न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 185, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ें. परिच्छेदः २ भाषाटीकासमेता. १६१
णान्यतरविरोधित्वं तत्त्वम् ” ऐसा लक्षणका स्वरूप जानना. ऐसा लक्षण करनेसे
अनुमितिकारणीभूत व्याप्तिज्ञानके विरोधि व्यभिचार्यादिहेतुओंकाभी ग्रहण हो सक-
ता है; अन्यथा “अयं हेतुर्व्यभिचारी” इत्याकारक ज्ञानको साक्षात् अनुमितिविरोधि-
त्व न होनेसे व्यभिचार्यादि हेतुओंमें हेत्वाभास लक्षणकी अव्याप्ति अवश्य होती;
परन्तु ‘ अनुमिति ’ शब्दसे अनुमिति तत्कारण अन्यतर ग्रहण करनेसे अव्याप्ति
नहींहै. जिस हेतुविषयक दोष ज्ञान होता है वह उसी हेतुसे उत्पन्न होनेवाली अनु-
मितिका प्रतिरोधक होता है अर्थात् “ पर्वतो वह्निमान् प्रमेयत्वात्” इत्यादि स्थलमें
प्रमेयत्वरूप हेतुमें व्यभिचाररूप दोषज्ञान हुआहै इसलिये इसी हेतुसे उत्पन्न होनेवाली
अनुमितिका प्रतिबन्धक हो सक्ताहै. यदि इसी स्थलमें धूमरूप हेत्वन्तरसे अनुमिति
होवे तो वह दोषज्ञान उसका प्रतिबन्धक नहींहै.
तेनैकेहेतौ व्यभिचारग्रहे हेत्वन्तरेणानुमित्युत्पत्तेस्तदभावाद्यन-
वगाहित्वाच्च व्यभिचारज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वाभावेऽपि न
क्षतिरिति संक्षेपः ।
भाषा-एवं एकहेतुविषयक व्यभिचारज्ञान होय तो हेत्वन्तरसे अनुमिति होनेमें
कोई बाधक नहीं है और व्यभिचार ज्ञानको साध्याभावादिकोंका अनवगाहन करने-
वाला होनेसे अनुमितिका विरोधि न होनेसेभी अव्याप्तिरूप दोषप्रयुक्त हानि नहींहै.
भाव यह कि-साध्याभावका अवगाहन करनेसे बाधादिदोष साक्षात् अनुमितिके प्रति
बन्धक हो सकतेंहैं व्यभिचारादि दोष साक्षात् साध्याभावावगाही नहींहैं; इसलिये
साक्षात् अनुमितिके प्रतिबन्धकभी नहींहैं किन्तु पूर्वोक्त रीतिसे अनुमितिकारण व्या-
प्तिज्ञानादिके प्रतिबन्धक हैं;इसलिये इनमें परंपरया प्रतिबन्धकताहै परंतु पूर्वोक्त रीतिसे
लक्षणमें ‘अन्यतरका’ निवेश करनेसे अव्याप्ति नहींहै. यह संक्षेपसे हेत्वाभासमात्रका
सामान्य लक्षण दिखलायाहै.
यादृशपक्षसाध्यहेतौ यावन्तो दोषास्तावदन्यान्यत्वं तत्र हेत्वा-
भासत्वम् । पञ्चकथनं तु तत्सम्भवस्थलाभिप्रायेण । एवं च
साधारण्याद्यन्यतमत्वमनैकान्तिकत्वम् ॥ ७१ ॥
भाषा-इस संसारमात्रमें जितने पक्षसाध्य हेतुओंकी रचना होसकती है तथा
उनमें जितने दोष आसकते हैं, उन सबसे भिन्न-भिन्नत्वरूप ‘ हेत्वाभासत्व ’
समझना चाहिये अर्थात् हेत्वाभासत्वरूप धर्म असंख्यात हेत्वाभासोंमें रहता है और
आचार्य लोगोंका पंच हेत्वाभास कहनेका यह भाव है कि-व्यभिचारादि पांचों
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