्ता हो
सकतीहै. एवं धूमादि सद्धेतुओंकोभी बाधित होना चाहिये. समाधान-सत्प्रतिपक्ष-
को अनित्य दोष माननेवाले इसका समाधान यह कहतेहैं कि-( तत्र ) बाधकालीन
धूमादि सद्धेतुओंमें हम एकज्ञानविषयत्वरूप सम्बन्धकी कल्पना नहीं करसकते;
क्योंकि सद्धेतुमें "अयं हेतुर्बाधितः" यह व्यवहार नहीं होता.
अत्र सत्प्रतिपक्षित इति व्यवहारेण तत्कल्पनात् । अत्र च बा-
धित इति व्यवहाराभावादित्याहुः ।
भाषा-और ( अत्र ) यहां प्रतिपरामर्शकालीन धूमादि सद्धेतुओंमें "अयं हेतुः
सत्प्रतिपक्षितः"इत्याकारक व्यवहार होनेसे पूर्वोक्त रीतिसे ज्ञानमें सम्बन्धत्वकीकल्पना
हो सकती है, यांते सत्प्रतिपक्षको अनित्य दोष माननेमें कुछ दोष नहीं-इत्याहुः ।
अनुमितिविरोधित्वं चानुमितितत्कारणान्यतरविरोधित्वम्, तेन
व्यभिचारिणि नाव्याप्तिः,दोषज्ञानं च यद्धेतुविषयकं तद्धेतुकानु-
मितौ प्रतिबन्धकम् ।
भाषा-लक्षणनिष्ठ अनुमितिविरोधित्व इस भागका अनुमिति तत्कारण अन्यतर
विरोधित्व अर्थ करना अर्थात् "यादृशविशिष्टविषयकत्वेन ज्ञानस्य अनुमितितत्कार-

. परिच्छेदः २ भाषाटीकासमेता. १६१
णान्यतरविरोधित्वं तत्त्वम् ” ऐसा लक्षणका स्वरूप जानना. ऐसा लक्षण करनेसे
अनुमितिकारणीभूत व्याप्तिज्ञानके विरोधि व्यभिचार्यादिहेतुओंकाभी ग्रहण हो सक-
ता है; अन्यथा “अयं हेतुर्व्यभिचारी” इत्याकारक ज्ञानको साक्षात् अनुमितिविरोधि-
त्व न होनेसे व्यभिचार्यादि हेतुओंमें हेत्वाभास लक्षणकी अव्याप्ति अवश्य होती;
परन्तु ‘ अनुमिति ’ शब्दसे अनुमिति तत्कारण अन्यतर ग्रहण करनेसे अव्याप्ति
नहींहै. जिस हेतुविषयक दोष ज्ञान होता है वह उसी हेतुसे उत्पन्न होनेवाली अनु-
मितिका प्रतिरोधक होता है अर्थात् “ पर्वतो वह्निमान् प्रमेयत्वात्” इत्यादि स्थलमें
प्रमेयत्वरूप हेतुमें व्यभिचाररूप दोषज्ञान हुआहै इसलिये इसी हेतुसे उत्पन्न होनेवाली
अनुमितिका प्रतिबन्धक हो सक्ताहै. यदि इसी स्थलमें धूमरूप हेत्वन्तरसे अनुमिति
होवे तो वह दोषज्ञान उसका प्रतिबन्धक नहींहै.
तेनैकेहेतौ व्यभिचारग्रहे हेत्वन्तरेणानुमित्युत्पत्तेस्तदभावाद्यन-
वगाहित्वाच्च व्यभिचारज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वाभावेऽपि न
क्षतिरिति संक्षेपः ।
भाषा-एवं एकहेतुविषयक व्यभिचारज्ञान होय तो हेत्वन्तरसे अनुमिति होनेमें
कोई बाधक नहीं है और व्यभिचार ज्ञानको साध्याभावादिकोंका अनवगाहन करने-
वाला होनेसे अनुमितिका विरोधि न होनेसेभी अव्याप्तिरूप दोषप्रयुक्त हानि नहींहै.
भाव यह कि-साध्याभावका अवगाहन करनेसे बाधादिदोष साक्षात् अनुमितिके प्रति
बन्धक हो सकतेंहैं व्यभिचारादि दोष साक्षात् साध्याभावावगाही नहींहैं; इसलिये
साक्षात् अनुमितिके प्रतिबन्धकभी नहींहैं किन्तु पूर्वोक्त रीतिसे अनुमितिकारण व्या-
प्तिज्ञानादिके प्रतिबन्धक हैं;इसलिये इनमें परंपरया प्रतिबन्धकताहै परंतु पूर्वोक्त रीतिसे
लक्षणमें ‘अन्यतरका’ निवेश करनेसे अव्याप्ति नहींहै. यह संक्षेपसे हेत्वाभासमात्रका
सामान्य लक्षण दिखलायाहै.
यादृशपक्षसाध्यहेतौ यावन्तो दोषास्तावदन्यान्यत्वं तत्र हेत्वा-
भासत्वम् । पञ्चकथनं तु तत्सम्भवस्थलाभिप्रायेण । एवं च
साधारण्याद्यन्यतमत्वमनैकान्तिकत्वम् ॥ ७१ ॥
भाषा-इस संसारमात्रमें जितने पक्षसाध्य हेतुओंकी रचना होसकती है तथा
उनमें जितने दोष आसकते हैं, उन सबसे भिन्न-भिन्नत्वरूप ‘ हेत्वाभासत्व ’
समझना चाहिये अर्थात् हेत्वाभासत्वरूप धर्म असंख्यात हेत्वाभासोंमें रहता है और
आचार्य लोगोंका पंच हेत्वाभास कहनेका यह भाव है कि-व्यभिचारादि पांचों
१४

१६२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
दोष " वायुः गन्धवान् स्नेहात् " इस एकही स्थलमें आसकतेहैं. यहां गन्धाभाववद्
जलमें वृत्ति होनेसे स्नेहरूप हेतु व्यभिचारी है १ । गन्धरूप साध्यवाली पृथिवीमें
नहीं रहता इसलिये स्नेहरूप हेतु विरुद्धभी है २ । स्नेहरूप हेतुके गन्धरूप साध्यके
अभावका साधक ' अपृथिवीत्व ' रूप विरोधिहेतु विद्यमान है; इसलिये यह हेतु
सत्प्रतिपक्षीभी है ३ । स्नेहरूप हेतु वायुका विशेषण नहीं होसकता तथा वायुरूप
पक्षमें नहीं रहता तथा ' पाकजगुणवत्त्व ' रूप उपाधिसे सोपाधिक है इसलिये
असिद्धभी है ४ । स्नेहरूप हेतुके गन्धरूप साध्यका पक्षमें अभाव है इसलिये यह
हेतु बाधितभी है ५ । इस रीति के संभवस्थल तात्पर्य्यसे आचार्य्यलोगोंने पांच हेत्वा-
भास लिखेहैं. ऐसेही साधारणादि तीनसे भिन्न संसारमात्रको छोड़कर साधारणादि
तीनहींमें ' अनैकान्तिकत्व ' रूप धर्म रहता है ॥ ७१ ॥
आद्यः साधारणस्तु स्यादसाधारणकोऽपरः ।
तथैवानुपसंहारी त्रिधाऽनैकान्तिको भवेत् ॥ ७२ ॥
भाषा-प्रथमका नाम साधारण है,द्वितीयका नाम असाधारण है और तृतीयका
नाम अनुपसंहारी है. इसरीतिसे अनैकान्तिक तीन प्रकारका है ॥ ७२ ॥
साधारणः साध्यवदन्यवृत्तिर्हेतुः,तेन च व्याप्तिग्रहप्रतिबन्धःक्रियते।१।
भाषा-साध्यवालेसे अन्यमें वर्तनेवाला हेतु साधारण कहाता है. ऐसा हेतु
व्याप्तिज्ञानका प्रतिबन्धक होता है अर्थात् साध्यवदन्यावृत्तित्वरूपा या साध्य-
सामानाधिकरणरूपा व्याप्ति साध्यवालेसे अन्यमें वर्तवाले व्यभिचारी हेतुसे नहीं
होसकती इस साधारण हेतुके उदाहरणस्थल " पर्वतो वह्निमान् प्रमेयत्वात् "
इत्यादि अनेक हैं १ ।
असाधारणः साध्यासमानाधिकरणो हेतुः, तेन साध्यसामानाधि-
करण्यग्रहः प्रतिबध्यते। तथा शब्दो नित्यः शब्दत्वादित्यादाव-
साधारण्यं शब्दोऽनित्यः शब्दत्वादित्यादौ त्वसाधारण्यभ्रमः ।
अन्ये तु सपक्षावृत्तिरसाधारणः । सपक्षश्च निश्चितसाध्यवान् ।
इत्थं च शब्दोऽनित्यः शब्दात्वादित्यादौ पक्षे यदा पक्षे साध्य-
निश्चयस्तदा नासाधारण्यं तत्र हेतुनिश्चयादिति वदन्ति ।२।
भाषा-साध्यके साथ एकाधिकरणमें जो कहीं न रहे वह हेतु असाधारण होता
है. ऐसा हेतु केवल साध्यसामानाधिकरण्यरूप व्याप्तिज्ञानका प्रतिबन्धक होता है.

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६३
हरणस्थल इसके “ शब्दो नित्यः शब्दत्वात् ” इत्यादि अनेक होसकतेहैं. कई
एक मीमांसक लोग “ शब्दो नित्यः शब्दत्वात् ” इत्यादि स्थलकोभी इसी असा-
धारणका उदाहरण मानते हैं, परन्तु यह उनका मानना उचित नहीं; क्योंकि कार्य-
त्वरूप हेतुसे जब शब्दमें अनित्यत्व सिद्ध होचुका तो अनित्यत्वके समानाधिकरण-
में रहनेवाला शब्दत्वरूप हेतु साध्यासमानाधिकरण नहीं होसकता; इसलिये ऐसे
स्थलमें असाधारण्यका भ्रम समझना चाहिये. कई एक प्राचीन लोग सपक्षमें न
रहनेवाले हेतुको असाधारण कहतेहैं. निश्चित साध्यवालेका नाम सपक्ष है. इस
रीतिसे “शब्दोऽनित्यः शब्दत्वात् ” इत्यादिस्थलमें यदि शब्दरूप पक्षमें अनित्य-
त्वरूप साध्यका निश्चय है तो शब्दत्वरूप हेतु असाधारण नहीं है; क्योंकि ( तत्र )
वहां निश्चित साध्यवाले पक्षमें हेतुकाभी निश्चयही हैं. एवं वह हेतु सपक्षावृत्ति नहीं
है किन्तु सपक्षवृत्तिही है, इसलिये असाधारणभी नहीं है २ ।
अनुपसंहारी चात्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यकादिः, तेन च व्यति-
रेकव्याप्तिग्रहप्रतिबन्धः क्रियते । ३ ।
भाषा-जिस स्थलमें पक्षसाध्य तथा हेतु अत्यन्ताभावके प्रतियोगी न होवैं
अर्थात् केवलान्वयि होवें उस स्थलमें अनुपसंहारी अनैकान्तिक होताहै. ऐसे हेतुका
‘साध्याभावव्यापकीभूताभाव प्रतियोगित्व ’ रूप व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानके साथ विरोध
है और यही हेतु अन्वयव्याप्तिज्ञानसे अनुमितिका जनकभी है. उदाहरणस्थल
इसके “सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्” इत्यादि अनेक हैं ३ ।
विरुद्धस्तु साध्यव्यापकीभूताभावप्रतियोगी, अयं च साध्याभाव-
ग्रहसामग्रीत्वेन प्रतिबन्धकः । सत्प्रतिपक्षे प्रतिहेतुः साध्याभाव-
साधकोऽत्र तु हेतुरेवेति विशेषः । १ ।
भाषा-साध्यके समानाधिकरणमें व्यापक होकर रहनेवाले अभावका प्रतियोगी
हेतु विरुद्ध होताहै. यह हेतु साध्याभावकी ग्राहिका जो सामग्री तादृश सामग्रीरूपसे
अनुमितिका प्रतिबन्धक है अर्थात् स्वयं हेतुही साध्याभावके ग्रहण करवानेवाली
सामग्रीरूप होजाताहै. उदाहरणस्थल इसके “शब्दो नित्यः कृतकत्वात्” इत्यादि
अनेक होसकतेहैं. शंका-ऐसे विरुद्धसाध्याभाव साधक हुआ और सत्प्रतिपक्षभी
साध्याभाव साधकही हुआ तो इन दोनोंका आपसमें भेद क्या है? समा०-सत्प्र-
तिपक्षस्थलमें दूसरा विरोधी हेतु साध्याभावका साधक होताहै और यहां विरुद्ध-
स्थलमें तो वही एकही हेतु अपने साध्यके अभावका साधक होजाताहै; इतनाही
इन दोनोंका आपसमें भेद है १ ।

साध्याभावसाधक एव हेतुः साध्यसाधकत्वेनोपन्यस्त इत्यश-
क्तिविशेषोपस्थापकत्वाच्च विशेषः । २ ।
भाषा-दूसरा इन दोनोंका परस्पर यह भेद है कि-अपनी अनुमानरचनामें
जिस पण्डितने विरुद्धहेतुका प्रयोग किया है वही हेतु उस पण्डितकी अशक्तिका
सूचकभी है अर्थात् साध्याभावके सिद्ध करनेवाला हेतु साध्यसिद्धिके लिये सभामें
जो पण्डित बोले उसकी अनभिज्ञताको दूसरे विज्ञलोग उसीवक्त जान लेतेहैं परन्तु
सत्प्रतिपक्ष स्थलमें यह बात नहीं है इससे दोनोंका परस्पर भेद है २ ।
सत्प्रतिपक्षः साध्याभावव्याप्यवान् पक्षः । अगृहीताप्रामाण्यक-
साध्यव्याप्यवत्त्वेनोपस्थितिकालिनागृहीताप्रामाण्यकसाध्याभा
वव्याप्यवत्त्वेनोपस्थितिविषयस्तथेत्यन्ये । अत्र च परस्परभा-
वव्याप्यवत्ताज्ञानात् परस्परानुमितिप्रतिबन्धः फलम् ।
भाषा-“साध्याभावस्य व्याप्यः साध्याभावव्याप्यः, स यस्मिन् वर्तते स साध्या-
भावव्याप्यवान् पक्षः” अर्थात् साध्याभावके साथ व्याप्तिविशिष्ट जो हेतु तादृश
हेतुमान् पक्षमें सत्प्रतिपक्ष व्यवहार हो सकताहै. उदाहरणस्थल इसके “हदो वह्नि-
मान् धूमात्, हदो वह्न्यभाववान् जलात् ” इत्यादि अनेक होसकतेहैं यहां दोनों
हेतुओंको परस्पर विरोधि होनेसे दोनोंहीमें सत्प्रतिपक्षव्यवहार होताहै इसी सत्प्रति-
पक्षका लक्षण कईएक ऐसा कहते हैं कि-साध्यव्याप्यवत्त्वेन उपस्थितिकालमें जिस
हेतुमें अप्रमाणता गृहीत नहीं हुई उसी कालमें उसी स्थलमें उसी हेतुमें यदि
साध्याभाव व्याप्यत्वेन उपस्थितिभी किसीतरहसे अप्रमाणिका न होवे तो वह हेतु
सत्प्रतिपक्ष होताहै;परन्तु यह वार्ता किसीभी हेतुमें प्रतिहेतु विना दुर्घट है इसलिये
सत्प्रतिपक्षस्थलमें परस्पर साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानसे उभय हेतुसे परस्पर अनु-
मितिका प्रतिबन्ध होनाही फल समझना चाहिये.
अत्र केचित् । यथा घटाभावव्याप्यवत्ताज्ञाने विद्यमानेऽपि
घटचक्षुःसंयोगे सति घटवत्ताज्ञानं जायते ।
भाषा-रत्नकोशकार नैयायिक सत्प्रतिपक्षको अनुमितिका प्रतिबन्धक नहीं
मानता, किन्तु सन्देहउत्पादनद्वारा इसमें दूषकता मानता है. इसको स्वसिद्धान्तसे
विरुद्ध जानकर खण्डनार्थ 'अत्र केचित् ' इत्यादि ग्रन्थका ग्रन्थकार उपन्यास
करतेहैं-रत्नकोशकार यह कहताहै कि-ज्ञानोंका परस्पर प्रतिबध्य प्रतिबन्धकभाव
अनुभवानुरोधसे जैसा जहां हो वैसाही मानना उचित है; जैसे यदि कहीं शै

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६५
विनाशि दोषवशसे घटवाली जगहमें घटाभावव्याप्यवत्ता ज्ञान होनेसेभी पश्चात्
सम्यक् चक्षुःसम्बन्धसे वहांही घटवत्ताका ज्ञान होताहै. यह अनुभवसिद्ध है अर्थात्
ऐसे स्थलमें दोषसे चक्षुःसंयोगरूप गुण प्रबल होताहै.
यथा च शंखे सत्यपि पीतत्वाभावव्याप्यशंखत्ववत्ताज्ञाने पि-
त्तादिदोषेण पीतः शंख इति धीर्जायते । एवं कोटिद्वयव्याप्यव-
त्तादर्शनेपि कोटिद्वयस्य प्रत्यक्षरूपः संशयो भवति तथा सत्प्र-
तिपक्षस्थले संशयरूपानुमितिर्भवत्येव ।
भाषा-एवं जैसे अदूषितनेत्र पुरुषको शंखमें पीतत्वाभावव्याप्य शंखत्ववत्ता ज्ञान
होनेसेभी पश्चात् पित्तादि दोषवशसे 'पीतः शंखः' इत्याकारक बुद्धि होजातीहै, यहभी
अनुभवसिद्ध है अर्थात् ऐसे स्थलमें गुणसे दोषकी प्रबलता है. एवं जैसे मन्द अन्ध-
कारमें पुरुषको स्थाणुमें या पुरुषमें "स्थाणुर्वा पुरुषो वा" इत्याकारक कोटिद्वयावगाहि
यदि प्रत्यय हो तो ऐसे स्थलमें 'स्थाणुत्वव्याप्यवक्रकोटरादिमत्त्व' तथा 'पुरुषत्व-
व्याप्यकरचरणादिमत्त्व' रूप कोटिद्वय व्याप्यवत्ता दर्शनसेभी कोटिद्वयका प्रत्यक्षा-
त्मक संशयही होता है, यह अनुभवसिद्ध है अर्थात् ऐसे स्थलमें गुण या दोष कोई
निर्बल सबल नहीं है किन्तु दोनों समबल हैं. वैसेही सत्प्रतिपक्षस्थलमेंभी दोनों हेतु-
ओंको समबल होनेसे संशयात्मिक अनुमिति होसकतीहै.
यत्र चैककोटिव्याप्यदर्शनं तत्राधिकबलतया द्वितीयकोटिभान-
प्रतिबन्धान्न संशयः। फलबलेन चाधिकसमबलभावः कल्प्यत इति
वदन्ति । तन्न । तदभावव्याप्यवत्ताज्ञाने सति तदुपनीतभानवि-
शेषशाब्दबोधादेरनुदयाल्लौकिकसन्निकर्षजन्यदोषविशेषाजन्य-
ज्ञानमात्रे तस्य प्रतिबन्धकता लाघवात् ।
भाषा-और जहां एककोटिव्याप्यवत्ता ज्ञान निःसंदेह होचुका है वहां वह कोटि
अधिक बलवाली होनेसे द्वितीय कोटिका प्रतिबन्धक अवश्य होगी; इसलिये ऐसे
स्थलमें संशय नहीं होसकता. कोटियोंके अधिक समबलभावकी कल्पना फलानु-
रोधसे हरएक स्थलमें होसकती है; ( तन्न ) यह कथन रत्नकोशकारका युक्तियुक्त
नहीं है; क्योंकि ज्ञानोंका परस्पर प्रतिबध्यप्रतिबन्धकभाव जहां तक हो सके लाघवा-
नुरोधसे मानना उचित है और यह वार्ता विद्वान् लोगोंके अनुभवसिद्ध है कि जिस
स्थलमें साध्याभावव्याप्यवत्ताका ज्ञान साक्षात्कारात्मक हुआ है उसी स्थलमें उसी

१६६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
साध्यविषयक ( उपनीत ) अलौकिक सन्निकर्ष विशेषद्वारा भान अथवा अनुमिति
उपमिति या शाब्दबोध कुछभी नहीं होता और प्रतिबध्य कोटिक ज्ञानोंका भिन्नभिन्न
नामनिर्देश करनेसे नियमका शरीरभी गुरूभूत होताहै इसलिये कोई लघुभूत नियम
कहना चाहिये. वह यही होसकता है कि “ साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानस्य लौकिक
सन्निकर्षाजन्य दोषविशेषजन्यज्ञानत्वावच्छिन्ने प्रतिबन्धकत्वम्” अर्थात् साक्षात्कारा-
त्मक साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानकी लौकिकसन्निकर्षनिष्ठ जनकता निरूपित जन्य-
ताशून्य ज्ञानमात्रके प्रति तथा दोषविशेषनिष्ठ जनकता निरूपित जन्यताशून्य ज्ञानमा-
त्रके प्रति प्रतिबन्धकता है. भाव यह कि-शाब्दबोधादिज्ञान लौकिकसन्निकर्षजन्य
नहीं किंतु पदज्ञानादि जन्य है; एवं ‘ पीतः शंखः ’ यह ज्ञान दोष विशेषजन्य
नहीं किन्तु पित्तादि दोषविशेषसेही जन्य है. एवं साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानको
शाब्दबोधादिज्ञानोंके प्रति प्रतिबन्धकता और ‘ पीतः शंखः ’ इत्यादिज्ञानोंके प्रति
अप्रतिबन्धकता अतिलघुभूत नियमसे सिद्ध हुई.
न तूपनीतभानविशेषे शाब्दबोधे च पृथक्प्रतिबन्धकता गौरवात्,
तथा च प्रतिबन्धकसत्त्वात् कथमनुमितिः । न हि लौकिकस-
न्निकर्षस्थले प्रत्यक्षमिव सत्प्रतिपक्षस्थले संशयानुमितिः प्रमा-
णिकी, येनानुमितिभिन्नत्वेनापि विशेषणीयम् ।
भाषा-इसलिये साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानकी उपनीत भानविशेषमें और शाब्द-
बोधादिमें जुदी जुदी प्रतिबन्धकता माननी उचित नहीं क्योंकि गौरव होताहै. इस
रीतिसे सत्प्रतिपक्षस्थलमेंभी साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानरूप प्रतिबन्धकके विद्यमान
होनेसे अनुमिति कैसे होसकतीहै? अर्थात् कभी नहीं होसकती. क्योंकि साध्याभाव
व्याप्यवत्ताज्ञाननिष्ठ प्रतिबन्धकता निरूपित प्रतिबध्यतावच्छेदक कोटि प्रविष्टत्व
अनुमिति ज्ञानकोभी स्वतःसिद्ध है और रत्नकोशकारके अभिप्रायसे हम प्रतिबध्य
प्रतिबन्धकभाव नियमके शरीरमें (अनुमितिभिन्नत्वेन) प्रतिबध्यताका निवेशभी नहीं
करसकते; क्योंकि लौकिक सन्निकर्षस्थलमें प्रत्यक्षकी तरह सत्प्रतिपक्षस्थलमें संश-
यात्मिका अनुमिति प्रामाणिकलोगोंने प्रामाणिकी नहीं मानी अर्थात् प्रामाणिकलोग
लौकिक सन्निकर्षस्थलमें प्रत्यक्षमें प्रमाणता मानतेहैं और सत्प्रतिपक्षस्थलमें संशया-
नुमिति अप्रामाणिकी मानतेहैं.
यत्र कोटिद्वयव्याप्यवत्ताज्ञानं तत्रोभयत्राप्रामाण्यज्ञानात्संशयो
नान्यथा, अगृहीताप्रामाण्यकस्यैव विरोधिज्ञानस्य प्रतिबन्धक-
त्वादिति । ३ ।

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६७
भाषा--और रत्नकोशकारने जो " स्थाणुर्वा पुरुषो वा " इत्याकारक प्रत्यक्ष
संशयका उदाहरण देकर सत्प्रतिपक्षस्थलमें संशयात्मक अनुमितिका स्थापन
किया है, वहभी ठीक नहीं; क्योंकि संशय नियमसे वहांही हुआ करता है, जहां
उभयकोटिव्याप्यवत्ता ज्ञानमें अप्रमाणता गृहीत हो प्रकारान्तरसे कभी नहीं
होता और इतर ज्ञाननिष्ठ प्रतिबध्यतानिरूपित प्रतिबंधकता उसी ज्ञानमें रहती है,
जिसमें किसी तरहसे अप्रमाणता गृहीत न हुई हो; इसलिये संशयस्थलमेंभी यही
समझना चाहिये कि, जबतक उभय कोटिक निश्चयमें किसी एक निश्चयमें प्रामाण्य
ग्रहण नहीं हुआ तबतक संशयज्ञानका कोई अंश निर्बल या सबल होकर
अपनेमें प्रत्यक्षरूपताका भाव नहीं दिखला सकता और संशयज्ञानमें प्रमाणताभी
किसीने नहीं मानी, संशयस्थलमें जब एक कोटिमें प्रमाणताका निश्चय होगा तब
संशय आपही नहीं रहेगा इसलिये इसके निदर्शनसे सत्प्रतिपक्षस्थलमें संशयात्मिक
अनुमिति माननीभी केवल मनोरथ मात्र है ३ ।
आश्रयासिद्धयाद्यन्यतमत्वमसिद्धित्वम्। आश्रयासिद्धिः पक्षे पक्ष-
तावच्छेदकस्याभावः। यत्र च काञ्चनमयः पर्वतो वह्निमानिति
साध्यते तत्र पर्वतो न काञ्चनमय इति ज्ञाने विद्यमाने काञ्चन-
मयपर्वते परामर्शप्रतिबन्धः फलम् । १ ।
भाषा-आश्रयासिद्धयादि, भेदाभाववाले हेतुसमुदायका नाम आश्रयासिद्ध है
अर्थात् ' आश्रयासिद्धयादि ' पदसे स्वरूपासिद्ध व्याप्यत्वासिद्ध साध्यासिद्ध आदि
सबका ग्रहण है, इनका भेद इन सबको त्यागकर संसारमात्रमें है, उस भेदका
अभाव इन सबमें है; एवं लक्षण संगत हुआ, जिस हेतुके पक्षमें पक्षतावच्छेदक
धर्म न रहे वह हेतु आश्रयासिद्ध कहाता है; उदाहरणस्थल इसके " काञ्चनमय-
पर्वतो वह्निमान् धूमात् " इत्यादि अनेक हैं, " पर्वत कांचनमय नहीं है " इत्या-
कारक ज्ञानके विद्यमान होनेसे कांचनमय पर्वतमें "वह्निव्याप्यधूमवान् कांचनमय-
पर्वतः " इत्याकारक परामर्शका प्रतिबन्ध होना अर्थात् परामर्शने ना उत्पन्न होना
यही इसका फल है १ ।
स्वरूपासिद्धिस्तु पक्षे व्याप्यत्वाभिमतस्याभावः । अत्रच ह्रदो
द्रव्यं धूमादित्यादौ पक्षे व्याप्यत्वाभिमतस्य हेतोरभावे ज्ञाते
पक्षे साध्यव्याप्यहेतुमत्त्वज्ञानरूपपरामर्शप्रतिबन्धः फलम् । २ ।
भाषा-व्याप्यत्वेन अर्थात् हेतुत्वेनाभिमत हेतु यदि पक्षमें न रहे तो वह
स्वरूपासिद्ध कहा जाता है; उदाहरणस्थल इसके " ह्रदो द्रव्यं धूमात् " इत्यादि

१६८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
अनेक हैं, यहांभी हृदादि पक्षमें व्याप्यत्वेनाभिमत धूमरूप हेतुके अभावका ज्ञान
होनेसे " द्रव्यव्याप्यधूमवान् ह्रदः " इत्याकारक ज्ञानरूप परामर्शका प्रतिबन्ध
होनाही फल है २ ।
साध्याप्रसिद्धिरपि व्याप्यत्वासिद्धिः। सा च साध्ये साध्यतावच्छे-
दकाभावः । तथा च काञ्चनमयवह्निमानित्यादौ साध्ये साध्यता-
वच्छेदकाभावे ज्ञाते साध्यतावच्छेदकविशिष्टसाध्यव्याप्यवत्ता-
ज्ञानरूपपरामर्शप्रतिबन्धः फलम् ।
भाषा-साध्याप्रसिद्धिकी गणनाभी व्याप्यत्वासिद्धिकेही अंतर्भूत है. जिस
स्थलमें साध्यमें साध्यतावच्छेदक धर्मकी सम्भावना न हो वहां साध्याप्रसिद्धि
होती है; उदाहरणस्थल इसके " पर्वतः कांचनमयवन्हिमान् धूमात् " इत्यादि
अनेक होसकतेहैं. यहांभी ‘ कांचनमयवन्हित्व ’ रूप साध्यतावच्छेदक धर्मके
अभावका ज्ञान होनेसे " कांचनमयवन्हिव्याप्यधूमवान् पर्वतः " इत्याकारक
ज्ञानरूप परामर्शका प्रतिबन्ध होनाही फल है.
एवं हेतौ हेतुतावच्छेदकाभावः साधनाप्रसिद्धिः । यथा च काञ्च-
नमयधूमादित्यादौ अत्र हेतुतावच्छेदकविशिष्टहेतोर्ज्ञानाभावात्
तद्धेतुकव्याप्तिज्ञानादेरभावः फलम् । एवं वह्निमान् नीलधूमा-
दित्यादौ गुरुतया नीलधूमत्वं हेतुतानवच्छेदकमिति व्याप्यत्वा-
सिद्धिरित्यपि वदन्ति । ३ । ४ ।
भाषा-ऐसेही जिस स्थलमें हेतुमें हेतुतावच्छेदक धर्मका सम्भव न हो वहां
साधनाप्रसिद्धि होती है; उदाहरणस्थल इसके" पर्वतो वन्हिमान् कांचनमयधूमात् "
इत्यादि अनेक होसकतेहैं. ऐसे स्थलमें कांचनमयधूमत्वरूप हेतुतावच्छेदकविशिष्ट
‘ कांचनमयधूम ’ रूप हेतुके ज्ञानको न होनेसे उस हेतुसे उत्पन्न होनेवाले
व्याप्तिज्ञानकी अनुत्पत्ति ही फल है. ऐसेही गुरुधर्ममें अवच्छेदकताके
ना माननेवाले कई एक विद्वान् लोग " पर्वतो वन्हिमान् नीलधूमात् '
इत्यादि स्थलकोभी व्याप्यत्वासिद्धिका उदाहरण मानतेहैं. ऐसे स्थलमें
‘नीलधूमत्व ’ रूप धर्म समनियत लघुभूत धूमत्वरूप धर्म्मसे गुरुभूत होनेसे हेतु-
तावच्छेदक धर्म नहीं होसकता इसीसे तद्विशिष्ट व्याप्ति ज्ञानभी नहीं होसकता;
यही उनके कथनका भाव है; परन्तु यह सिद्धान्त सर्वसम्मत नहीं है ३ । ४ ।

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६९
बाधस्तु पक्षे साध्याभावादिः। एतस्यानुमितिप्रतिबन्धः फलम्।
तद्धर्मिकतदभावनिश्चयो लौकिकसन्निकर्षाजन्यदोषविशेषाज-
न्यतद्धर्मिकतज्ज्ञानमात्रे विरोधीति।
भाषा-जिस स्थलमें पक्षमें साध्य न रहे वहां बाधदोष होताहै. वही 'एकज्ञान-
विषयत्वसम्बन्धेन' हेतुके सिरपर जाताहै तो हेतुमें बाधित व्यवहार होताहै. उदा-
हरणस्थल इसके "वह्निरनुष्णः द्रव्यत्वात्" इत्यादि अनेक होसकतेहैं. साक्षात्
अनुमितिके प्रतिरोधक होना इस बाधरूप दोषका फल है. तद्धर्मिक तद-
भावनिश्चय अर्थात् अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानाऽनास्कन्दित तद्धर्मिक तद्भावनिश्चय
लौकिकसन्निकर्षाजन्य दोषविशेषाजन्य तद्धर्मिक तद्ज्ञानमात्रके प्रति विरोधी होताहै.
इस नियममें प्रथम 'तत्' पदसे प्रकृतोपयोगि धर्मका ग्रहण है; द्वितीय 'तत्' पदसे
धर्मीका ग्रहण है और बाधकालीन इच्छाजन्य ज्ञानका नाम आहार्यज्ञान है. 'शाल-
ग्रामशिलामें ईश्वरबुद्धि करनी, प्रतिमामें देवबुद्धि करनी' इत्यादि इस ज्ञानके
उदाहरणस्थल हैं. इस प्रकारका आहार्य्य जो न हो वह कहावे अनाहार्य्य; एवं
संशयादि ज्ञानोंका नाम 'अप्रामाण्य ज्ञान' है. 'स्कन्दित' नाम संमिश्रितका है.
अप्रामाण्यज्ञानसे स्कन्दित अर्थात् मिश्रित जो नहीं है उसका नाम 'अप्रामाण्यज्ञा-
नानास्कन्दित' है. ऐसे अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दित तद्धर्मिक तदभावनिश्चयको
लौकिकसन्निकर्षाजन्य दोषविशेषाजन्य तद्धर्मिक तद्ज्ञानमात्रके प्रति प्रतिबन्धकता
है. प्रत्यक्षभिन्न ज्ञानमात्र लौकिकसन्निकर्षाजन्य है, उन लौकिक सन्निकर्षजन्य ज्ञानों-
मेंसे एक दोषविशेषसे जन्य 'पीतः शंखः' इत्यादि ज्ञानको छोड़कर यावत् ज्ञानके
प्रति तद्धर्मिक तद्भावनिश्चयको विरोधिता है. एवं प्रकृतमें वह्नयात्मक पक्षमें अनुष्ण
त्वधर्मिक अनुष्णाभाववत्ता निश्चयको अर्थात् 'वह्निरुष्णः' इत्यादि स्पार्शनिक
साक्षात्कारकोभी अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दित तद्धर्मिक तदभावनिश्चयरूप
होनेसे 'वह्निरनुष्णः' इत्यादि अनुमितिके प्रति प्रतिबन्धकता होसकतीहै;क्योंकि अनु-
मित्यात्मक ज्ञानभी लौकिकसन्निकर्षाजन्य दोषविशेषाजन्य तद्धर्मिक तद्ज्ञानरूप
प्रतिबध्य कोटिके अंतर्भूतही है-इति.
न तु तत्र संशयसाधारणं पक्षे साध्यसंसृष्टत्वज्ञानमनुमितिकारणं
तद्विरोधितया च बाधसत्प्रतिपक्षयोर्हेत्वाभासत्वमिति युक्तम्।
अप्रसिद्धसाध्यकानुमित्यनापत्तेः, साध्यसंशयादिकं विनाऽप्यनु-
मित्युत्पत्तेश्च।
भाषा-किसीएक विद्वानका यह मत है कि-पक्षमें संशय साधारण साध्यसम्ब-
न्धका ज्ञान अनुमितिका कारण है और अनुमिति करणीभूत साध्यसंसृष्टत्व ज्ञानके

१७० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली-- [ अनुमान-
विरोधि होनेसे बाधसत्प्रतिपक्षमें हेत्वाभासता है, परन्तु यह कथन उसका युक्तियुक्त
नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा हो तो "पृथिव्यामितरभेदः" इत्याकारक अप्रसिद्ध
साध्यक अनुमिति उत्पन्न नहीं होनी चाहिये. भाव यह कि-ऐसे स्थलमें अनुमितिसे
पहिले पक्षमें साध्यसंसृष्टत्वका ज्ञान किसी तरहसेभी नहीं है और घनगर्जनादि स्थलोंमें
साध्यसंशय आदिकसे बिनाही अनुमितिज्ञानकी उत्पत्ति देखी जातीहै इसलिये
पक्षमें संशयसाधारणसाध्यसंसृष्टत्वज्ञानकी अनुमितिकेप्रति कारण मानना उचित नहीं.
एवं साध्याभावज्ञाने प्रमात्वज्ञानमपि न प्रतिबन्धकम्, प्रमाणा-
भावात् , गौरवाच्च ।
भाषा-एवं प्राचीन लोग साध्याभावज्ञानमें प्रमात्वबुद्धिको प्रतिबन्धक मानतेहैं
अर्थात् "हृदो वह्निमान्" इत्यादि अनुमितिज्ञानके प्रति "हृदो वह्न्यभाववान्"
इत्यादिज्ञानमें "इदं ज्ञानं प्रमा" इत्याकारक ज्ञानको प्रतिबन्धकता मानतेहैं परन्तु
ऐसा मानना उनका प्रमाणशून्य होनेसे समीचीन नहींहै. भाव यह कि-ज्ञाननिष्ठा
प्रतिबन्धकता ग्राह्याभावमुद्रिया होतीहै और "इदं ज्ञानं प्रमा" इत्याकारक ज्ञान तो
ग्राह्याभावानवगाहि है क्योंकि प्रकृतमें ग्राह्य वह्निरूप साध्य है, ग्राह्याभाव वह्न्यभाव
है. उसके अवगाहन करनेवाला ज्ञान "ह्रदो वह्न्यभाववान्" इत्याकारकही होसकता
है; इसलिये यही प्रतिबन्धक है. किन्तु "इदं ज्ञानं प्रमा" इत्याकारक नहीं और
पक्षविशेष्यक साध्याभाव ज्ञानमें प्रमात्वनिश्चयत्वेन गुरुभूत प्रतिबन्धकता कल्पना
करनकी अपेक्षा संशय निश्चय साधारणअप्रामाण्यज्ञानाभावत्वेन प्रतिबन्धकता
माननीही लाघव है.
अन्यथा सत्प्रतिपक्षादावपि तदभावव्याप्यवत्ताज्ञाने प्रमात्ववि-
षयकत्वेन प्रतिबन्धकतापत्तेः । किंतु भ्रमत्वज्ञानानास्कन्दित-
बाधादिबुद्धेः प्रतिबन्धकता,तत्र भ्रमत्वशङ्काविघटनेन प्रामाण्य-
ज्ञानं क्वचिदुपयुज्यते ।
भाषा-(अन्यथा)यदि साध्याभावज्ञानमें प्रमात्वज्ञानही प्रतिबन्धक मानें तो सत्प्रति-
पक्षादि स्थलोंमेंभी अनुमितिज्ञानके प्रति साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानमें प्रमात्वविषय-
कत्वेनही प्रतिबन्धकता होनी चाहिये; परन्तु यह वार्ता किसी विद्वान्के स्वीकृत
नहीं है, किन्तु भ्रमत्वज्ञानशून्य बाधज्ञानको प्रतिबन्धकता विद्वान्लोगोंके अभिमत
है. एवं ( तत्र ) बाधादि स्थलमें भ्रमत्वशंकानिवारणके लिये किसी एक स्थलमें
प्रामाण्यज्ञानकाभी उपयोग होताहै; अन्यथा नहीं.