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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 350 में से

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पृष्ठ 181

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५७
वैसेही अनुमित्साविरहविशिष्ट प्रत्यक्षज्ञानकी सामग्रीभी समानविषयक अनुमिति
सामग्रीके प्रति स्वाभाविक प्रतिबन्धक जाननी चाहिये.
एवं परामर्शानन्तरं विनापि प्रत्यक्षेच्छां पक्षादिप्रत्यक्षानुत्पत्तेः
प्रत्यक्षेच्छाविरहविशिष्टानुमितिसामग्री भिन्नविषयकप्रत्यक्षे प्र-
तिबन्धिकेति ॥ ७० ॥
भाषा-एवं "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतः" इत्यादि परामर्शानन्तरं यदि
"पक्षादिविषयकं प्रत्यक्षं मे जायताम्" इत्याकारक प्रत्यक्ष इच्छा उत्तेजक न होय तो
पक्षादि विषयक प्रत्यक्ष नहीं होता किंतु "पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक समुदित अ-
नुमितिज्ञानही होता है इसलिये अनुमितिके विषयसे भिन्नविषयक प्रत्यक्षत्वावच्छिन्नके
प्रति प्रत्यक्ष इच्छाविरहविशिष्ट अनुमितिसामग्रीभी प्रतिबन्धक माननी उचित
है-इति ॥ ७० ॥
प्रसङ्गसङ्गत्त्या हेत्वाभासान् विभजते , अनैकान्त इत्यादि-
भाषा-वादिविजयरूप एककार्यकारित्वरूप प्रसंगसंगतिसे मूलकार "अनै-
कान्तः" इत्यादिग्रंथसे हेत्वाभासोंका विभाग करतेहैं-
अनैकान्तो विरुद्धश्चाप्यसिद्धः प्रतिपक्षितः॥
कालात्ययापदिष्टश्च हेत्वाभासास्तु पञ्चधा ॥७१॥
भाषा-अनैकान्त विरुद्ध, असिद्ध, सत्प्रतिपक्ष, कालात्ययापदिष्ट यह पांच हेत्वा-
भास बोलेजाते हैं ॥ ७१ ॥
तल्लक्षणं तु यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्त्वम् ।
भाषा-हेत्वाभासका लक्षण तो 'यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्त्वं'
इतना मात्र है असद्हेतु मात्र इस लक्षणका लक्ष्य है; ( यद्विषयकत्वेन ) व्यभिचा-
रादिविषयकत्वेन ( ज्ञानस्य) 'पर्वतो वह्निमान् प्रमेयत्वात् इत्यादौ अयं हेतुर्व्यभिचारी'
इत्यादि ज्ञानस्य "पर्वतो वह्निमान्" इत्यादि अनुमिति विरोधित्व है वही हेत्वाभा-
समें हेत्वाभासत्व है अर्थात् जिन 'प्रमेयत्वादि' हेतुओंमें व्यभिचारादि दोषोंका
निश्चय होजाता है उनसे "पर्वतो वह्निमान्" इत्यादि अनुमिति ज्ञानोंकी उत्पत्ति
नहीं होती. एवं "ह्रदो वह्निमान् धूमात्" इत्यादि बाधित स्थलमें वह्न्यभाव
प्रयुक्त ह्रदादिं विषयकत्वेन "ह्रदो वह्न्यभाववान्" इत्याकारक ज्ञानको "ह्रदो
वह्निमान्" इत्यादि अनुमिति प्रतिबन्धकत्व है; वही उसमें बाधितत्वरूप
हेत्वाभासत्व है.