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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 350 में से

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पृष्ठ 178

१५४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
ततः सिषाधयिषा तत्र पक्षतासम्पत्तये सिषाधयिषाविरहविशिष्ट-
त्वविशेषणस्यावश्यकत्वात् ।
समाधान-जिस आत्मामें "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक
प्रत्यक्षात्मक अथवा स्मरणात्मक ज्ञान हुआ हो और उसके पीछे द्वितीयक्षणमें
“पर्वते वह्न्यनुमितिर्मे जायताम् ” इत्याकारक इच्छा उत्पन्न होय तो ऐसे
स्थलमें पक्षतासम्पत्तिके लिये सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्व सिद्धिमें विशेषण
देना आवश्यक है. भाव यह कि-ऐसे स्थलमें सिषाधयिषाके पूर्वक्षणमें होने-
वाला ज्ञान सिद्धिविशिष्टपरामर्शात्मक है. द्वितीयक्षणमें सिषाधयिषारूप उत्ते-
जकके होनेसे यही ज्ञान परामर्शत्वेन अनुमितिका कारण हो जाता है और
सिषाधयिषाके न होनेसे यही ज्ञान सिद्धिरूपेण प्रतिबन्धक होय जाताहै एवं
यदि सिद्धिमें सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्वरूप विशेषण न दिया जाय तो ऐसे स्थलमें
पक्षताभी न बनसके; क्योंकि यहां केवल सद्द्यभाव तो नहीं है किंतु सिद्ध्यत्मक
परामर्शही बैठा है और जब विशेषण देते हैं तो पक्षता बनसकती है; क्योंकि यहां
यद्यपि केवल सिद्ध्यभाव नहीं है तथापि सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो सिद्धि उसका
अभाव यहांपर है, इसलिये पक्षता निर्बाध है.
अत्रेदं बोध्यम् । यादृशयादृशसिषाधयिषासत्त्वे सिद्धिसत्त्वे यल्लि-
ङ्गकानुमितिस्तादृशतादृशसिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्ध्यभाव-
स्तल्लिङ्गकानुमितौ पक्षता । तेन सिद्धिपरामर्शसत्त्वेऽपि यत्किं-
चिज्ज्ञानं जायतामितीच्छायामपि नानुमितिः ।
भाषा-यहां यहभी जानना उचित है कि-जैसी २ सिषाधयिषाके सत्त्वकालमें
तथा सिद्धिके सत्त्वकालमें यद्धेतुक अनुमिति होती है वैसी २ सिषाधयिषाविर-
हविशिष्ट सिद्धिका अभाव उसी प्रकृत हेतुक अनुमितिमें पक्षता है. (तेन) एवं "वह्नि-
व्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक सिद्ध्यात्मक परामर्शसत्त्वकालमेंभी
"यत्किञ्चित् ज्ञानं मे जायताम्” इत्याकारक इच्छाके होनेसे अनुमितिकी आपत्ति
नहीं है; क्योंकि इस इच्छाको यत्किञ्चित् ज्ञान विषयक होनेसे प्रकृतानुमिति साम-
ग्रीमें उत्तेजकता नहीं है.
वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमानितिप्रत्यक्षसत्त्वे प्रत्यक्षादि
भिन्नं वह्निज्ञानं जायतामितीच्छायां तु भवत्येव । एवं धूमपरा-
मर्शसत्त्वे आलोकेन वह्निमनुमिनुयामितीच्छायामपि नानुमितिः।