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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 350 में से

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पृष्ठ 183

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५९
हेतुका आभास होना युक्तियुक्त नहीं है. समाधान-हमको यह वार्ता इष्ट है.
हमभी धूमादि सद्धेतुओंमें विरोधि हेतुके होनेसेभी दुष्टव्यवहार नहीं कर सकते.
अन्यथा बाधस्याप्यनित्यदोषत्वापत्तिः । तस्मात्तत्र वह्न्यभाव-
व्याप्यपाषाणमयत्ववान् इति परामर्शकाले वह्निव्याप्यधूमस्य
नाभासत्वं भ्रमादनुमितिप्रतिबन्धमात्रं, हेतुस्तु न दुष्ट इति ।
भाषा-अन्यथा यदि प्रतिबन्धकीभूत भ्रमविषयकोभी दोषत्वेन ग्रहण किया
जाय तो बाधभी अनित्य दोषही होय जावेगा. भाव यह कि-पक्षमें साध्याभावका
भ्रम होनेसे सद्धेतु वास्तवमें दुष्ट नहीं होय सकता; परन्तु यदि पूर्वोक्त रीतिसेभी
हेतुमें सत्प्रतिपक्षता स्वीकार हो तो पक्षमें साध्याभावका भ्रम होनेसेभी सद्धेतुमें
बाधदोषसे दुष्ट व्यवहार कर लेना चाहिये; परन्तु यह वार्ता किसी विद्वान्‌को संमत
नहीं है. इसलिये वहांभी यही मानना उचित है कि-“वन्ह्यभावव्याप्यपाषाणमय-
त्ववान् पर्वत: ” इत्याकारक परामर्शकालमें वह्निव्याप्य धूमरूप हेतुको आभासत्व
नहीं है किन्तु भ्रमसे अनुमिति प्रतिरोध मात्र है, परन्तु हेतु दुष्ट नहीं है.
इत्थंच साध्याभाववद्वृत्तित्त्वहेत्वादिकं दोषः, तद्वत्ता च हेतौ येन
केनापि सम्बन्धेनेति नव्याः ।
भाषा-(इत्थं) इस रीतिसे जब यादृशविशिष्ट विषयकत्वेन ज्ञानको प्रतिबन्धकता
है तादृश विशिष्टका दोषत्वेन ग्रहण किया तो वास्तवसे साध्याभाव वालेमें वर्तनेवाले
हेत्वादिकही दोष हैं. यहां ‘आदि’ पदसे साध्याभावविशिष्ट पक्षकोभी दोष जानना
चाहिये. एतादृश दोषवत्ता हेतुमें व्यभिचारादि स्थलोंमें तो तादात्म्येन है और
बाधादि स्थलोंमें “साध्याभाववान् पक्षो हेतुश्च” इत्याकारक एकज्ञानविषयत्वेन है;
एवं यथासम्भव जिस किसी संबन्धसेभी जानलेनी चाहिये. यह नव्य नैयायिक
लोगोंका कथन है इनके सिद्धान्तसे “हेतुवदाभासन्ते इति हेत्वाभासाः”इस व्युत्पत्तिसे
हेत्वाभास ’ शब्द दुष्ट हेतुपर है.
परे तु यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तद्वत्त्वं हेत्वा-
भासत्वम्, सत्प्रतिपक्षे विरोधिव्याप्त्यादिकमेव तथा, तद्वत्त्वं च
हेतोर्ज्ञानरूपसम्बन्धेन ।
भाषा-और कईएक विद्वान्‌लोग सत्प्रतिपक्षादिदोषोंको अनित्य दोष मानतेहैं.
उनके मतसे “हेतोराभासाहेत्वाभासाः” इस व्युत्पत्तिसे ‘हेत्वाभास’ शब्द दोषपर है