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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 350 में से

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पृष्ठ 164

१४० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
अनधिकरणीभूत हेत्वधिकरणमें नहीं है किन्तु अपने प्रतियोगीके अधिकरणीभूत हे-
त्वधिकरणहीमें रहताहै. इसलिये कपिसंयोगाभावको लक्षणघटक न होनेसे घटाद्यभा-
व लेकर लक्षण संगत करनेसे अव्याप्तिरूप दोष नहीं है. एवं " घटः संयोगवान्
सत्त्वात् " इस स्थलमें सत्तारूप हेत्वधिकरण गुणकर्ममें संयोगरूप साध्यका अभाव
अपने प्रतियोगीके अनाधिकरणीभूत हेत्वधिकरणमें रहता है; इसलिये लक्षणघटक है.
एवं तादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदकही साध्यतावच्छेदक संयोगत्वरूप धर्म होगा.
अनवच्छेदक न होनेसे लक्षण संगत नहीं है याते अतिव्याप्तिरूप दोषभी नहीं है.
एवं लक्षणस्वरूप ऐसा हुआ कि (स्वप्रतियोग्यनधिकरणीभूत) जो (हेतुतावच्छेदकसम्ब-
न्धावच्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छिन्नहेत्वधिकरण) तादृशहेत्वधिकरण(वृत्ति) जो अभाव तादृ-
श (अभावीयप्रतियोगितानवच्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामाना-
धिकरण्यं व्याप्तिः ) १० ।
प्रतियोग्यनधिकरणं प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नानधिकरणं
बोध्यम्। तेन विशिष्टसत्तावान् जातेरित्यादौ जात्याधिकरणगुणा-
देर्विशिष्टसत्ताभावप्रतियोगिसत्ताधिकरणत्वेऽपि न क्षतिः । ११।
भाषा-इस लक्षणमें प्रतियोग्यनधिकरणीभूत हेत्वधिकरण प्रतियोगितावच्छेदका-
वच्छिन्नका अनधिकरण जानना, अन्यथा "घटो विशिष्टसत्तावान् जातेः" इस स्थलमें
अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां जातिरूप हेतुका व्यभिचारस्थल गुणकर्म हैं. उस
हेत्वधिकरण गुणकर्ममें विशिष्टसत्ताभाव तो पा नहीं सकते; क्योंकि " विशिष्टवस्तु
शुद्धवस्तुसे अतिरिक्त नहीं होती " इस न्यायसे विशिष्टसत्ताभावका प्रतियोगी शुद्ध
सत्ताभी होसकती है. उस शुद्धसत्ताका अभाव हेत्वधिकरण गुणकर्मोंमें नहीं है; एवं
साध्याभावको लक्षणघटक न होनेसे घटाभाव लेकर लक्षण संगत करनेसे अतिव्याप्ति
होगी.परन्तु यदि प्रतियोगीका अनधिकरण हेत्वधिकरण प्रतियोगितावच्छेदक धर्माव-
च्छिन्नका अनधिकरण कहतेहैं तो हेत्वधिकरण गुणकर्ममेंविशिष्टसत्तात्वेन विशिष्टसत्ताका
अभाव पासक्तेहैं. उस अभावका प्रतियोगी विशिष्टसत्ता होगी.प्रतियोगितावच्छेदक धर्म
विशिष्टसत्तात्व होगा.अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदकधर्मके न होनेसे अतिव्याप्तिरूप दोष
नहीं है. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि-( प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न प्रति-
योग्यनधिकरणीभूत ) जो ( हेतुतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छिन्नहे-
त्वधिकरण )तादृश हेत्वधिकरण(वृत्ति)जो अभाव ( तादृशाभावीयप्रतियोगितानवच्छे-
दकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यं व्याप्तिः) । ११।
एवं साध्यतावच्छेदकसम्बन्धेन प्रतियोग्यनधिकरणत्वं बोध्यम्।