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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 350 में से

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पृष्ठ 187

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १६३
हरणस्थल इसके “ शब्दो नित्यः शब्दत्वात् ” इत्यादि अनेक होसकतेहैं. कई
एक मीमांसक लोग “ शब्दो नित्यः शब्दत्वात् ” इत्यादि स्थलकोभी इसी असा-
धारणका उदाहरण मानते हैं, परन्तु यह उनका मानना उचित नहीं; क्योंकि कार्य-
त्वरूप हेतुसे जब शब्दमें अनित्यत्व सिद्ध होचुका तो अनित्यत्वके समानाधिकरण-
में रहनेवाला शब्दत्वरूप हेतु साध्यासमानाधिकरण नहीं होसकता; इसलिये ऐसे
स्थलमें असाधारण्यका भ्रम समझना चाहिये. कई एक प्राचीन लोग सपक्षमें न
रहनेवाले हेतुको असाधारण कहतेहैं. निश्चित साध्यवालेका नाम सपक्ष है. इस
रीतिसे “शब्दोऽनित्यः शब्दत्वात् ” इत्यादिस्थलमें यदि शब्दरूप पक्षमें अनित्य-
त्वरूप साध्यका निश्चय है तो शब्दत्वरूप हेतु असाधारण नहीं है; क्योंकि ( तत्र )
वहां निश्चित साध्यवाले पक्षमें हेतुकाभी निश्चयही हैं. एवं वह हेतु सपक्षावृत्ति नहीं
है किन्तु सपक्षवृत्तिही है, इसलिये असाधारणभी नहीं है २ ।
अनुपसंहारी चात्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यकादिः, तेन च व्यति-
रेकव्याप्तिग्रहप्रतिबन्धः क्रियते । ३ ।
भाषा-जिस स्थलमें पक्षसाध्य तथा हेतु अत्यन्ताभावके प्रतियोगी न होवैं
अर्थात् केवलान्वयि होवें उस स्थलमें अनुपसंहारी अनैकान्तिक होताहै. ऐसे हेतुका
‘साध्याभावव्यापकीभूताभाव प्रतियोगित्व ’ रूप व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानके साथ विरोध
है और यही हेतु अन्वयव्याप्तिज्ञानसे अनुमितिका जनकभी है. उदाहरणस्थल
इसके “सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्” इत्यादि अनेक हैं ३ ।
विरुद्धस्तु साध्यव्यापकीभूताभावप्रतियोगी, अयं च साध्याभाव-
ग्रहसामग्रीत्वेन प्रतिबन्धकः । सत्प्रतिपक्षे प्रतिहेतुः साध्याभाव-
साधकोऽत्र तु हेतुरेवेति विशेषः । १ ।
भाषा-साध्यके समानाधिकरणमें व्यापक होकर रहनेवाले अभावका प्रतियोगी
हेतु विरुद्ध होताहै. यह हेतु साध्याभावकी ग्राहिका जो सामग्री तादृश सामग्रीरूपसे
अनुमितिका प्रतिबन्धक है अर्थात् स्वयं हेतुही साध्याभावके ग्रहण करवानेवाली
सामग्रीरूप होजाताहै. उदाहरणस्थल इसके “शब्दो नित्यः कृतकत्वात्” इत्यादि
अनेक होसकतेहैं. शंका-ऐसे विरुद्धसाध्याभाव साधक हुआ और सत्प्रतिपक्षभी
साध्याभाव साधकही हुआ तो इन दोनोंका आपसमें भेद क्या है? समा०-सत्प्र-
तिपक्षस्थलमें दूसरा विरोधी हेतु साध्याभावका साधक होताहै और यहां विरुद्ध-
स्थलमें तो वही एकही हेतु अपने साध्यके अभावका साधक होजाताहै; इतनाही
इन दोनोंका आपसमें भेद है १ ।