सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 175

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५१
भाषा-पीछे "व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्वधीः परामर्श उच्यते" इस परामर्शके लक्ष-
णमें 'पक्षवृत्तित्व' यह कहा उसमें पक्षत्व क्या है इसी वार्ताको 'सिषाधयिषा'
इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कहते हैं-
सिषाधयिषया शून्या सिद्धिर्यत्र न विद्यते ॥
स पक्षस्तत्र वृत्तित्वज्ञानादनुमितिर्भवेत् ॥ ७० ॥
भाषा-साध्यके सिद्ध करनेकी इच्छाका नाम 'सिषाधयिषा' है. उस सिषाधयि-
षासे शून्य जो सिद्धि अर्थात् सिषाधयिषाविरहविशिष्ट प्रत्यक्षात्मक ज्ञान जहां नहीं
है वह 'पक्ष' है; उसमें हेतुकी वृत्तिताके ज्ञानसे अनुमिति होतीहै ॥ ७० ॥
सिषाधयिषाविरहविशिष्टायाः सिद्धेरभावः पक्षता, तद्वान् पक्ष
इत्यर्थः । सिषाधयिषामात्रं न पक्षता, विनापि सिषाधयिषां घन-
गर्जितेन मेघानुमानात् । अत एव साध्यसंदेहोऽपि न पक्षता,
विनापि संदेहं तदनुमानात् ।
भाषा-सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो सिद्धि, उस सिद्धिका अभाव 'पक्षता' है; उस
पक्षतारूप धर्मवालेका नाम 'पक्ष' है "गगनं मेघवत् गर्जनात्" इत्यादि स्थलोंमें सिषा-
धयिषासे विनाभी पुरुषोंको अनुमिति होतीहै. इसलिये साध्य सिद्ध करनेकी
इच्छा मात्रका नाम 'पक्षता' नहीं कह सकते. इसीलिये "साध्यसन्देहः पक्षता" इत्या-
कारक प्राचीनोंका लक्षणभी सम्यक् नहीं है, क्योंकि विनापि मेघरूप साध्यके सन्दे-
हसे गर्जनेसे गगनाधिकरणमें मेघकी अनुमिति होतीहै.
सिद्धौ सत्यामपि सिषाधयिषासत्त्वेऽनुमितिर्भवत्येव, अतः सिषा-
धयिषाविरहविशिष्टत्वं सिद्धौ विशेषणम् ।
भाषा-'सिद्धि' नाम इन्द्रियसन्निकर्षजन्य ज्ञानका है. उसके प्राप्त होतेपि अर्थात्
पर्वतादि पक्षोंमें 'पर्वतो वह्निमान्' इत्याकारक चाक्षुष ज्ञान हुएभी 'पर्वतो वह्निमान् विषय-
यकानुमितिर्मे स्यात्' इत्याकारक इच्छा होनेसे अनुमिति होतीहै. इसलिये 'सिषा-
धयिषाविरहविशिष्टत्व' सिद्धिमें विशेषण दिया है. भाव यह कि-यद्यपि प्रत्यक्षात्मक
ज्ञान अनुमितिज्ञानका प्रतिबन्धक है, इसलिये सिद्धि होत संते अनुमितिज्ञानका
होना सम्भव नहीं तथापि सिषाधयिषाको विद्वानोंने उत्तेजक माना है. प्रतिबन्धक
होतेभी सामग्रीकी सहकारतासे कार्यजनकका नाम 'उत्तेजक' है. एवं सिषाधयिषारूप
उत्तेजकके बलसे सिद्धिरूप प्रतिबन्धकके सत्त्वकालमेंभी अनुमितिरूप कार्य होताहै