न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
भाषा-परन्तु प्रतिबध्य प्रतिबन्धक भावस्थलमें यहभी ख्याल रखना चाहिये कि
पक्षतावच्छेदक समानाधिकरणमें अर्थात् पर्वतके किसी एक शिखरमें वह्निरूप साध्यकी
सिद्धि होनेसेभी (तदवच्छेदेन) पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन अर्थात् पर्वतके यावत् शिखरोंमें
अनुमिति होय सकती है इसलिये "पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन अर्थात् पर्वतके यावत्
शिखरोंमें होनेवाली अनुमितिके प्रति "पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन साध्यसिद्धिः-अर्थात्
पर्वतके यावत् शिखरोंमें वह्निविषयक चाक्षुष ज्ञानही प्रतिबन्धक होयसकता है और
पर्वतके शिखरमें होनेवाली अनुमितिके प्रति तो सिद्धिज्ञान मात्र प्रतिबन्धक है
अर्थात् एकशिखरमें होनेवाली अनुमितिके प्रति एकशिखरमें होनेवाला सिद्धिज्ञानभी
प्रतिबन्धक है और यावत् शिखरमें होनेवाला सिद्धिज्ञानभी प्रतिबन्धक है. भाव
यह कि-ज्ञानोंका प्रतिबध्य प्रतिबन्धक भाव समानविषयकत्वेन किंवा अधिक विषय-
कत्वेन होता है; परन्तु प्रतिबध्य ज्ञानसे न्यून विषयावगाहि ज्ञान कदापि प्रतिबन्धक
नहीं होयसकता; इसीलिये यावत् शिखरमें होनेवाली अनुमितिके प्रति एक शिखर-
निष्ठ सिद्धि ज्ञान प्रतिबन्धक नहीं है.
इदं तु बोध्यम् । यत्र अयं पुरुषो न वेति संशयानन्तरं पुरुषत्व-
व्याप्यकरादिमानयमिति ज्ञानं तत्रासत्यामनुमित्सायां पुरुषत्व-
स्य प्रत्यक्षं भवति, न त्वनुमितिः । अतोऽनुमित्साविरहविशि-
ष्टसमानविषयकप्रत्यक्षसामग्री कामिनीजिज्ञासादिवत् स्वात-
न्त्र्येण प्रतिबन्धिका ।
भाषा-( इदं तु बोध्यम्) इतना यहां औरभी विशेष जानने योग्य है कि-जिस
स्थलमें दोषवशसे पुरुषविषे " अयं पुरुषो न वा " इत्याकारक संशय हुआ पश्चात्
सम्यक् चक्षुःसंयोग होनेसे "पुरुषत्वव्याप्यकरचरणादिमानयं " इत्याकारक
परामर्श हुआ ऐसे स्थलमें संशयपक्षताविशिष्ट परामर्शरूप अनुमितिकी सामग्रीभी
विद्यमान है और चक्षुःसंयोगरूप प्रत्यक्षकी सामग्रीभी विद्यमान है परन्तु ऐसे
स्थलमें यदि अनुमिति सामग्रीकी अनुमित्सा सहकारिणी न होवे तो पुरुषविषयक
प्रत्यक्ष ज्ञानही होता है; अनुमिति नहीं होती. इसलिये अनुमित्साविरहविशिष्ट अनुमि-
तिसामग्रीके प्रति ( समानविषयक ) तुल्यविषयणी अर्थात् यद्विषयक अनुमितिसा-
मग्री है तद्विषयक प्रत्यक्षसामग्री ( कामिनी ) सुन्दरस्त्रीकी जिज्ञासाकी तरह स्वभा-
विक प्रतिबन्धक है अर्थात् जैसे आसक्त वियोगी पुरुषको सुन्दरस्त्रीके मिलापकी
इच्छा कार्यमात्रमें प्रतिबन्धक है क्योंकि वियोगीका किसी कार्यमें मन नहीं लगता;