न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
योग्यधिकरणमें रहनेवाला नहीं होना चाहिये. यदि ऐसा कहो तो यद्यपि 'वृक्षः क-
पिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्' इस स्थलमें तो दोष नहीं; क्योंकि संयोगमात्रका
यह स्वभाव है कि-यह वस्तुके किञ्चिदवयवावच्छेदेन उत्पन्न होताहै. इसलिये दर्शन-
कारोंने इसको 'अव्याप्यवृत्ति' माना है. जिस वस्तुकी एकही कालमें स्वाधिकर-
णमें भावाभाव उभयावगाहनी प्रतीति होजावे वह वस्तु नियमसे अव्याप्यवृत्ति होती
है; प्रकृतमें ऐसा संयोग है. एवं कपिसंयोगभी अव्याप्यवृत्ति होनेसे हेत्वधिकरणवृ-
त्त्यभावका प्रतियोगि नहीं होसकता, किन्तु घटाद्यभावही लक्षणघटक होगा. अभा-
वीय प्रतियोगिताके अवच्छेदक घटत्व पटत्वादि धर्म होंगे; अनवच्छेदक साध्यताव-
च्छेदक कपिसंयोगत्वरूप धर्म होगा. एवं पूर्वोक्तस्थलमें तो इसरीतिसे दोष नहीं;
परन्तु तथापि 'प्रतियोगिव्यधिकरण' इस अंशका 'प्रतियोग्यधिकरणवृत्तित्व' ऐसा
अर्थ करनेसे "घटः संयोगवान् सत्त्वात्" इस स्थलमें अतिव्याप्तिरूप दोष होगा;
क्योंकि यहां व्यभिचारस्थल हेत्वधिकरण गुणकर्म हैं. उनमें यद्यपि संयोगरूप-
साध्यका अभावभी पासकतेहैं तथापि संयोगरूप साध्यका अभाव पूर्वोक्त रीतिसे
लक्षणघटक नहीं होसकता; क्योंकि संयोगरूप साध्यका अभाव पूर्वोक्तरीतिसे
स्वप्रतियोग्यधिकरणावृत्ति नहीं है किन्तु अव्याप्यवृत्ति होनेसे स्वप्रतियोग्यधिकरण
वृत्तिही है; इसलिये यह अभाव लक्षणघटक नहीं होसकता. एवं यहांभी हेत्वधिक-
रणवृत्ति घटाद्यभाव लेनेसे अभावीय प्रतियोगितावच्छेदक घटत्वादि धर्म होंगे अन-
वच्छेदक साध्यतावच्छेदक संयोगत्वरूप धर्म होगा. एवं अलक्ष्यस्थलमें लक्षण
संगत होनेसे अतिव्याप्ति हुई.
हेत्वधिकरणे प्रतियोग्यनधिकरणवृत्तित्वविशिष्टस्य विवक्षित-
त्वात्। स्वप्रतियोग्यनधिकरणीभूतहेत्वधिकरणवृत्त्यभाव इति
निष्कर्षः। १०।
समाधान-हेत्वधिकरणवृत्त्यभावके विशेषणीभूत 'प्रतियोगिव्यधिकरण'
अंशका अर्थ हम पूर्वोक्त रीतिसे नहीं करते; किन्तु 'प्रतियोगिव्यधिकरण' कथनसे
प्रतियोग्यनधिकरणवृत्तित्व विशिष्ट अभावकी हेत्वधिकरणमें विवक्षा करते हैं अर्थात्
इसका भाव यह है कि-हेत्वधिकरण वृत्त्यभाव अपने प्रतियोगिके अनधिकरणीभूत
हेत्वधिकरणमें वर्तनेवाला होना चाहिये. ऐसा अर्थ करनेसे पूर्वोक्त उभयस्थलमें
दोष नहीं क्योंकि “वृक्षः कपिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्” यहां अपने प्रतियोगिका
अनधिकरणीभूत हेत्वधिकरण वृत्त्यभाव कपिसंयोगाभाव तो होही नहीं सकता. यद्यपि
कपिसंयोगाभावभी मूलावच्छेदेन वृक्षमें रहताहै तथापि वह अभाव अपने प्रतियोगिके
१४० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
अनधिकरणीभूत हेत्वधिकरणमें नहीं है किन्तु अपने प्रतियोगीके अधिकरणीभूत हे-
त्वधिकरणहीमें रहताहै. इसलिये कपिसंयोगाभावको लक्षणघटक न होनेसे घटाद्यभा-
व लेकर लक्षण संगत करनेसे अव्याप्तिरूप दोष नहीं है. एवं " घटः संयोगवान्
सत्त्वात् " इस स्थलमें सत्तारूप हेत्वधिकरण गुणकर्ममें संयोगरूप साध्यका अभाव
अपने प्रतियोगीके अनाधिकरणीभूत हेत्वधिकरणमें रहता है; इसलिये लक्षणघटक है.
एवं तादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदकही साध्यतावच्छेदक संयोगत्वरूप धर्म होगा.
अनवच्छेदक न होनेसे लक्षण संगत नहीं है याते अतिव्याप्तिरूप दोषभी नहीं है.
एवं लक्षणस्वरूप ऐसा हुआ कि (स्वप्रतियोग्यनधिकरणीभूत) जो (हेतुतावच्छेदकसम्ब-
न्धावच्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छिन्नहेत्वधिकरण) तादृशहेत्वधिकरण(वृत्ति) जो अभाव तादृ-
श (अभावीयप्रतियोगितानवच्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामाना-
धिकरण्यं व्याप्तिः ) १० ।
प्रतियोग्यनधिकरणं प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नानधिकरणं
बोध्यम्। तेन विशिष्टसत्तावान् जातेरित्यादौ जात्याधिकरणगुणा-
देर्विशिष्टसत्ताभावप्रतियोगिसत्ताधिकरणत्वेऽपि न क्षतिः । ११।
भाषा-इस लक्षणमें प्रतियोग्यनधिकरणीभूत हेत्वधिकरण प्रतियोगितावच्छेदका-
वच्छिन्नका अनधिकरण जानना, अन्यथा "घटो विशिष्टसत्तावान् जातेः" इस स्थलमें
अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां जातिरूप हेतुका व्यभिचारस्थल गुणकर्म हैं. उस
हेत्वधिकरण गुणकर्ममें विशिष्टसत्ताभाव तो पा नहीं सकते; क्योंकि " विशिष्टवस्तु
शुद्धवस्तुसे अतिरिक्त नहीं होती " इस न्यायसे विशिष्टसत्ताभावका प्रतियोगी शुद्ध
सत्ताभी होसकती है. उस शुद्धसत्ताका अभाव हेत्वधिकरण गुणकर्मोंमें नहीं है; एवं
साध्याभावको लक्षणघटक न होनेसे घटाभाव लेकर लक्षण संगत करनेसे अतिव्याप्ति
होगी.परन्तु यदि प्रतियोगीका अनधिकरण हेत्वधिकरण प्रतियोगितावच्छेदक धर्माव-
च्छिन्नका अनधिकरण कहतेहैं तो हेत्वधिकरण गुणकर्ममेंविशिष्टसत्तात्वेन विशिष्टसत्ताका
अभाव पासक्तेहैं. उस अभावका प्रतियोगी विशिष्टसत्ता होगी.प्रतियोगितावच्छेदक धर्म
विशिष्टसत्तात्व होगा.अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदकधर्मके न होनेसे अतिव्याप्तिरूप दोष
नहीं है. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि-( प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न प्रति-
योग्यनधिकरणीभूत ) जो ( हेतुतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छिन्नहे-
त्वधिकरण )तादृश हेत्वधिकरण(वृत्ति)जो अभाव ( तादृशाभावीयप्रतियोगितानवच्छे-
दकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यं व्याप्तिः) । ११।
एवं साध्यतावच्छेदकसम्बन्धेन प्रतियोग्यनधिकरणत्वं बोध्यम्।
परिच्छेदः२ ] भाषाटीकासमेता १४१
तेन ज्ञानवान् द्रव्यत्वादित्यादौ द्रव्यत्वाधिकरणघटादेर्विषय-
तासम्बन्धेन ज्ञानाधिकरणत्वेऽपि न क्षतिः । १२ ।
भाषा-एवं हेत्वधिकरणमें प्रतियोग्यनधिकरणताभी साध्यतावच्छेदकसम्बन्धसे
विवक्षित है. अन्यथा "आत्मा ज्ञानवान् द्रव्यत्वात्" इस समवायेन साध्यहेतुक
स्थलमें अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां द्रव्यत्वरूप हेतुका व्यभिचारस्थल घटादिक
हैं. उन हेत्वधिकरणघटादिकोंमें ज्ञानरूप साध्यका अभाव तो नहीं पा
सकते; क्योंकि ज्ञानरूप साध्य विषयतासम्बन्धसे यावत् घटपटादि
विषयोंमें विद्यमान है; किंतु उदासीन घटादिका अभाव लक्षणघटक
हो सकता है. एवं अभावीय प्रतियोगिताके अवच्छेदक घटत्वादि धर्म
होंगे. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक ज्ञानत्व धर्म होगा. तदवच्छिन्न साध्यके
साथ द्रव्यत्वरूप हेतुका सामानाधिकरण्यरूप व्याप्तिका लक्षण संगत होनेसे अति-
व्याप्तिरूप दोष हुआ परन्तु यदि साध्यतावच्छेदक सम्बन्धसे प्रतियोग्यनधिकरणी-
भूत हेत्वधिकरण कहें तो यहां साध्यतावच्छेदक सम्बन्धसमवाय है. समवायसम्ब-
न्धसे ज्ञानाधिकरण आत्माही है; घटादिक नहीं. एवं द्रव्यत्वरूप हेत्वधिकरण
घटादिकोंमें समवायसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक ज्ञानरूप साध्याभावभी लक्षण
घटक हो सकताहै. तादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदकही ज्ञानस्वरूप साध्यतावच्छे-
दक धर्म होगा. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक न होनेसे अतिव्याप्तिरूप दोष
नहीं है १२ ।
इत्थं च वह्निमान् धूमादित्यादौ धूमाधिकरणे समवायेन वह्नि-
विरहसत्त्वेऽपि न क्षतिः । १३ ।
भाषा-एवं प्रतियोग्यनधिकरणमें साध्यतावच्छेदक सम्बन्धका निवेश करनेसे
"पर्वतो वह्निमान् धूमात्" इस स्थलमें अव्याप्तिरूप दोषभी नहीं है. अन्यथा
हेत्वधिकरण पर्वतमें समवायसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताकवह्निरूप साध्यका अभाव
ही पासकते हैं. तादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदक वह्नित्वधर्म होगा. अनवच्छेदक
साध्यतावच्छेदकके न होनेसे लक्षण संगत नहीं है. एवं अव्याप्ति दोष हुआ; परन्तु
यदि प्रतियोग्यनधिकरणमें साध्यतावच्छेदक सम्बन्धकी विवक्षा करतेहैं तो साध्य-
तावच्छेदक संयोगसम्बन्धसे हेत्वधिकरण पर्वतादिमें वह्निरूप साध्यका अभाव नहीं
पासकते क्योंकि वह्नि वहां संयोगेन रहता है. किन्तु घटाद्यभाव लक्षणघटक होगा.
अभावीयप्रतियोगितावच्छेदक घटत्वादि धर्म होंगे. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक
वह्नित्वधर्म होगा. एवं लक्षण संगत होनेसे अव्याप्तिरूप दोष नहीं है. एवं लक्षणका
१४२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
स्वरूप ऐसा हुआ कि-(साध्यतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्न) या प्रतियोगिता तादृश
( प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोग्यनधिकरणं ) यत् ( हेतुतावच्छेदकसम्बन्धाव-
च्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छिन्न ) हेत्वधिकरणं तादृश ( हेत्वधिकरणवृत्त्यभावयि
प्रतियोगितानवच्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यं
व्याप्तिः ) १३ ।
ननु प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नस्य यस्य कस्यचित् प्रतियोगि-
नः तत्सामान्यस्य वाऽनधिकरणत्वम्, यत्किञ्चित्प्रतियोगि-
तावच्छेदकावच्छिन्नस्य वाऽनधिकरणत्वं विवक्षितम् ।
शंका-“विशिष्टसत्तावान् जातेः ” इत्यादि स्थलोंमें अतिव्याप्ति वारणार्थ आपने
प्रतियोग्यनधिकरणमें प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नानधिकरणकी विवक्षा करी है;
उसमें हम यह पूछते हैं कि- क्या प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न यत्किञ्चित् प्रति-
योगिका अनधिकरण कहते हो किंवा प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न यावत् प्रति-
योगिका अनधिकरण विवक्षित है? अथवा यत् किञ्चित् जो प्रतियोगितावच्छेदक धर्म
तदवच्छिन्नानधिकरण कहते हो ?
आद्ये कपिसंयोगी एतद्वृक्षत्वादित्यादावेवाव्याप्तिः। कपिसंयोगा-
भावस्य हि प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नो वृक्षावृत्तिरपि कपि-
संयोगो भवति तदनधिकरणं च वृक्ष इति ।
भाषा-इनमें यदि प्रथमपक्ष कहो तो “ वृक्षः कपिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्”
इस स्थलमें अव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां साध्यतावच्छेदक समवायसम्बन्धावच्छिन्न
प्रतियोगितावच्छेदक धर्म कपिसंयोगत्वभी लेसकते हैं; तद्धर्मावच्छिन्न यत्किञ्चित्
प्रतियोगी शब्दसे भूतलवृत्ति कपिसंयोगभी लेसकतेहैं . तादृश भूतलवृत्ति कपिसं-
योगका अनधिकरण जो हेत्वधिकरण एतद्वृक्ष तद्वृत्त्यभाव “ वृक्षे भूतलवृत्तिक-
पिसंयोगो नास्ति ” इत्याकारक अभाव, एतादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदकही
कपिसंयोगत्वरूप साध्यतावच्छेदक धर्म है; अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक धर्मके न
होनेसे अव्याप्तिरूप दोष हुआ. इस दोषके निवारणार्थ यदि प्रतियोगितावच्छेदका-
वच्छिन्न यावत् प्रतियोगीके अनधिकरणकी विवक्षा करें तौ यद्यपि “ वृक्षः कपिसंयो-
गवान् एतद्वृक्षत्वात्” इत्यादि स्थलमें दोषवारण होसकताहै; क्योंकि प्रतियोगिताव-
च्छेदक कपिसंयोगत्वावच्छिन्न यावत् कपिसंयोगका अनधिकरणीभूत हेत्वधिकरण
एतद्वृक्ष नहीं है किन्तु प्रतियोगितावच्छेदक घटत्वाद्यवच्छिन्न याव घटादिका अन-
धिकरण हेत्वधिकरण एत वृक्ष होसकता है, एवं अभावीय प्रतियोगितावच्छेदक
घटत्वादि धर्म होंगे, अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक कपिसंयोगत्व धर्म्म होगा,
ऐसे अव्याप्तिरूप दोष नहीं है.
द्वितीये तु प्रतियोगिव्यधिकरणाभावाप्रसिद्धिः । सर्वस्यैवाभा-
वस्यपूर्वक्षणवृत्ति त्वविशिष्टस्वाभावात्मकप्रतियोगिसामाना-
धिकरणत्वात् ।
भाषा-तथापि द्वितीयपक्षमें कहे प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न यावत् प्रतियोगिके
अनधिकरणकी विवक्षा करनेसे “वह्निमान् धूमात्” इत्यादि सद्धेतुमात्रमें लक्षणका अस-
म्भव है क्योंकि यहां पूर्वोक्त रीतिसे लक्षणघटक घटाद्यभाव होसकता है; परन्तु वहभी
प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न यावत् प्रतियोगिके अनधिकरणमें नहीं रहसकता किन्तु
स्वाभावात्मक प्रतियोगिके समानाधिकरणहीमें रहताहै. तात्पर्य यह कि-हेत्वधिक-
रण पर्वतमें घटाभाव और पूर्वक्षणवृत्तित्वविशिष्ट घटाभावाभावाभाव ये दोनों एक
रूप हैं, उस एकरूपापन्न अभावके प्रतियोगि दो हुए; एक घट और दूसरा घटाभा-
वाभाव. वह यद्यपि घटात्मक प्रतियोगिके साथ समानाधिकरण नहीं है तथापि
स्वाभावात्मक प्रतियोगिके साथ एकाधिकरणवृत्ति है. यहां यह भाव है कि- जिस
अधिकरणमें घटाभाव रहेगा उसी अधिकरणमें घटाभावका अभाव नहीं रहसकता;
क्योंकि “अभावविरहात्मत्वं वस्तुनः प्रतियोगिता” इस आचार्यके वचनानुरोधसे
घटाभावका अभाव घटस्वरूप होताहै, एवं प्रतियोगि तथा उसका अभाव दोनों एका-
धिकरणमें नहीं रहसकते. इसलिये घटाभावमें ‘ पूर्वक्षणवृत्तित्वविशिष्ट ’ यह विशेषण
दिया. एवं घटाभावके अधिकरणमें यद्यपि घट नहीं रहता तथापि पूर्वक्षणवृत्तित्ववि-
शिष्ट घटाभावका अभाव उत्तरक्षणावच्छेदेन रहसकताहै.एवं पूर्वक्षणवृत्तित्वविशिष्ट
घटाभावके अभावका अभाव पूर्वक्षणवृत्तित्वविशिष्ट घटाभावस्वरूप होगा और
विशिष्टवस्तुका शुद्धसे भेद नहीं होता. इस न्यायसे विशिष्टघटाभाव शुद्धघटाभाव
स्वरूप हुआ; उस अभावके प्रतियोगि घट तथा स्वाभाव ये दो हुए. एवं यद्यपि
उसको घटात्मक प्रतियोगिके साथ समानाधिकरण नहीं है, तथापि प्रतियोगिता-
वच्छेदकावच्छिन्न यावत् प्रतियोगिअन्तर्गत स्वाभावात्मक प्रतियोगिके साथ घटाभा-
वादिका समानाधिकरण होसकताहै. एवं रीतिसे प्रतियोगिव्यधिकरणाभावकी अप्र-
सिद्धी है.
न च वह्निमान् धूमादित्यादौ घटाभावादेः पूर्वक्षणवृत्तित्वविशि-
ष्टस्वाभावात्मकंप्रतियोग्यधिकरणत्वं यद्यपि पर्वतादेस्तथापि
१४४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
साध्यतावच्छेदकसम्बन्धेन तत्प्रतियोग्यनधिकरणत्वमस्त्येवेति
कथं प्रतियोगिव्यधिकरणाभावाप्रसिद्धिरिति वाच्यम्। घटाभावे
यो वह्न्यभावस्तस्य घटाभावात्मकतया घटाभावस्य वह्निरपि
प्रतियोगी तदधिकरणं च पर्वतादिरित्येवं क्रमेण प्रतियोगि
व्यधिकरणस्याप्रसिद्धत्वात् ।
सिद्धान्ती-“वह्निमान् धूमात्” इत्यादि स्थलमें घटाभावादिको पूर्वोक्त रीतिसे
यद्यपि पूर्वक्षणवृत्तित्वविशिष्टस्वाभावात्मक प्रतियोगिके साथ पर्वतादिमें समानाधि-
करण है तथापि “ ज्ञानवान् द्रव्यत्वात् ” इत्यादि स्थलमें अतिव्याप्ति वारणार्थ
साध्यतावच्छेदक सम्बन्धसे प्रतियोग्यनधिकरणत्व विवक्षित है. प्रकृतमें साध्यतावच्छे-
दक सम्बन्ध संयोग है. एवं संयोगसम्बन्धसे घटका तथा स्वाभावात्मक प्रतियोगिका
अनधिकरण हेत्वधिकरण है इसलिये प्रतियोगि व्यधिकरणाभावाप्रसिद्धि निबन्धन
दोष नहीं. वादी-यही दोष प्रकारान्तरसेभी होसकता है. जैसे-हेत्वधिकरण पर्वतमें
जो घटाभाव उस घटाभावात्मकाधिकरणमें लिया वह्न्यभाव वह वह्निका अभाव
घटाभावस्वरूप हुआ; क्योंकि अभावाधिकरणमें रहनेवाले अभावको विद्वान् लोग
अधिकरणस्वरूपही मानते हैं. एवं उस अभावका प्रतियोगी वह्नि तथा घट दोनों होंगे;
उनमें वह्निरूप प्रतियोगीके अधिकरण पर्वतादिमें वह अभावप्रतियोगिव्यधिकरण नहीं
है. एवं प्रतियोगि व्यधिकरणाभावाप्रसिद्धि पुनरपि तादवस्थ्य है.
यदि च घटाभावादौ वह्न्यभावादिर्भिन्न इत्युच्यते, तथापि धूमा-
भाववान् वह्न्यभावादित्यादावव्याप्तिः । तत्र साध्यतावच्छेदकस-
म्बन्धः स्वरूपसम्बन्धस्तेन च सम्बन्धेन सर्वस्यैवाभावस्य पूर्व-
क्षणवृत्तित्वविशिष्टस्वाभावात्मकप्रतियोग्यधिकरणत्वं हेत्वधि-
करणस्येति ।
सिद्धांती-हम लोग अभावाधिकरणक अभावको अधिकरणस्वरूप नहीं मानते;
इसलिये घटाभावमें रहनेवाला वह्न्यभाव घाटाभावात्मक कभी नहीं होसकता; किन्तु
पृथक् होनेसे स्वप्रतियोग्यधिकरणसे भिन्नाधिकरणमेंही नियमसे रहेगा. एवं प्रति-
योगि व्यधिकरणाभावकी अप्रसिद्धि नहीं है. वादी-आपके ऐसे कथनसे यद्यपि
“वह्निमान् धूमात्” इत्यादि स्थलमें प्रतियोगिव्यधिकरणाभावाप्रसिद्धिनिबन्धन अस-
म्भवरूप दोष नहीं है तथापि “ह्रदो धूमाभाववान् वह्न्यभावात्” इत्यादि स्थलमें
परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १४५
अव्याप्तिरूप दोष अवश्य है,क्योंकि यहां साध्यतावच्छेदक सम्बन्धस्वरूपहै और स्व-
रूपसम्बन्धसे वस्तुमात्रका अभाव पूर्वक्षणवृत्तित्वविशिष्ट स्वाभात्मक प्रतियोगिके साथ
हेत्वधिकरणह्रदादिकोंमें एकाधिकरणमें वृत्तिहै एवं अभावसाध्यक स्थलमें प्रतियोगिव्यधि
करणाभावप्रसिद्धहोनेसे अव्याप्तिरूप दोषनियतहै. एतद्दोषपरिहारार्थयदि 'यत्किञ्चित्
जो प्रतियोगितावच्छेदक धर्म तदवच्छिन्न यावत् प्रतियोगिका अनधिकरण' इस तृतीय-
पक्षका आश्रयण करो तो यद्यपि "ह्रदो धूमाभाववान् वह्नयभावात्"इत्यादि स्थलमें दोष
नहीं है क्योंकि यहां यत्किञ्चित् प्रतियोगितावच्छेदक धर्मसे घटत्वादि धर्मोंका ग्रहण
होसकता है. तदवच्छिन्न यावत् प्रतियोगि घटादिही होंगे तदनधिकरण हेत्वधिकरण
जलह्रद तद्वृत्त्यभावीय प्रतियोगितावच्छेदक घटत्वादि धर्म अनवच्छेदकसाध्यताव-
च्छेदक धूमाभावत्व तदवच्छिन्नधूमाभाव उसके साथ ह्रदात्मकाधिकरणमें वह्नय-
भावरूप हेतुका सामानाधिकरण है. एवं अव्याप्तिरूप दोष नहीं.
तृतीये तु कपिसंयोगाभाववान् आत्मत्वादित्यादावव्याप्तिः ।
तत्रात्मवृत्तिकपिसंयोगाभावाभावः कपिसंयोगः,तस्य च गुण-
त्वात् तत्प्रतियोगितावच्छेदकं गुणसामान्याभावत्वमपि तदव-
च्छिन्नानधिकरणत्वं हेत्वधिकरणस्यात्मन इति ।
भाषा-तथापि यत्किञ्चित् प्रतियोगितावच्छेदक धर्मके ग्रहण करनेसे “ आत्मा
कपिसंयोगाभाववान् आत्मत्वात् ” इस स्थलमें अव्याप्तिरूप दोष होगा. यद्यपि यहां
घटाभावीय यत्किञ्चित् प्रतियोगिताके अवच्छेदक घटत्वधर्मावच्छिन्नका अनधिकरण
हेत्वधिकरण आत्मा होसकताहै; इसलिये प्रतियोगि व्यधिकरणाभावकी अप्रसिद्धिनि-
बन्धन अव्याप्तिरूप दोष नहीं है तथापि यत्किञ्चित् प्रतियोगितावच्छेदक धर्मसे
साध्यतावच्छेदक धर्मका व्यापकीभूत धर्मभी लेसकते हैं. इस तात्पर्यसे अव्याप्ति है.
उसका प्रकार यह है कि-हेत्वधिकरण आत्मवृत्ति जो कपिसंयोगाभावाभाव वह कपि-
संयोग स्वरूप हुआ और संयोगकी गणना दशसंख्यादि सामान्यगुणोंमें है. एवं साध्या-
भावरूप कपिसंयोग गुणसामान्यस्वरूपभी हुआ. उसकी प्रतियोगिता जैसे कपिसंयो-
गाभावमें है वैसे गुणसामान्याभावमेंभी रही. एवं अभावीय प्रतियोगिताका अवच्छेदक
धर्म्म कपिसंयोगाभावत्वका व्यापकीभूत गुणसामान्याभावत्वभी होसकताहै; क्योंकि
हेत्वधिकरण आत्मामें “ सामान्यगुणो नास्ति ” इत्याकारक अभाव नहीं पासकते
किन्तु गुणसामान्याभावाभाव पासकतेहैं. उसकी प्रतियोगिता गुणसामान्याभावमें रहेगी,
प्रतियोगितावच्छेदक धर्म गुणसामान्याभावत्व होगा,उसीकी यत्किञ्चित् प्रतियोगिता-
वच्छेदक धर्मसे ग्रहण करें तो तदवच्छिन्न गुणसामान्याभाव होगा. उस गुणसामान्या-
१२
१४६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
भावका अनधिकरणहेत्वधिकरण आत्मा है; एवं अव्याप्ति हुई. तात्पर्य यह कि-कपि-
संयोगको सामान्यगुण अन्तःपाति होनेसे कपिसंयोगाभावमें कपिसंयोगाभावत्व और
गुणसामान्याभावत्व ये दो धर्म रहतेहैं. हम यत्किञ्चित् प्रतियोगितावच्छेदक धर्मसे
गुणसामान्याभावत्वरूप धर्महीका ग्रहण करेंगे तदवच्छिन्नगुणसामान्याभावका अन-
धिकरण हेत्वधिकरण आत्मा होगा. भाव यह कि-यद्यपि कपिसंयोगाभावत्वेन कपि-
संयोगाभावाभाव हेत्वधिकरण आत्मामें नहीं पासकते तथापि गुणसामान्याभावत्वेन
कपिसंयोगाभावाभाव पासकतेहैं. इस रीतिसे गुणसामान्याभावत्वेन कपिसंयोगाभाव-
का अनधिकरण हेत्वधिकरण आत्मा हुआ अर्थात् यत्किञ्चित् धर्म पुरस्कारेण गृहीत
जो साध्य उसका अभाव हेत्वधिकरणमें पानेसे अव्याप्तिरूप दोष हुआ.
मैवम् । यादृशप्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नानधिकरणत्वं हेतु
मतस्तादृशप्रतियोगितानवच्छेदकत्वस्य विवक्षितत्वात् । १४ ।
समाधान-यादृशीप्रतियोगिताके अवच्छेदकावच्छिन्नका अनधिकरण हेत्वधिकरण
होय तादृशी प्रतियोगिताका अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक धर्म विवक्षित है. प्रकृतमें
'कपिसंयोगाभाववान् आत्मत्वात्' यहां 'यादृशी प्रतियोगिता' शब्दसे गुणसा-
मान्याभावत्वावच्छिन्न गुणसामान्याभावनिष्ठ प्रतियोगिताहीका ग्रहण करना योग्य
है. एवं गुणसामान्याभावनिष्ठ प्रतियोगिताका अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक धर्म
कपिसंयोगाभावत्व होसकता है. इसलिये अव्याप्ति नहीं है. एवं यहां लक्षणका स्वरूप
ऐसा हुआ कि-( साध्यतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्न यादृश प्रतियोगितावच्छेदका-
वच्छिन्न प्रतियोग्यनधिकरणं यत् हेतुतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छि-
न्नहेत्वधिकरणं तद्वृत्त्यभावीयतादृशप्रतियोगितानवच्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं
तदवच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यं व्याप्तिः-इति ) इस लक्षणका प्रकृतमें संगत
करनेका प्रकार यह है कि, साध्यतावच्छेदकीभूतस्वरूप सम्बन्धावच्छिन्ना गुणसा-
मान्याभावाभावीया जो गुणसामान्याभावत्वावच्छिन्नागुणसामान्याभावनिष्ठा प्रतियोगिता
उस प्रतियोगिताकावच्छेदकीभूत जो गुणसामान्याभावत्वरूप धर्म तदवच्छिन्न जो गुण
सामान्याभाव उस गुणसामान्याभावका अनधिकरण जो हेतुतावच्छेदकीभूत समवायस-
म्बन्धावच्छिन्न आत्मत्वत्वावच्छिन्न आत्मत्वाधिकरणं आत्मा उसमें रहनेवाले अभावसे
निरूपित जो गुणसामान्याभावत्वावच्छिन्न गुणसामान्याभावनिष्ठ प्रतियोगिता तादृश
प्रतियोगिताका अनवच्छेदक जो साध्यतावच्छेदक धर्म कपिसंयोगाभावत्व तदवच्छिन्न
कपिसंयोगाभावके साथ आत्मत्वरूप हेतुका आत्मरूपएकाधिकरणमें सामानाधिकरण्य
है. एवं लक्षण संगत हुआ १४।
परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १४७
ननु कालो घटवान् कालपरिमाणादित्यत्र प्रतियोगिव्यधिकरणा-
भावाप्रसिद्धिः, हेत्वधिकरणस्य महाकालस्य जगदाधारतया
सर्वेषामभावानां साध्यतावच्छेदकसम्बन्धेन कालिकविशेषण-
तया प्रतियोग्यधिकरणवृत्तित्वात् । अत्र केचित् । महाकालभे-
दविशिष्टघटाभावस्तत्र प्रतियोगिव्यधिकरणो महाकालस्य
घटाधारत्वेऽपि महाकालभेदविशिष्टघटानाधारत्वात्, महाकाले
महाकालभेदाभावात् । १५ ।
शङ्का-इस पूर्वोक्त समग्र लक्षणकी "कालो घटवान् कालपरिमाणात्" इस स्थलमें
अव्याप्ति है, क्योंकि यहां कालिकसम्बन्धसे घट साध्य है; और समवायेन कालपरि-
माण हेतु है; हेत्वधिकरणीभूत महाकाल कालिकविशेषणतासम्बन्धसे जगत् मात्रका
आश्रय है. एवं साध्यतावच्छेदक कालिकसम्बन्धसे यावद्वस्तुका अभाव स्वप्रतियोगिके
अधिकरण महाकालमें रहताहै. इस रीतिसे यहां प्रतियोगि व्यधिकरणाभावही प्रसिद्ध
नहीं होसकता. समाधान-यहां कईएक विद्वान् एसे कहतेहैं कि-हेत्वधिकरण महा-
कालमें अभावीय कालिकविशेषणताघटित सामानाधिकरण्य सम्बन्धसे महाकालभेद-
विशिष्ट घटका अभाव लेसकतेहैं, वही अभाव प्रतियोगि व्यधिकरणभी होसकताहै,
क्योंकि यद्यपि महाकाल घटका आधार है तथापि महाकाल भेदविशिष्ट घटका
आधार नहीं होसकता; क्योंकि अभावीय विशेषणतासम्बन्धसे महाकालमें महाकालभे-
दका अभाव है. भाव यह कि-विशिष्टाधिकरणता वहांही मानी जातीहै; जहां सामानाधि-
करण्य घटकीभूत विशेषण विशेष्यके सम्बन्धोंसे विशेषण विशेष्य उभयका सत्त्वलाभ
होवे एवं अभावीयविशेषणता सम्बन्धसे महाकालभेदके महाकालमें न रहनेसे
महाकालभेदविशिष्ट घटभी ‘ विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव होनेसे ’ नहीं
रहसकता-इति १५ ।
वस्तुतस्तु प्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धेन प्रतियोग्यनधिकरणी-
भूतहेत्वधिकरणवृत्त्यभावप्रतियोगितासामान्ये यत्सम्बन्धाव-
च्छिन्नत्वयद्धर्मावच्छिन्नत्वोभयाभावस्तेन सम्बन्धेन तद्धर्मा-
वच्छिन्नस्य तद्धेतुव्यापकत्वं बोध्यम् । व्यापकसामानाधिकरण्यं
च व्याप्तिः ।
१४८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
भाषा-और वस्तुतः सिद्धांत तो यह है कि, यहां लक्षणका स्वरूप ऐसा कहना
उचित है कि-प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्धसे प्रतियोगीका अनधिकरणीभूत जो
हेत्वधिकरण उस हेत्वधिकरणवृत्ति जो अभाव उस अभावकी जो प्रतियोगिता उस प्रति-
योगिता सामान्यमें यत् सम्बन्धावच्छिन्नत्व तथा यद्धर्मावच्छिन्नत्व उभयका
अभाव है, तिस सम्बन्धसे तत्तद्धर्म्मावच्छिन्नकी तिस हेतुके साथ व्यापकता जाननी
चाहिये, तादृश व्यापकके साथ हेतुका सामानाधिकरण्यही व्याप्ति है.
यत्सम्बन्धः साध्यतावच्छेदकः सम्बन्धः, यद्धर्मः साध्यतावच्छे-
दको धर्मः । तत्र यदि यद्धर्मावच्छिन्नत्वाभावमात्रमुच्यते तदा
समवायेन यो वह्न्यभावस्तस्य प्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धः
समवायस्तेन प्रतियोग्यनधिकरणपर्वतादिवृत्तिः स एव, तत्प्रति-
योगितावच्छेदकं च वह्नित्वमित्यव्याप्तिः स्यात्। यदि च यत्स-
म्बन्धावच्छिन्नत्वाभावमात्रमुच्यते तदा तादृशस्य संयोगेन घटा-
भावस्य प्रतियोगितायां संयोगसम्बन्धावच्छिन्नत्वसत्त्वाद्व्याप्तिः
स्यादत उभयमुपात्तम् ।
भाषा-यहां लक्षणमें यत्सम्बन्धसे साध्यतावच्छेदक सम्बन्धका ग्रहण है और
यद्धर्म्मसे साध्यतावच्छेदक धर्मका ग्रहण है. इन दोनोंमें किसी एकका निवेश
न करनेसे अव्याप्ति होगी अर्थात् यदि साध्यतावच्छेदक सम्बन्धका ग्रहण न करें
किन्तु “ प्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धेन प्रतियोग्यनधिकरणीभूतहेत्वधिकरणवृत्त्य-
भावप्रतियोगितासामान्ये यद्धर्मावच्छिन्नत्वाभावः तद्धर्मावच्छिन्नस्य तद्धेतुसामा-
नाधिकरण्यं व्याप्तिः” एतावन्मात्र लक्षण करें तो “वह्निमान् धूमात्” इस स्थलमें
अव्याप्ति होगी; क्योंकि हेत्वधिकरण पर्वतमें “संयोगेन वह्निसत्त्वेपि समवायेन वह्नि-
र्नास्ति” इत्याकारक अभाव पासकतेहैं; एतादृशाभावीय प्रतियोगितासमवायेन वह्नि-
निष्ठा हुई और प्रतियोगिता सामान्यका अर्थ है. यावत् प्रतियोगितामें अर्थात् हेत्व-
धिकरणमें जिस २ सम्बन्धसे जिस २ धर्मसे जो २ अभाव पासकें उस २
अभावकी प्रतियोगितामें उभयाभाव विवक्षित है. एवं समवायेन वह्नि निष्ठा प्रतियोगि-
ताभी यावत् अन्तर्गत है, परन्तु इस प्रतियोगितामें यद्धर्मावच्छिन्नत्वाभाव नहीं है,
किन्तु 'यद्धर्म' पदसे ग्राह्य साध्यतावच्छेदक वह्नित्वरूप धर्म विद्यमान है एवं
अव्याप्ति हुई. इसके वारणार्थ यत् सम्बन्धकाभी निवेश किया. यत्
सम्बन्धसे साध्यतावच्छेदक सम्बन्धका ग्रहण है. एवं अव्याप्ति नहीं है.
परिच्छेदः २] भाषाटीकासमेता. १४९
क्योंकि समवायेन वह्न्यभावीय प्रतियोगितामें यद्यपि साध्यतावच्छेदक धर्मका
अभाव नहीं है तथापि साध्यतावच्छेदक संयोगसम्बन्धका अभाव है. एवं
"एकसत्त्वेपि द्वयं नास्ति" इस प्रतीतिके बलसे उभयाभाव पासकतेहैं; याते दोष
नहीं है. एवं अभावीय प्रतियोगितामें यदि साध्यतावच्छेदक धर्मका निवेश न करें
किन्तु "प्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धेन प्रतियोग्यनधिकरणभूतहेत्वधिकरणवृत्त्य-
भावप्रतियोगितासामान्ये यत्सम्बन्धावच्छिन्नत्वाभावः तेन सम्बन्धेन तद्धेतोः सामा-
नाधिकरण्यं व्याप्तिः" एतावन्मात्र लक्षण करें तो "वह्निमान् धूमात्" इसी स्थल-
में फिर अव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां हेत्वधिकरणवृत्तिसंयोगेन घटाभावीय घटनिष्ठ
प्रतियोगितामें यत्सम्बन्धावच्छिन्नत्वाभाव नहींहै. किन्तु साध्यतावच्छेदक संयोगस-
म्बन्धावच्छिन्नत्वही है. एवं लक्षण अव्याप्त हुआ परन्तु यदि पूर्वोक्त सम्बन्ध तथा धर्म
उभयका निवेश करें तो दोष नहींहै; क्योंकि घटाभावीय घटनिष्ठ प्रतियोगितामें यद्य-
पि साध्यतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्नत्व है तथापि साध्यतावच्छेदक वह्नित्व धर्माव-
च्छिन्नत्व नहीं है. एवं "एकसत्त्वेपि द्वयं नास्ति" इस प्रतीतिसे उभयाभाव पासक-
तेंहैं. प्रतियोगितामें उभयाभाव होनेसे पूर्वोक्त रीतिसे लक्षणसमन्वय होसकता है.
इसलिये प्रकृत लक्षणमें यत्सम्बन्धावच्छिन्नत्व यद्धर्मावच्छिन्नत्व उभयका निवेश
अवश्य करना उचित है.
इत्थं च कालो घटवान् कालपरिमाणादित्यादौ संयोगसम्बन्धेन
यो घटाभावस्तत्प्रतियोगिनो घटस्यानधिकरणे महाकाले वर्त-
मानः स एव संयोगेन घटाभावस्तस्य प्रतियोगितायां कालिकस-
म्बन्धावच्छिन्नत्वघटत्वावच्छिन्नत्वोभयाभावसत्त्वान्नाव्याप्तिः १६
भाषा-एवं "कालो घटवान् कालपरिमाणात्" इत्यादि स्थलमेंभी दोष नहीं;
क्योंकि यहां संयोगेन घटाभावीय घटनिष्ठ प्रतियोगितामें यद्यपि साध्यतावच्छेदक
घटत्वधर्मावच्छिन्नत्व है तथापि साध्यतावच्छेदक कालिक विशेषणतासम्बन्धावच्छि-
न्नत्व नहीं है. एवं "एकसत्त्वेऽपि द्वयं नास्ति" इस प्रतीतिबलसे उभयाभावसंयोगे-
न घटाभावीय घटनिष्ठ प्रतियोगितामें रहसकताहै. एवं "तेन कालिकविशेषणतासम्ब-
न्धेन तत् घटत्वधर्मावच्छिन्नस्य तत् कालपरिमाणरूपहेतोः सामानाधिकरण्यं व्याप्तिः"
यह व्याप्तिका लक्षण निर्दोष संगत होसकताहै १६।
धूमवान् वह्नेः इत्यादावतिव्याप्तिवारणाय सामान्यपदमुपात्तम्। १७।
शंका-इस लक्षणमें 'प्रतियोगितासामान्ये' क्यों कहा? किन्तु "यत्त
१५० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
किञ्चित् प्रतियोगितायां ” ऐसा कहा जाता तो उपस्थितिकृत लाघव होता.
समाधान-'सामान्य' नाम यावत्का है. उसकी जगह यदि ' यत्किञ्चित् ' का
निवेश करें तो “ पर्वतो धूमवान् वन्हेः” इस स्थलमें अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां
' यत्किञ्चित् ' शब्दसे ग्राह्य घटनिष्ठ प्रतियोगितामें पूर्वोक्त रीतिसे उभयाभाव मिल-
नेसे लक्षण संगत होसकता है और अलक्ष्यमें लक्षण संगतहीका नाम अतिव्याप्ति है
और यदि यावदर्थक 'सामान्य' पदका निवेश करें तो अतिव्याप्तिरूप दोष दूर होसक-
ता है; क्योंकि यावदन्तर्गत संयोगेन धूमत्वेन धूमाभावीय धूमनिष्ठ प्रतियोगिताका
भी ग्रहण होसकता है. तात्पर्य यह कि-संयोगेन धूमाभाव हेत्वधिकरण लोहपिण्डमें
पासकतेहैं. परन्तु संयोगेन धूमनिष्ठप्रतियोगितामें उभयाभाव नहींहै किन्तु उभयही है
इसलिये अतिव्याप्तिरूप दोष नहीं है १७ ।
ननु प्रमेयवह्निमान् धूमादित्यादौ प्रमेयवह्नित्वावच्छिन्नत्वमप्र-
सिद्धम् । गुरुधर्मस्यानवच्छेदकत्वादिति चेत् । न । कम्बुग्रीवा-
दिमान्नास्तीति प्रतीत्या कम्बुग्रीवादिमत्त्वावच्छिन्नप्रतियो-
गिताविषयीकरणेन गुरुधर्मस्याप्यवच्छेदकत्वस्वीकारादिति
संक्षेपः । १८ ॥ ६९ ॥
शंका-पूर्वोक्त समस्त लक्षणोंकी “पर्वतः प्रमेयवन्हिमान् धूमात् ” इस स्थलमें
अव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां साध्यतावच्छेदक धर्म प्रमेयवन्हित्वंही मानना होगा, सो
वह अवच्छेदक हो नहीं सकता. भाव यह कि-प्राचीन विद्वानोंका यह संकेत है कि-
“ सम्भवति लघुधर्मे गुरौ तदभावात्-अर्थात् यदि समनियत लघुधर्म अवच्छेद-
क मिलसकें तो गुरुधर्ममें अवच्छेदकता माननी उचित नहीं” प्रकृतमें प्रमेयवन्हित्वके
समनियत तथा लघुवन्हित्वरूप धर्म है, वही अवच्छेदक होना चाहिये; परन्तु वह
साध्यतावच्छेदक धर्म नहीं. साध्यतावच्छेदक धर्म प्रमेयवन्हित्वरूप है परन्तु वह गुरु-
धर्म होनेसे अवच्छेदक नहीं होसकता और साध्यतावच्छेदक धर्मका निवेश पूर्वोक्त
सभी लक्षणोंमें है एवं अवच्छेदक अप्रसिद्धि निन्बधन अव्याप्तिरूप दोष होगा.
समाधान-पदार्थोंकी सिद्धि प्रतीति अनुरोधसे होती है किन्तु स्वमन्तव्य मात्रसे
नहीं होसकती 'अत्र कम्बुग्रीवादिमान् नास्ति' इस प्रतीतिसे कम्बुग्रीवादिमत्त्वावच्छिन्न
प्रतियोगिताक अभाव प्रतीत होता है और अभावीय प्रतियोगिताभी कम्बुग्रीवादिमत्त्वा-
वच्छिन्नाही प्रतीतहोतीहै. इसलिये प्रतीत्यनुरोधसे गुरु धर्ममेंभी अवच्छेदकता अंगीकार
करनी उचित है-इति । यह संक्षेपसे व्याप्तिलक्षणका निरूपण किया है १८ ॥६९॥
पक्षवृत्तित्वमित्यत्र पक्षत्वं किं तदाह, सिषाधयिषयेत्यादि-
परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५१
भाषा-पीछे "व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्वधीः परामर्श उच्यते" इस परामर्शके लक्ष-
णमें 'पक्षवृत्तित्व' यह कहा उसमें पक्षत्व क्या है इसी वार्ताको 'सिषाधयिषा'
इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कहते हैं-
सिषाधयिषया शून्या सिद्धिर्यत्र न विद्यते ॥
स पक्षस्तत्र वृत्तित्वज्ञानादनुमितिर्भवेत् ॥ ७० ॥
भाषा-साध्यके सिद्ध करनेकी इच्छाका नाम 'सिषाधयिषा' है. उस सिषाधयि-
षासे शून्य जो सिद्धि अर्थात् सिषाधयिषाविरहविशिष्ट प्रत्यक्षात्मक ज्ञान जहां नहीं
है वह 'पक्ष' है; उसमें हेतुकी वृत्तिताके ज्ञानसे अनुमिति होतीहै ॥ ७० ॥
सिषाधयिषाविरहविशिष्टायाः सिद्धेरभावः पक्षता, तद्वान् पक्ष
इत्यर्थः । सिषाधयिषामात्रं न पक्षता, विनापि सिषाधयिषां घन-
गर्जितेन मेघानुमानात् । अत एव साध्यसंदेहोऽपि न पक्षता,
विनापि संदेहं तदनुमानात् ।
भाषा-सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो सिद्धि, उस सिद्धिका अभाव 'पक्षता' है; उस
पक्षतारूप धर्मवालेका नाम 'पक्ष' है "गगनं मेघवत् गर्जनात्" इत्यादि स्थलोंमें सिषा-
धयिषासे विनाभी पुरुषोंको अनुमिति होतीहै. इसलिये साध्य सिद्ध करनेकी
इच्छा मात्रका नाम 'पक्षता' नहीं कह सकते. इसीलिये "साध्यसन्देहः पक्षता" इत्या-
कारक प्राचीनोंका लक्षणभी सम्यक् नहीं है, क्योंकि विनापि मेघरूप साध्यके सन्दे-
हसे गर्जनेसे गगनाधिकरणमें मेघकी अनुमिति होतीहै.
सिद्धौ सत्यामपि सिषाधयिषासत्त्वेऽनुमितिर्भवत्येव, अतः सिषा-
धयिषाविरहविशिष्टत्वं सिद्धौ विशेषणम् ।
भाषा-'सिद्धि' नाम इन्द्रियसन्निकर्षजन्य ज्ञानका है. उसके प्राप्त होतेपि अर्थात्
पर्वतादि पक्षोंमें 'पर्वतो वह्निमान्' इत्याकारक चाक्षुष ज्ञान हुएभी 'पर्वतो वह्निमान् विषय-
यकानुमितिर्मे स्यात्' इत्याकारक इच्छा होनेसे अनुमिति होतीहै. इसलिये 'सिषा-
धयिषाविरहविशिष्टत्व' सिद्धिमें विशेषण दिया है. भाव यह कि-यद्यपि प्रत्यक्षात्मक
ज्ञान अनुमितिज्ञानका प्रतिबन्धक है, इसलिये सिद्धि होत संते अनुमितिज्ञानका
होना सम्भव नहीं तथापि सिषाधयिषाको विद्वानोंने उत्तेजक माना है. प्रतिबन्धक
होतेभी सामग्रीकी सहकारतासे कार्यजनकका नाम 'उत्तेजक' है. एवं सिषाधयिषारूप
उत्तेजकके बलसे सिद्धिरूप प्रतिबन्धकके सत्त्वकालमेंभी अनुमितिरूप कार्य होताहै
बुद्धि खण्ड: प्रत्यक्ष, अनुमान, परामर्श, व्याप्ति, उपमान व शब्द प्रमाण
१५२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
इससे यह सिद्धान्त हुआ कि-सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो केवल सिद्धि वह अनुमि-
तिक प्रति प्रतिबन्धक है. उसीका अभाव जहां तहां पक्षता है. प्रकृतमें जहां सिद्धि
और सिषाधयिषा दोनों हैं वहांभी सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो देशान्तरीय काला-
न्तरीय सिद्धि उसका अभाव वहां विद्यमान है. इसलिये पक्षताकी क्षति नहीं है.
ऐसे स्थलमें विशेषाणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव जानना चाहिये; क्योंकि 'सिषाधयि-
पाविरह' विशेषण है और 'सिद्धि' विशेष्य है. जहां सिषाधयिषाका विरह नहीं किन्तु
सिषाधयिषा विद्यमान है वहां सिषाधयिषाविरहरूप विशेषणके न होनेसे तद्विशिष्ट
सिद्धिका अभावभी कहसकतेंहैं याते सिद्धि सिषाधयिषाउभय सत्त्वस्थलमें पक्षतानिर्दोषहै.
तथाच यत्र सिद्धिर्नास्ति तत्र सिषाधयिषायां सत्यामसत्यामपि
पक्षता । यत्र च सिषाधयिषाऽस्ति तत्र सिद्धौ सत्यामसत्यामपि
पक्षता । यत्र च सिद्धिरस्ति सिषाधयिषा च नास्ति तत्र न
पक्षता, सिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्धेः सत्त्वात् ।
भाषा-( तथाच ) एवं जिस स्थलमें ( सिद्धि ) प्रत्यक्षज्ञान नहीं है वहां सिषा-
धयिषा होय तो उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव जानना चाहिये अर्थात् सिषाधयि-
पाके होनेसे सिषाधयिषाविरहरूप विशेषणभी नहीं है और सिद्धिके न होनेसे सिद्धि-
रूप विशेष्यभी नहीं है. इसलिये विशेषणविशेष्य उभयके अभावसे विशिष्टका अभाव
कहना उचित है. ऐसे स्थलमेंभी पक्षता निर्दोष है. एवं जहां सिद्धि सिषाधयिषा-
दोनों नहीं हैं वहां विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव जानना चाहिये अर्थात् सिषाधयि-
पाके न होनेसे सिषाधयिषाविरहरूप विशेषण तो है परन्तु सिद्धिरूप विशेष्यके न
होनेसे विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव कह सकतेंहैं; ऐस स्थलमेंभी पक्षता निर्दोष
है. एवं जहां सिषाधयिषा विद्यमान है वहां सिद्धि होय तो पूर्ववत् विशेषाणाभावप्रयुक्त
विशिष्ट[भावप्रयुक्त प]क्षता जाननी चाहिये और सिद्धि न होय तौ पूर्ववत् उभयाभावप्रयुक्त
विशिष्टाभाव [अवच्छेदक] जाननी चाहिये; परन्तु जिस स्थलमें केवल ( सिद्धि ) प्रत्यक्षा-
त्मक ज्ञान [तो] है, किन्तु अनुमित्सारूप उत्तेजक नहीं है, वहां पक्षता नहीं है क्योंकि
सिषाधयिषाविरहविशिष्ट ( सिद्धेः ) प्रत्यक्षात्मक ज्ञानको वहां अनुमिति तत्सामग्रीके
प्रति प्रतिबन्धकता है इसीसे यह सिद्ध हुआ कि अनुमित्साविरहविशिष्ट ( सिद्धिः )
प्रत्यक्षात्मक ज्ञान अनुमितिज्ञानका सर्वथा प्रतिबन्धक है. ऐसे स्थल में पक्षता नहीं है.
ननु यत्र परामर्शानन्तरं सिद्धिस्ततः सिषाधयिषा, तत्र सिषाधयि-
पाकाले परामर्शनाशान्नानुमितिः, यत्र सिद्धिपरामर्शसिषाधयिषाः
परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५३
क्रमेणभवन्ति तत्रसिषाधयिषाकाले सिद्धेर्नाशात् प्रतिबन्धकाभा-
वादेवानुमितिः, यत्र सिषाधयिषासिद्धिपरामर्शाः सन्ति तत्र पराम-
र्शकाले सिषाधयिषैव नास्ति, एवमन्यत्रापि सिद्धिकाले परामर्शका-
ले वा न सिषाधयिषा, योग्यविभुविशेषगुणानां यौगपद्यनिषेधात्,
तत् कथं सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्वं सिद्धेर्विशेषणमिति चेत्। न
शंका—सिद्धिमें सिषाधयिषाविरहविशिष्टता आपको एक कालावच्छेदेन एकात्मवृ-
त्तित्व सम्बन्धसे विवक्षित है परन्तु परामर्शरूप कारणके सत्त्वकालमें और सिद्धिरूप विरो-
धिके सत्त्वकालमें यदि सिषाधयिषाका होना सम्भव होय तो सिषाधयिषाको उत्तेजकता
और तद्विरहविशिष्ट सिद्धिको प्रतिबन्धकता आप कहसकें सो विचारसे यह वार्त्ता बन
नहीं सकती; क्योंकि जिस पुरुषको प्रथम क्षणमें परामर्शात्मक ज्ञान हुआ है उसके
पीछे द्वितीय क्षणमें सिद्धात्मक ज्ञान हुआ और तृतीय क्षणमें सिषाधयिषा हुई तो
सिषाधयिषाकालमें अनुमिति कारणीभूत परामर्शात्मक ज्ञानका क्षणिकत्वेन नाश होनेसे
अनुमिति नहीं होगी १। और जिस आत्मामें प्रथम क्षणमें सिद्धात्मक ज्ञान हुआ है,
द्वितीयक्षणमें परामर्शात्मक ज्ञान हुआ है और तृतीय क्षणमें सिषाधयिषा हुई है वहां
सिषाधयिषाकालमें सिद्धात्मक ज्ञान क्षणिक होनेसे नाश होचुका है, इसलिये प्रति-
बन्धकके अभावसेही अनुमितिज्ञान निर्बाध होगा २। और जिस आत्मामें प्रथमक्षणमें
सिषाधयिषा हुई, द्वितीय क्षणमें सिद्धात्मक ज्ञान हुआ, तृतीयक्षणमें परामर्श हुआ
वहाँ परामर्शकालमें सिषाधयिषाही क्षणिक होनेसे नाश होचुकी है; सिषाधयिषाके
न होनेसे अनुमितिज्ञान नहीं होगा ३। (एवमन्यत्रापि) ऐसे और स्थलोंमेंभी जहां
प्रथमक्षणमें परामर्शात्मक ज्ञान हुआ है द्वितीयक्षणमें सिषाधयिषा हुई है तृतीयक्षणमें
सिद्धात्मक ज्ञान हुआ है वहां अनुमितिकारणीभूत परामर्शात्मक ज्ञान नहीं है इसलिये
अनुमिति न होगी ४। एवं जहां प्रथमक्षणमें सिद्धिहै द्वितीयक्षणमें सिषाधयिषा है तृतीय
क्षणमें परामर्श है वहां तृतीयक्षणमें प्रतिबन्धकके अभावसेही अनुमिति होसकती है ५।
एवं जिस आत्मामें प्रथमक्षणमें सिषाधयिषा हुई है, द्वितीयक्षणमें परामर्श
हुआ है, तृतीय क्षणमें सिद्धात्मकज्ञान हुआ है वहां सिद्धिकालमें सिषाधयिषा
ज्ञान नहीं है इसलिये अनुमिति नहीं होगी ६। एवं प्रत्यक्षके योग्य विभुके
विशेषगुणोंको एककालावच्छेदेन अनुत्पन्न होनेसे सिद्धिकालमें अथवा परामर्शकालमें
सिषाधयिषाका होना सम्भव नहींहै इसलिये सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्व सिद्धिमें विशे-
षण देना व्यर्थ है किन्तु "सिद्धयभावः पक्षता" इतना मात्र कहनेसे निर्वाह होसकताहै.
यत्र वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमानिति प्रत्यक्षं स्मरणं वा,
१३
१५४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
ततः सिषाधयिषा तत्र पक्षतासम्पत्तये सिषाधयिषाविरहविशिष्ट-
त्वविशेषणस्यावश्यकत्वात् ।
समाधान-जिस आत्मामें "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक
प्रत्यक्षात्मक अथवा स्मरणात्मक ज्ञान हुआ हो और उसके पीछे द्वितीयक्षणमें
“पर्वते वह्न्यनुमितिर्मे जायताम् ” इत्याकारक इच्छा उत्पन्न होय तो ऐसे
स्थलमें पक्षतासम्पत्तिके लिये सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्व सिद्धिमें विशेषण
देना आवश्यक है. भाव यह कि-ऐसे स्थलमें सिषाधयिषाके पूर्वक्षणमें होने-
वाला ज्ञान सिद्धिविशिष्टपरामर्शात्मक है. द्वितीयक्षणमें सिषाधयिषारूप उत्ते-
जकके होनेसे यही ज्ञान परामर्शत्वेन अनुमितिका कारण हो जाता है और
सिषाधयिषाके न होनेसे यही ज्ञान सिद्धिरूपेण प्रतिबन्धक होय जाताहै एवं
यदि सिद्धिमें सिषाधयिषाविरहविशिष्टत्वरूप विशेषण न दिया जाय तो ऐसे स्थलमें
पक्षताभी न बनसके; क्योंकि यहां केवल सद्द्यभाव तो नहीं है किंतु सिद्ध्यत्मक
परामर्शही बैठा है और जब विशेषण देते हैं तो पक्षता बनसकती है; क्योंकि यहां
यद्यपि केवल सिद्ध्यभाव नहीं है तथापि सिषाधयिषाविरहविशिष्ट जो सिद्धि उसका
अभाव यहांपर है, इसलिये पक्षता निर्बाध है.
अत्रेदं बोध्यम् । यादृशयादृशसिषाधयिषासत्त्वे सिद्धिसत्त्वे यल्लि-
ङ्गकानुमितिस्तादृशतादृशसिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्ध्यभाव-
स्तल्लिङ्गकानुमितौ पक्षता । तेन सिद्धिपरामर्शसत्त्वेऽपि यत्किं-
चिज्ज्ञानं जायतामितीच्छायामपि नानुमितिः ।
भाषा-यहां यहभी जानना उचित है कि-जैसी २ सिषाधयिषाके सत्त्वकालमें
तथा सिद्धिके सत्त्वकालमें यद्धेतुक अनुमिति होती है वैसी २ सिषाधयिषाविर-
हविशिष्ट सिद्धिका अभाव उसी प्रकृत हेतुक अनुमितिमें पक्षता है. (तेन) एवं "वह्नि-
व्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक सिद्ध्यात्मक परामर्शसत्त्वकालमेंभी
"यत्किञ्चित् ज्ञानं मे जायताम्” इत्याकारक इच्छाके होनेसे अनुमितिकी आपत्ति
नहीं है; क्योंकि इस इच्छाको यत्किञ्चित् ज्ञान विषयक होनेसे प्रकृतानुमिति साम-
ग्रीमें उत्तेजकता नहीं है.
वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमानितिप्रत्यक्षसत्त्वे प्रत्यक्षादि
भिन्नं वह्निज्ञानं जायतामितीच्छायां तु भवत्येव । एवं धूमपरा-
मर्शसत्त्वे आलोकेन वह्निमनुमिनुयामितीच्छायामपि नानुमितिः।
परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५५
भाषा—और यदि "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक प्रत्यक्षा-
त्मक परामर्शसत्त्वकालमें "प्रत्यक्षादिभिन्नं वह्निज्ञानं मे जायताम्" इत्याकारक
इच्छा उत्पन्न होय तो अनुमिति होय सकतीहै; क्योंकि यह इच्छा प्रत्यक्षादिभिन्न
वह्निअनुमितिज्ञानमें उत्तेजकरूपेण विद्यमान है. ( एवं ) प्रकृतानुगममें यद्धेतुकका
निवेश करनेसे "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक धूम परामर्श-
सत्त्वकालमें "आलोकेन हेतुना अनुमितिर्मे जायताम्" इत्याकारक इच्छासेभी
अनुमितिकी आपत्ति नहीं होसकती; क्योंकि यह इच्छा यद्धेतुक परामर्श है तद्धेतुक
नहीं है इसलिये प्रकृतपरामर्शमें उत्तेजकभी नहीं है.
सिषाधयिषाविरहकाले यादृशसिद्धिसत्त्वे नानुमितिस्तादृशी
सिद्धिवैशिष्ट्यैव तत्तदनुमितिप्रतिबन्धिका वक्तव्या ।
भाषा—सिषाधयिषाके अभावकालमें जैसी सिद्धिके होत संते अनुमिति नहीं
होती वह २ सिद्धि विशेषरूपसे उसउस अनुमितिमें प्रतिबन्धक कहनी चाहिये अर्थात्
"पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक अनुमितिमें पर्वतत्वावच्छिन्नविशेष्यता निरूपित वह्नित्वाव-
च्छिन्न प्रकारताशालिनिश्चयत्वेन सिद्धात्मक ज्ञानको प्रतिबन्धकता कहनी उचित है.
तेन पर्वतस्तेजस्वी पाषाणमयो वह्निमानिति ज्ञानसत्त्वेऽप्यनु-
मितेर्न विरोधः ।
भाषा—इससे "पर्वतः तेजस्वी" अथवा "पाषाणमयो वह्निमान्" इत्याकारक
सिद्धात्मक ज्ञान होनेसेभी "पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक अनुमितिज्ञान रुक
नहीं सकता; क्योंकि यह नियम है कि—तद्विशेष्यक तत्प्रकारक अनुमितिज्ञानके
प्रति तद्विशेष्यक तत्प्रकारक सिद्धात्मक ज्ञानको प्रतिबन्धकता है, इतरको नहीं;
और प्रकृतमें अनुमितिज्ञान तो पर्वतत्वावच्छिन्न विशेष्यतानिरूपित वह्नित्वावच्छिन्न
प्रकारताशालि है परन्तु सिद्धिज्ञान प्रथम तो प्रकारतामें विपरीत है अर्थात् तेज-
स्त्वावच्छिन्न प्रकारक है और द्वितीयविशेष्यतामें विपरीत है अर्थात् पाषाणमयत्वा-
वच्छिन्न विशेष्यक है इसलिये यह ज्ञानप्रतिबन्धक नहीं होसकते.
परंतु पक्षतावच्छेदकसामानाधिकरण्येन साध्यसिद्धावपि तद-
वच्छेदेनानुमितिदर्शनात् पक्षतावच्छेदकावच्छेदेनानुमिति प्रति
पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन साध्यसिद्धिरेव प्रतिबन्धिका, पक्षताव-
च्छेदकसामानाधिकरण्येनानुमितिंप्रति तु सिद्धिमात्रं विरोधि ।
१५६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
भाषा-परन्तु प्रतिबध्य प्रतिबन्धक भावस्थलमें यहभी ख्याल रखना चाहिये कि
पक्षतावच्छेदक समानाधिकरणमें अर्थात् पर्वतके किसी एक शिखरमें वह्निरूप साध्यकी
सिद्धि होनेसेभी (तदवच्छेदेन) पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन अर्थात् पर्वतके यावत् शिखरोंमें
अनुमिति होय सकती है इसलिये "पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन अर्थात् पर्वतके यावत्
शिखरोंमें होनेवाली अनुमितिके प्रति "पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन साध्यसिद्धिः-अर्थात्
पर्वतके यावत् शिखरोंमें वह्निविषयक चाक्षुष ज्ञानही प्रतिबन्धक होयसकता है और
पर्वतके शिखरमें होनेवाली अनुमितिके प्रति तो सिद्धिज्ञान मात्र प्रतिबन्धक है
अर्थात् एकशिखरमें होनेवाली अनुमितिके प्रति एकशिखरमें होनेवाला सिद्धिज्ञानभी
प्रतिबन्धक है और यावत् शिखरमें होनेवाला सिद्धिज्ञानभी प्रतिबन्धक है. भाव
यह कि-ज्ञानोंका प्रतिबध्य प्रतिबन्धक भाव समानविषयकत्वेन किंवा अधिक विषय-
कत्वेन होता है; परन्तु प्रतिबध्य ज्ञानसे न्यून विषयावगाहि ज्ञान कदापि प्रतिबन्धक
नहीं होयसकता; इसीलिये यावत् शिखरमें होनेवाली अनुमितिके प्रति एक शिखर-
निष्ठ सिद्धि ज्ञान प्रतिबन्धक नहीं है.
इदं तु बोध्यम् । यत्र अयं पुरुषो न वेति संशयानन्तरं पुरुषत्व-
व्याप्यकरादिमानयमिति ज्ञानं तत्रासत्यामनुमित्सायां पुरुषत्व-
स्य प्रत्यक्षं भवति, न त्वनुमितिः । अतोऽनुमित्साविरहविशि-
ष्टसमानविषयकप्रत्यक्षसामग्री कामिनीजिज्ञासादिवत् स्वात-
न्त्र्येण प्रतिबन्धिका ।
भाषा-( इदं तु बोध्यम्) इतना यहां औरभी विशेष जानने योग्य है कि-जिस
स्थलमें दोषवशसे पुरुषविषे " अयं पुरुषो न वा " इत्याकारक संशय हुआ पश्चात्
सम्यक् चक्षुःसंयोग होनेसे "पुरुषत्वव्याप्यकरचरणादिमानयं " इत्याकारक
परामर्श हुआ ऐसे स्थलमें संशयपक्षताविशिष्ट परामर्शरूप अनुमितिकी सामग्रीभी
विद्यमान है और चक्षुःसंयोगरूप प्रत्यक्षकी सामग्रीभी विद्यमान है परन्तु ऐसे
स्थलमें यदि अनुमिति सामग्रीकी अनुमित्सा सहकारिणी न होवे तो पुरुषविषयक
प्रत्यक्ष ज्ञानही होता है; अनुमिति नहीं होती. इसलिये अनुमित्साविरहविशिष्ट अनुमि-
तिसामग्रीके प्रति ( समानविषयक ) तुल्यविषयणी अर्थात् यद्विषयक अनुमितिसा-
मग्री है तद्विषयक प्रत्यक्षसामग्री ( कामिनी ) सुन्दरस्त्रीकी जिज्ञासाकी तरह स्वभा-
विक प्रतिबन्धक है अर्थात् जैसे आसक्त वियोगी पुरुषको सुन्दरस्त्रीके मिलापकी
इच्छा कार्यमात्रमें प्रतिबन्धक है क्योंकि वियोगीका किसी कार्यमें मन नहीं लगता;
परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १५७
वैसेही अनुमित्साविरहविशिष्ट प्रत्यक्षज्ञानकी सामग्रीभी समानविषयक अनुमिति
सामग्रीके प्रति स्वाभाविक प्रतिबन्धक जाननी चाहिये.
एवं परामर्शानन्तरं विनापि प्रत्यक्षेच्छां पक्षादिप्रत्यक्षानुत्पत्तेः
प्रत्यक्षेच्छाविरहविशिष्टानुमितिसामग्री भिन्नविषयकप्रत्यक्षे प्र-
तिबन्धिकेति ॥ ७० ॥
भाषा-एवं "वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतः" इत्यादि परामर्शानन्तरं यदि
"पक्षादिविषयकं प्रत्यक्षं मे जायताम्" इत्याकारक प्रत्यक्ष इच्छा उत्तेजक न होय तो
पक्षादि विषयक प्रत्यक्ष नहीं होता किंतु "पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक समुदित अ-
नुमितिज्ञानही होता है इसलिये अनुमितिके विषयसे भिन्नविषयक प्रत्यक्षत्वावच्छिन्नके
प्रति प्रत्यक्ष इच्छाविरहविशिष्ट अनुमितिसामग्रीभी प्रतिबन्धक माननी उचित
है-इति ॥ ७० ॥
प्रसङ्गसङ्गत्त्या हेत्वाभासान् विभजते , अनैकान्त इत्यादि-
भाषा-वादिविजयरूप एककार्यकारित्वरूप प्रसंगसंगतिसे मूलकार "अनै-
कान्तः" इत्यादिग्रंथसे हेत्वाभासोंका विभाग करतेहैं-
अनैकान्तो विरुद्धश्चाप्यसिद्धः प्रतिपक्षितः॥
कालात्ययापदिष्टश्च हेत्वाभासास्तु पञ्चधा ॥७१॥
भाषा-अनैकान्त विरुद्ध, असिद्ध, सत्प्रतिपक्ष, कालात्ययापदिष्ट यह पांच हेत्वा-
भास बोलेजाते हैं ॥ ७१ ॥
तल्लक्षणं तु यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्त्वम् ।
भाषा-हेत्वाभासका लक्षण तो 'यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्त्वं'
इतना मात्र है असद्हेतु मात्र इस लक्षणका लक्ष्य है; ( यद्विषयकत्वेन ) व्यभिचा-
रादिविषयकत्वेन ( ज्ञानस्य) 'पर्वतो वह्निमान् प्रमेयत्वात् इत्यादौ अयं हेतुर्व्यभिचारी'
इत्यादि ज्ञानस्य "पर्वतो वह्निमान्" इत्यादि अनुमिति विरोधित्व है वही हेत्वाभा-
समें हेत्वाभासत्व है अर्थात् जिन 'प्रमेयत्वादि' हेतुओंमें व्यभिचारादि दोषोंका
निश्चय होजाता है उनसे "पर्वतो वह्निमान्" इत्यादि अनुमिति ज्ञानोंकी उत्पत्ति
नहीं होती. एवं "ह्रदो वह्निमान् धूमात्" इत्यादि बाधित स्थलमें वह्न्यभाव
प्रयुक्त ह्रदादिं विषयकत्वेन "ह्रदो वह्न्यभाववान्" इत्याकारक ज्ञानको "ह्रदो
वह्निमान्" इत्यादि अनुमिति प्रतिबन्धकत्व है; वही उसमें बाधितत्वरूप
हेत्वाभासत्व है.
१५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
तथाहि। व्यभिचारादिविषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वा-
त्तेदोषाः । यद्विषयकत्वं च यादृशविशिष्टविषयकत्वं बोध्यम् ।
तेन बाधभ्रमस्यानुमितिविरोधित्वेऽपि न क्षतिः । तत्र पर्वतो
वह्न्यभाववानिति विशिष्टस्याप्रसिद्धत्वान्न हेतुदोषः ।
भाषा-'तथाहि' इस ग्रन्थसे लक्षणको स्वयं स्फुट करतेहैं कि-व्यभिचारादि
दोष विषयकत्वेन “अयं हेतुः व्यभिचारी” इत्यादि ज्ञानको व्यभिचारहेतुक यावत्
अनुमिति विरोधिता है इसलिये व्यभिचारादि दोष हैं. लक्षणघटित 'यद्विषयक'
पदका “यादृश विशिष्ट विषयक” विवरण जानना चाहिये. एवं “पर्वतो वह्निमान्”
इत्यादि सद्स्थलमें अतिव्याप्ति नहीं है क्योंकि यद्यपि वह्न्यभावप्रयुक्त पर्वतविषयक-
त्वेन “पर्वतो वह्न्यभाववान्” इत्याकारक ज्ञानको “पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक
सद्अनुमितिके प्रतिविरोधिता होसकतीहै इसलिये अतिव्याप्ति होनी चाहिये तथापि
'यादृशविशिष्ट' शब्दसे प्रकृतमें वह्न्यभावविशिष्ट पर्वतका ग्रहण है सो वह संसारमा-
त्रमें अप्रसिद्ध है इसलिये अतिव्याप्ति नहीं है. भाव यह कि-पक्षमें वास्तवसे
साध्याभाव होय तो बाध होताहै और यदि वास्तवसे साध्याभाव पक्षमें न रहे
किन्तु पक्षमें साध्याभावका भ्रम हो जावे तो उससे प्रकृत हेतु दुष्ट नहीं होय
सकताहै.
न च वह्न्यभावव्याप्यपाषाणमयत्ववान् पर्वत इति परामर्शकाले
वह्निव्याप्यधूमस्याभासत्वं न स्यात्, तत्र वह्न्यभावव्याप्यवान्
पक्ष इति विशिष्टस्याप्रसिद्धत्वादिति वाच्यम् । इष्टापत्तेः ।
शंका-जिस कालमें जिस स्थलमें सिद्धान्तीको “पर्वतो वह्निमान् धूमात्” इत्या-
कारक हेतुसे “वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वत:” इत्याकारक परामर्श हुआहै. उसकालमें
उसी स्थलमें वादीको “पर्वतो वह्न्यभाववान् पाषाणमयत्वात्” इत्याकारक हेतुसे
“वह्न्यभावव्याप्यपाषाणमयत्ववान् पर्वत:” इत्याकारक परामर्श होता है. यहां
द्वितीय परामर्शसे प्रथम परामर्श कुक्षिप्रविष्ट धूमरूप हेतु सत्प्रतिपक्षत्वेन हेत्वा-
भास गिना जाता है. अब आपके 'यादृशविशिष्टविषयक' कथनानुसार उसम
हेत्वाभासत्वव्यवहार करनेकी कुछ आवश्यकता नहीं है; क्योंकि उसमें आभास-
त्वका सम्पादक जो “वह्न्यभावव्याप्यपाषाणमयत्ववान् पर्वत:” इत्याकारक विरोधी
परामर्श है इसमें वह्न्यभावविशिष्ट पर्वतअंश अप्रसिद्ध है; अर्थात् पाषाणमयत्वरूप
हेतुमें वह्न्यभावनिरूपित व्याप्यता नहीं है. इसलिये पाषाणमयत्व हेतुसे धूमरूप