न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
किञ्चित् प्रतियोगितायां ” ऐसा कहा जाता तो उपस्थितिकृत लाघव होता.
समाधान-'सामान्य' नाम यावत्का है. उसकी जगह यदि ' यत्किञ्चित् ' का
निवेश करें तो “ पर्वतो धूमवान् वन्हेः” इस स्थलमें अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां
' यत्किञ्चित् ' शब्दसे ग्राह्य घटनिष्ठ प्रतियोगितामें पूर्वोक्त रीतिसे उभयाभाव मिल-
नेसे लक्षण संगत होसकता है और अलक्ष्यमें लक्षण संगतहीका नाम अतिव्याप्ति है
और यदि यावदर्थक 'सामान्य' पदका निवेश करें तो अतिव्याप्तिरूप दोष दूर होसक-
ता है; क्योंकि यावदन्तर्गत संयोगेन धूमत्वेन धूमाभावीय धूमनिष्ठ प्रतियोगिताका
भी ग्रहण होसकता है. तात्पर्य यह कि-संयोगेन धूमाभाव हेत्वधिकरण लोहपिण्डमें
पासकतेहैं. परन्तु संयोगेन धूमनिष्ठप्रतियोगितामें उभयाभाव नहींहै किन्तु उभयही है
इसलिये अतिव्याप्तिरूप दोष नहीं है १७ ।
ननु प्रमेयवह्निमान् धूमादित्यादौ प्रमेयवह्नित्वावच्छिन्नत्वमप्र-
सिद्धम् । गुरुधर्मस्यानवच्छेदकत्वादिति चेत् । न । कम्बुग्रीवा-
दिमान्नास्तीति प्रतीत्या कम्बुग्रीवादिमत्त्वावच्छिन्नप्रतियो-
गिताविषयीकरणेन गुरुधर्मस्याप्यवच्छेदकत्वस्वीकारादिति
संक्षेपः । १८ ॥ ६९ ॥
शंका-पूर्वोक्त समस्त लक्षणोंकी “पर्वतः प्रमेयवन्हिमान् धूमात् ” इस स्थलमें
अव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां साध्यतावच्छेदक धर्म प्रमेयवन्हित्वंही मानना होगा, सो
वह अवच्छेदक हो नहीं सकता. भाव यह कि-प्राचीन विद्वानोंका यह संकेत है कि-
“ सम्भवति लघुधर्मे गुरौ तदभावात्-अर्थात् यदि समनियत लघुधर्म अवच्छेद-
क मिलसकें तो गुरुधर्ममें अवच्छेदकता माननी उचित नहीं” प्रकृतमें प्रमेयवन्हित्वके
समनियत तथा लघुवन्हित्वरूप धर्म है, वही अवच्छेदक होना चाहिये; परन्तु वह
साध्यतावच्छेदक धर्म नहीं. साध्यतावच्छेदक धर्म प्रमेयवन्हित्वरूप है परन्तु वह गुरु-
धर्म होनेसे अवच्छेदक नहीं होसकता और साध्यतावच्छेदक धर्मका निवेश पूर्वोक्त
सभी लक्षणोंमें है एवं अवच्छेदक अप्रसिद्धि निन्बधन अव्याप्तिरूप दोष होगा.
समाधान-पदार्थोंकी सिद्धि प्रतीति अनुरोधसे होती है किन्तु स्वमन्तव्य मात्रसे
नहीं होसकती 'अत्र कम्बुग्रीवादिमान् नास्ति' इस प्रतीतिसे कम्बुग्रीवादिमत्त्वावच्छिन्न
प्रतियोगिताक अभाव प्रतीत होता है और अभावीय प्रतियोगिताभी कम्बुग्रीवादिमत्त्वा-
वच्छिन्नाही प्रतीतहोतीहै. इसलिये प्रतीत्यनुरोधसे गुरु धर्ममेंभी अवच्छेदकता अंगीकार
करनी उचित है-इति । यह संक्षेपसे व्याप्तिलक्षणका निरूपण किया है १८ ॥६९॥
पक्षवृत्तित्वमित्यत्र पक्षत्वं किं तदाह, सिषाधयिषयेत्यादि-