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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 350 में से

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पृष्ठ 186

१६२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
दोष " वायुः गन्धवान् स्नेहात् " इस एकही स्थलमें आसकतेहैं. यहां गन्धाभाववद्
जलमें वृत्ति होनेसे स्नेहरूप हेतु व्यभिचारी है १ । गन्धरूप साध्यवाली पृथिवीमें
नहीं रहता इसलिये स्नेहरूप हेतु विरुद्धभी है २ । स्नेहरूप हेतुके गन्धरूप साध्यके
अभावका साधक ' अपृथिवीत्व ' रूप विरोधिहेतु विद्यमान है; इसलिये यह हेतु
सत्प्रतिपक्षीभी है ३ । स्नेहरूप हेतु वायुका विशेषण नहीं होसकता तथा वायुरूप
पक्षमें नहीं रहता तथा ' पाकजगुणवत्त्व ' रूप उपाधिसे सोपाधिक है इसलिये
असिद्धभी है ४ । स्नेहरूप हेतुके गन्धरूप साध्यका पक्षमें अभाव है इसलिये यह
हेतु बाधितभी है ५ । इस रीति के संभवस्थल तात्पर्य्यसे आचार्य्यलोगोंने पांच हेत्वा-
भास लिखेहैं. ऐसेही साधारणादि तीनसे भिन्न संसारमात्रको छोड़कर साधारणादि
तीनहींमें ' अनैकान्तिकत्व ' रूप धर्म रहता है ॥ ७१ ॥
आद्यः साधारणस्तु स्यादसाधारणकोऽपरः ।
तथैवानुपसंहारी त्रिधाऽनैकान्तिको भवेत् ॥ ७२ ॥
भाषा-प्रथमका नाम साधारण है,द्वितीयका नाम असाधारण है और तृतीयका
नाम अनुपसंहारी है. इसरीतिसे अनैकान्तिक तीन प्रकारका है ॥ ७२ ॥
साधारणः साध्यवदन्यवृत्तिर्हेतुः,तेन च व्याप्तिग्रहप्रतिबन्धःक्रियते।१।
भाषा-साध्यवालेसे अन्यमें वर्तनेवाला हेतु साधारण कहाता है. ऐसा हेतु
व्याप्तिज्ञानका प्रतिबन्धक होता है अर्थात् साध्यवदन्यावृत्तित्वरूपा या साध्य-
सामानाधिकरणरूपा व्याप्ति साध्यवालेसे अन्यमें वर्तवाले व्यभिचारी हेतुसे नहीं
होसकती इस साधारण हेतुके उदाहरणस्थल " पर्वतो वह्निमान् प्रमेयत्वात् "
इत्यादि अनेक हैं १ ।
असाधारणः साध्यासमानाधिकरणो हेतुः, तेन साध्यसामानाधि-
करण्यग्रहः प्रतिबध्यते। तथा शब्दो नित्यः शब्दत्वादित्यादाव-
साधारण्यं शब्दोऽनित्यः शब्दत्वादित्यादौ त्वसाधारण्यभ्रमः ।
अन्ये तु सपक्षावृत्तिरसाधारणः । सपक्षश्च निश्चितसाध्यवान् ।
इत्थं च शब्दोऽनित्यः शब्दात्वादित्यादौ पक्षे यदा पक्षे साध्य-
निश्चयस्तदा नासाधारण्यं तत्र हेतुनिश्चयादिति वदन्ति ।२।
भाषा-साध्यके साथ एकाधिकरणमें जो कहीं न रहे वह हेतु असाधारण होता
है. ऐसा हेतु केवल साध्यसामानाधिकरण्यरूप व्याप्तिज्ञानका प्रतिबन्धक होता है.