न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाध्याभावसाधक एव हेतुः साध्यसाधकत्वेनोपन्यस्त इत्यश-
क्तिविशेषोपस्थापकत्वाच्च विशेषः । २ ।
भाषा-दूसरा इन दोनोंका परस्पर यह भेद है कि-अपनी अनुमानरचनामें
जिस पण्डितने विरुद्धहेतुका प्रयोग किया है वही हेतु उस पण्डितकी अशक्तिका
सूचकभी है अर्थात् साध्याभावके सिद्ध करनेवाला हेतु साध्यसिद्धिके लिये सभामें
जो पण्डित बोले उसकी अनभिज्ञताको दूसरे विज्ञलोग उसीवक्त जान लेतेहैं परन्तु
सत्प्रतिपक्ष स्थलमें यह बात नहीं है इससे दोनोंका परस्पर भेद है २ ।
सत्प्रतिपक्षः साध्याभावव्याप्यवान् पक्षः । अगृहीताप्रामाण्यक-
साध्यव्याप्यवत्त्वेनोपस्थितिकालिनागृहीताप्रामाण्यकसाध्याभा
वव्याप्यवत्त्वेनोपस्थितिविषयस्तथेत्यन्ये । अत्र च परस्परभा-
वव्याप्यवत्ताज्ञानात् परस्परानुमितिप्रतिबन्धः फलम् ।
भाषा-“साध्याभावस्य व्याप्यः साध्याभावव्याप्यः, स यस्मिन् वर्तते स साध्या-
भावव्याप्यवान् पक्षः” अर्थात् साध्याभावके साथ व्याप्तिविशिष्ट जो हेतु तादृश
हेतुमान् पक्षमें सत्प्रतिपक्ष व्यवहार हो सकताहै. उदाहरणस्थल इसके “हदो वह्नि-
मान् धूमात्, हदो वह्न्यभाववान् जलात् ” इत्यादि अनेक होसकतेहैं यहां दोनों
हेतुओंको परस्पर विरोधि होनेसे दोनोंहीमें सत्प्रतिपक्षव्यवहार होताहै इसी सत्प्रति-
पक्षका लक्षण कईएक ऐसा कहते हैं कि-साध्यव्याप्यवत्त्वेन उपस्थितिकालमें जिस
हेतुमें अप्रमाणता गृहीत नहीं हुई उसी कालमें उसी स्थलमें उसी हेतुमें यदि
साध्याभाव व्याप्यत्वेन उपस्थितिभी किसीतरहसे अप्रमाणिका न होवे तो वह हेतु
सत्प्रतिपक्ष होताहै;परन्तु यह वार्ता किसीभी हेतुमें प्रतिहेतु विना दुर्घट है इसलिये
सत्प्रतिपक्षस्थलमें परस्पर साध्याभावव्याप्यवत्ता ज्ञानसे उभय हेतुसे परस्पर अनु-
मितिका प्रतिबन्ध होनाही फल समझना चाहिये.
अत्र केचित् । यथा घटाभावव्याप्यवत्ताज्ञाने विद्यमानेऽपि
घटचक्षुःसंयोगे सति घटवत्ताज्ञानं जायते ।
भाषा-रत्नकोशकार नैयायिक सत्प्रतिपक्षको अनुमितिका प्रतिबन्धक नहीं
मानता, किन्तु सन्देहउत्पादनद्वारा इसमें दूषकता मानता है. इसको स्वसिद्धान्तसे
विरुद्ध जानकर खण्डनार्थ 'अत्र केचित् ' इत्यादि ग्रन्थका ग्रन्थकार उपन्यास
करतेहैं-रत्नकोशकार यह कहताहै कि-ज्ञानोंका परस्पर प्रतिबध्य प्रतिबन्धकभाव
अनुभवानुरोधसे जैसा जहां हो वैसाही मानना उचित है; जैसे यदि कहीं शै