न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
तथाहि। व्यभिचारादिविषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वा-
त्तेदोषाः । यद्विषयकत्वं च यादृशविशिष्टविषयकत्वं बोध्यम् ।
तेन बाधभ्रमस्यानुमितिविरोधित्वेऽपि न क्षतिः । तत्र पर्वतो
वह्न्यभाववानिति विशिष्टस्याप्रसिद्धत्वान्न हेतुदोषः ।
भाषा-'तथाहि' इस ग्रन्थसे लक्षणको स्वयं स्फुट करतेहैं कि-व्यभिचारादि
दोष विषयकत्वेन “अयं हेतुः व्यभिचारी” इत्यादि ज्ञानको व्यभिचारहेतुक यावत्
अनुमिति विरोधिता है इसलिये व्यभिचारादि दोष हैं. लक्षणघटित 'यद्विषयक'
पदका “यादृश विशिष्ट विषयक” विवरण जानना चाहिये. एवं “पर्वतो वह्निमान्”
इत्यादि सद्स्थलमें अतिव्याप्ति नहीं है क्योंकि यद्यपि वह्न्यभावप्रयुक्त पर्वतविषयक-
त्वेन “पर्वतो वह्न्यभाववान्” इत्याकारक ज्ञानको “पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक
सद्अनुमितिके प्रतिविरोधिता होसकतीहै इसलिये अतिव्याप्ति होनी चाहिये तथापि
'यादृशविशिष्ट' शब्दसे प्रकृतमें वह्न्यभावविशिष्ट पर्वतका ग्रहण है सो वह संसारमा-
त्रमें अप्रसिद्ध है इसलिये अतिव्याप्ति नहीं है. भाव यह कि-पक्षमें वास्तवसे
साध्याभाव होय तो बाध होताहै और यदि वास्तवसे साध्याभाव पक्षमें न रहे
किन्तु पक्षमें साध्याभावका भ्रम हो जावे तो उससे प्रकृत हेतु दुष्ट नहीं होय
सकताहै.
न च वह्न्यभावव्याप्यपाषाणमयत्ववान् पर्वत इति परामर्शकाले
वह्निव्याप्यधूमस्याभासत्वं न स्यात्, तत्र वह्न्यभावव्याप्यवान्
पक्ष इति विशिष्टस्याप्रसिद्धत्वादिति वाच्यम् । इष्टापत्तेः ।
शंका-जिस कालमें जिस स्थलमें सिद्धान्तीको “पर्वतो वह्निमान् धूमात्” इत्या-
कारक हेतुसे “वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वत:” इत्याकारक परामर्श हुआहै. उसकालमें
उसी स्थलमें वादीको “पर्वतो वह्न्यभाववान् पाषाणमयत्वात्” इत्याकारक हेतुसे
“वह्न्यभावव्याप्यपाषाणमयत्ववान् पर्वत:” इत्याकारक परामर्श होता है. यहां
द्वितीय परामर्शसे प्रथम परामर्श कुक्षिप्रविष्ट धूमरूप हेतु सत्प्रतिपक्षत्वेन हेत्वा-
भास गिना जाता है. अब आपके 'यादृशविशिष्टविषयक' कथनानुसार उसम
हेत्वाभासत्वव्यवहार करनेकी कुछ आवश्यकता नहीं है; क्योंकि उसमें आभास-
त्वका सम्पादक जो “वह्न्यभावव्याप्यपाषाणमयत्ववान् पर्वत:” इत्याकारक विरोधी
परामर्श है इसमें वह्न्यभावविशिष्ट पर्वतअंश अप्रसिद्ध है; अर्थात् पाषाणमयत्वरूप
हेतुमें वह्न्यभावनिरूपित व्याप्यता नहीं है. इसलिये पाषाणमयत्व हेतुसे धूमरूप