न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
इससे यह सिद्धान्त हुआ कि-सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो केवल सिद्धि वह अनुमि-
तिक प्रति प्रतिबन्धक है. उसीका अभाव जहां तहां पक्षता है. प्रकृतमें जहां सिद्धि
और सिषाधयिषा दोनों हैं वहांभी सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो देशान्तरीय काला-
न्तरीय सिद्धि उसका अभाव वहां विद्यमान है. इसलिये पक्षताकी क्षति नहीं है.
ऐसे स्थलमें विशेषाणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव जानना चाहिये; क्योंकि 'सिषाधयि-
पाविरह' विशेषण है और 'सिद्धि' विशेष्य है. जहां सिषाधयिषाका विरह नहीं किन्तु
सिषाधयिषा विद्यमान है वहां सिषाधयिषाविरहरूप विशेषणके न होनेसे तद्विशिष्ट
सिद्धिका अभावभी कहसकतेंहैं याते सिद्धि सिषाधयिषाउभय सत्त्वस्थलमें पक्षतानिर्दोषहै.
तथाच यत्र सिद्धिर्नास्ति तत्र सिषाधयिषायां सत्यामसत्यामपि
पक्षता । यत्र च सिषाधयिषाऽस्ति तत्र सिद्धौ सत्यामसत्यामपि
पक्षता । यत्र च सिद्धिरस्ति सिषाधयिषा च नास्ति तत्र न
पक्षता, सिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्धेः सत्त्वात् ।
भाषा-( तथाच ) एवं जिस स्थलमें ( सिद्धि ) प्रत्यक्षज्ञान नहीं है वहां सिषा-
धयिषा होय तो उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव जानना चाहिये अर्थात् सिषाधयि-
पाके होनेसे सिषाधयिषाविरहरूप विशेषणभी नहीं है और सिद्धिके न होनेसे सिद्धि-
रूप विशेष्यभी नहीं है. इसलिये विशेषणविशेष्य उभयके अभावसे विशिष्टका अभाव
कहना उचित है. ऐसे स्थलमेंभी पक्षता निर्दोष है. एवं जहां सिद्धि सिषाधयिषा-
दोनों नहीं हैं वहां विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव जानना चाहिये अर्थात् सिषाधयि-
पाके न होनेसे सिषाधयिषाविरहरूप विशेषण तो है परन्तु सिद्धिरूप विशेष्यके न
होनेसे विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव कह सकतेंहैं; ऐस स्थलमेंभी पक्षता निर्दोष
है. एवं जहां सिषाधयिषा विद्यमान है वहां सिद्धि होय तो पूर्ववत् विशेषाणाभावप्रयुक्त
विशिष्ट[भावप्रयुक्त प]क्षता जाननी चाहिये और सिद्धि न होय तौ पूर्ववत् उभयाभावप्रयुक्त
विशिष्टाभाव [अवच्छेदक] जाननी चाहिये; परन्तु जिस स्थलमें केवल ( सिद्धि ) प्रत्यक्षा-
त्मक ज्ञान [तो] है, किन्तु अनुमित्सारूप उत्तेजक नहीं है, वहां पक्षता नहीं है क्योंकि
सिषाधयिषाविरहविशिष्ट ( सिद्धेः ) प्रत्यक्षात्मक ज्ञानको वहां अनुमिति तत्सामग्रीके
प्रति प्रतिबन्धकता है इसीसे यह सिद्ध हुआ कि अनुमित्साविरहविशिष्ट ( सिद्धिः )
प्रत्यक्षात्मक ज्ञान अनुमितिज्ञानका सर्वथा प्रतिबन्धक है. ऐसे स्थल में पक्षता नहीं है.
ननु यत्र परामर्शानन्तरं सिद्धिस्ततः सिषाधयिषा, तत्र सिषाधयि-
पाकाले परामर्शनाशान्नानुमितिः, यत्र सिद्धिपरामर्शसिषाधयिषाः