न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः२ ] भाषाटीकासमेता १४१
तेन ज्ञानवान् द्रव्यत्वादित्यादौ द्रव्यत्वाधिकरणघटादेर्विषय-
तासम्बन्धेन ज्ञानाधिकरणत्वेऽपि न क्षतिः । १२ ।
भाषा-एवं हेत्वधिकरणमें प्रतियोग्यनधिकरणताभी साध्यतावच्छेदकसम्बन्धसे
विवक्षित है. अन्यथा "आत्मा ज्ञानवान् द्रव्यत्वात्" इस समवायेन साध्यहेतुक
स्थलमें अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां द्रव्यत्वरूप हेतुका व्यभिचारस्थल घटादिक
हैं. उन हेत्वधिकरणघटादिकोंमें ज्ञानरूप साध्यका अभाव तो नहीं पा
सकते; क्योंकि ज्ञानरूप साध्य विषयतासम्बन्धसे यावत् घटपटादि
विषयोंमें विद्यमान है; किंतु उदासीन घटादिका अभाव लक्षणघटक
हो सकता है. एवं अभावीय प्रतियोगिताके अवच्छेदक घटत्वादि धर्म
होंगे. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक ज्ञानत्व धर्म होगा. तदवच्छिन्न साध्यके
साथ द्रव्यत्वरूप हेतुका सामानाधिकरण्यरूप व्याप्तिका लक्षण संगत होनेसे अति-
व्याप्तिरूप दोष हुआ परन्तु यदि साध्यतावच्छेदक सम्बन्धसे प्रतियोग्यनधिकरणी-
भूत हेत्वधिकरण कहें तो यहां साध्यतावच्छेदक सम्बन्धसमवाय है. समवायसम्ब-
न्धसे ज्ञानाधिकरण आत्माही है; घटादिक नहीं. एवं द्रव्यत्वरूप हेत्वधिकरण
घटादिकोंमें समवायसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक ज्ञानरूप साध्याभावभी लक्षण
घटक हो सकताहै. तादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदकही ज्ञानस्वरूप साध्यतावच्छे-
दक धर्म होगा. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक न होनेसे अतिव्याप्तिरूप दोष
नहीं है १२ ।
इत्थं च वह्निमान् धूमादित्यादौ धूमाधिकरणे समवायेन वह्नि-
विरहसत्त्वेऽपि न क्षतिः । १३ ।
भाषा-एवं प्रतियोग्यनधिकरणमें साध्यतावच्छेदक सम्बन्धका निवेश करनेसे
"पर्वतो वह्निमान् धूमात्" इस स्थलमें अव्याप्तिरूप दोषभी नहीं है. अन्यथा
हेत्वधिकरण पर्वतमें समवायसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताकवह्निरूप साध्यका अभाव
ही पासकते हैं. तादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदक वह्नित्वधर्म होगा. अनवच्छेदक
साध्यतावच्छेदकके न होनेसे लक्षण संगत नहीं है. एवं अव्याप्ति दोष हुआ; परन्तु
यदि प्रतियोग्यनधिकरणमें साध्यतावच्छेदक सम्बन्धकी विवक्षा करतेहैं तो साध्य-
तावच्छेदक संयोगसम्बन्धसे हेत्वधिकरण पर्वतादिमें वह्निरूप साध्यका अभाव नहीं
पासकते क्योंकि वह्नि वहां संयोगेन रहता है. किन्तु घटाद्यभाव लक्षणघटक होगा.
अभावीयप्रतियोगितावच्छेदक घटत्वादि धर्म होंगे. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक
वह्नित्वधर्म होगा. एवं लक्षण संगत होनेसे अव्याप्तिरूप दोष नहीं है. एवं लक्षणका