न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५३
क्रमेणभवन्ति तत्रसिषाधयिषाकाले सिद्धेर्नाशात् प्रतिबन्धकाभा-
वादेवानुमितिः, यत्र सिषाधयिषासिद्धिपरामर्शाः सन्ति तत्र पराम-
र्शकाले सिषाधयिषैव नास्ति, एवमन्यत्रापि सिद्धिकाले परामर्शका-
ले वा न सिषाधयिषा, योग्यविभुविशेषगुणानां यौगपद्यनिषेधात्,
तत् कथं सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्वं सिद्धेर्विशेषणमिति चेत्। न
शंका—सिद्धिमें सिषाधयिषाविरहविशिष्टता आपको एक कालावच्छेदेन एकात्मवृ-
त्तित्व सम्बन्धसे विवक्षित है परन्तु परामर्शरूप कारणके सत्त्वकालमें और सिद्धिरूप विरो-
धिके सत्त्वकालमें यदि सिषाधयिषाका होना सम्भव होय तो सिषाधयिषाको उत्तेजकता
और तद्विरहविशिष्ट सिद्धिको प्रतिबन्धकता आप कहसकें सो विचारसे यह वार्त्ता बन
नहीं सकती; क्योंकि जिस पुरुषको प्रथम क्षणमें परामर्शात्मक ज्ञान हुआ है उसके
पीछे द्वितीय क्षणमें सिद्धात्मक ज्ञान हुआ और तृतीय क्षणमें सिषाधयिषा हुई तो
सिषाधयिषाकालमें अनुमिति कारणीभूत परामर्शात्मक ज्ञानका क्षणिकत्वेन नाश होनेसे
अनुमिति नहीं होगी १। और जिस आत्मामें प्रथम क्षणमें सिद्धात्मक ज्ञान हुआ है,
द्वितीयक्षणमें परामर्शात्मक ज्ञान हुआ है और तृतीय क्षणमें सिषाधयिषा हुई है वहां
सिषाधयिषाकालमें सिद्धात्मक ज्ञान क्षणिक होनेसे नाश होचुका है, इसलिये प्रति-
बन्धकके अभावसेही अनुमितिज्ञान निर्बाध होगा २। और जिस आत्मामें प्रथमक्षणमें
सिषाधयिषा हुई, द्वितीय क्षणमें सिद्धात्मक ज्ञान हुआ, तृतीयक्षणमें परामर्श हुआ
वहाँ परामर्शकालमें सिषाधयिषाही क्षणिक होनेसे नाश होचुकी है; सिषाधयिषाके
न होनेसे अनुमितिज्ञान नहीं होगा ३। (एवमन्यत्रापि) ऐसे और स्थलोंमेंभी जहां
प्रथमक्षणमें परामर्शात्मक ज्ञान हुआ है द्वितीयक्षणमें सिषाधयिषा हुई है तृतीयक्षणमें
सिद्धात्मक ज्ञान हुआ है वहां अनुमितिकारणीभूत परामर्शात्मक ज्ञान नहीं है इसलिये
अनुमिति न होगी ४। एवं जहां प्रथमक्षणमें सिद्धिहै द्वितीयक्षणमें सिषाधयिषा है तृतीय
क्षणमें परामर्श है वहां तृतीयक्षणमें प्रतिबन्धकके अभावसेही अनुमिति होसकती है ५।
एवं जिस आत्मामें प्रथमक्षणमें सिषाधयिषा हुई है, द्वितीयक्षणमें परामर्श
हुआ है, तृतीय क्षणमें सिद्धात्मकज्ञान हुआ है वहां सिद्धिकालमें सिषाधयिषा
ज्ञान नहीं है इसलिये अनुमिति नहीं होगी ६। एवं प्रत्यक्षके योग्य विभुके
विशेषगुणोंको एककालावच्छेदेन अनुत्पन्न होनेसे सिद्धिकालमें अथवा परामर्शकालमें
सिषाधयिषाका होना सम्भव नहींहै इसलिये सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्व सिद्धिमें विशे-
षण देना व्यर्थ है किन्तु "सिद्धयभावः पक्षता" इतना मात्र कहनेसे निर्वाह होसकताहै.
यत्र वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमानिति प्रत्यक्षं स्मरणं वा,
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