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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 350 में से

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पृष्ठ 179

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५५
भाषा—और यदि "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक प्रत्यक्षा-
त्मक परामर्शसत्त्वकालमें "प्रत्यक्षादिभिन्नं वह्निज्ञानं मे जायताम्" इत्याकारक
इच्छा उत्पन्न होय तो अनुमिति होय सकतीहै; क्योंकि यह इच्छा प्रत्यक्षादिभिन्न
वह्निअनुमितिज्ञानमें उत्तेजकरूपेण विद्यमान है. ( एवं ) प्रकृतानुगममें यद्धेतुकका
निवेश करनेसे "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक धूम परामर्श-
सत्त्वकालमें "आलोकेन हेतुना अनुमितिर्मे जायताम्" इत्याकारक इच्छासेभी
अनुमितिकी आपत्ति नहीं होसकती; क्योंकि यह इच्छा यद्धेतुक परामर्श है तद्धेतुक
नहीं है इसलिये प्रकृतपरामर्शमें उत्तेजकभी नहीं है.
सिषाधयिषाविरहकाले यादृशसिद्धिसत्त्वे नानुमितिस्तादृशी
सिद्धिवैशिष्ट्यैव तत्तदनुमितिप्रतिबन्धिका वक्तव्या ।
भाषा—सिषाधयिषाके अभावकालमें जैसी सिद्धिके होत संते अनुमिति नहीं
होती वह २ सिद्धि विशेषरूपसे उसउस अनुमितिमें प्रतिबन्धक कहनी चाहिये अर्थात्
"पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक अनुमितिमें पर्वतत्वावच्छिन्नविशेष्यता निरूपित वह्नित्वाव-
च्छिन्न प्रकारताशालिनिश्चयत्वेन सिद्धात्मक ज्ञानको प्रतिबन्धकता कहनी उचित है.
तेन पर्वतस्तेजस्वी पाषाणमयो वह्निमानिति ज्ञानसत्त्वेऽप्यनु-
मितेर्न विरोधः ।
भाषा—इससे "पर्वतः तेजस्वी" अथवा "पाषाणमयो वह्निमान्" इत्याकारक
सिद्धात्मक ज्ञान होनेसेभी "पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक अनुमितिज्ञान रुक
नहीं सकता; क्योंकि यह नियम है कि—तद्विशेष्यक तत्प्रकारक अनुमितिज्ञानके
प्रति तद्विशेष्यक तत्प्रकारक सिद्धात्मक ज्ञानको प्रतिबन्धकता है, इतरको नहीं;
और प्रकृतमें अनुमितिज्ञान तो पर्वतत्वावच्छिन्न विशेष्यतानिरूपित वह्नित्वावच्छिन्न
प्रकारताशालि है परन्तु सिद्धिज्ञान प्रथम तो प्रकारतामें विपरीत है अर्थात् तेज-
स्त्वावच्छिन्न प्रकारक है और द्वितीयविशेष्यतामें विपरीत है अर्थात् पाषाणमयत्वा-
वच्छिन्न विशेष्यक है इसलिये यह ज्ञानप्रतिबन्धक नहीं होसकते.
परंतु पक्षतावच्छेदकसामानाधिकरण्येन साध्यसिद्धावपि तद-
वच्छेदेनानुमितिदर्शनात् पक्षतावच्छेदकावच्छेदेनानुमिति प्रति
पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन साध्यसिद्धिरेव प्रतिबन्धिका, पक्षताव-
च्छेदकसामानाधिकरण्येनानुमितिंप्रति तु सिद्धिमात्रं विरोधि ।