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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 350 में से

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पृष्ठ 184

१६० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
एवं दोषवत्ता हेतुमें एकज्ञानविषयत्व सम्बन्धसे सर्वत्र रहती है. एवं 'यद्विषयकत्वेन
ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं' यह लक्षण उनके मतमें दोषका है तादृश दोषवालेमें एक
ज्ञानविषयत्वसम्बन्धसे हेत्वाभासत्वव्यवहार होताहै. सत्प्रतिपक्षादि स्थलोंमें विरो-
धिव्याप्त्यादिकोंकाही दोषरूपेण ग्रहण कियाजाताहै; तादृश दोषवत्ता हेतुमें "अयं
विरुद्धव्याप्तिविशिष्टो हेतुः" इत्याकारक एकज्ञानविषयत्व सम्बन्धसे जाननी चाहिये
न चैवं वह्निमान् धूमादित्यादौ पक्षे बाधभ्रमस्य साध्याभाववि-
षयकत्वेनानुमितिविरोधित्वात् ज्ञानरूपसम्बन्धेन तद्वत्त्वस्यापि
सत्त्वात् सद्धेतोरपि बाधितत्वापत्तिरिति वाच्यम् । तत्र ज्ञानस्य
सम्बन्धत्वाकल्पनात् ।
शंका-इस रीतिसे सत्प्रतिपक्षको अनित्य दोष माननेवालेके मतमें बाधभी
अनित्य दोष होना चाहिये; क्योंकि "वह्निमान् धूमात्" इत्यादि सद्धेतुस्थलमें पक्षमें
साध्याभावके न होनेसे यद्यपि बाध नहीं है तथापि "पर्वतो वह्न्यभाववान्" इत्याकारक
बाधका भ्रम हो सकताहै; वह भ्रमज्ञानही साध्याभाव विषयकत्वेन "पर्वतो वह्निमान्"
इत्याकारक अनुमितिका विरोधीभी होसकताहै और "वह्न्यभाववान् पर्वतो धूमश्च"
इत्याकारक भ्रमात्मक एक ज्ञान विषयत्वसम्बन्धसे धूमरूप हेतुकोभी दोषवत्ता हो
सकतीहै. एवं धूमादि सद्धेतुओंकोभी बाधित होना चाहिये. समाधान-सत्प्रतिपक्ष-
को अनित्य दोष माननेवाले इसका समाधान यह कहतेहैं कि-( तत्र ) बाधकालीन
धूमादि सद्धेतुओंमें हम एकज्ञानविषयत्वरूप सम्बन्धकी कल्पना नहीं करसकते;
क्योंकि सद्धेतुमें "अयं हेतुर्बाधितः" यह व्यवहार नहीं होता.
अत्र सत्प्रतिपक्षित इति व्यवहारेण तत्कल्पनात् । अत्र च बा-
धित इति व्यवहाराभावादित्याहुः ।
भाषा-और ( अत्र ) यहां प्रतिपरामर्शकालीन धूमादि सद्धेतुओंमें "अयं हेतुः
सत्प्रतिपक्षितः"इत्याकारक व्यवहार होनेसे पूर्वोक्त रीतिसे ज्ञानमें सम्बन्धत्वकीकल्पना
हो सकती है, यांते सत्प्रतिपक्षको अनित्य दोष माननेमें कुछ दोष नहीं-इत्याहुः ।
अनुमितिविरोधित्वं चानुमितितत्कारणान्यतरविरोधित्वम्, तेन
व्यभिचारिणि नाव्याप्तिः,दोषज्ञानं च यद्धेतुविषयकं तद्धेतुकानु-
मितौ प्रतिबन्धकम् ।
भाषा-लक्षणनिष्ठ अनुमितिविरोधित्व इस भागका अनुमिति तत्कारण अन्यतर
विरोधित्व अर्थ करना अर्थात् "यादृशविशिष्टविषयकत्वेन ज्ञानस्य अनुमितितत्कार-