न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
भाषा-और वस्तुतः सिद्धांत तो यह है कि, यहां लक्षणका स्वरूप ऐसा कहना
उचित है कि-प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्धसे प्रतियोगीका अनधिकरणीभूत जो
हेत्वधिकरण उस हेत्वधिकरणवृत्ति जो अभाव उस अभावकी जो प्रतियोगिता उस प्रति-
योगिता सामान्यमें यत् सम्बन्धावच्छिन्नत्व तथा यद्धर्मावच्छिन्नत्व उभयका
अभाव है, तिस सम्बन्धसे तत्तद्धर्म्मावच्छिन्नकी तिस हेतुके साथ व्यापकता जाननी
चाहिये, तादृश व्यापकके साथ हेतुका सामानाधिकरण्यही व्याप्ति है.
यत्सम्बन्धः साध्यतावच्छेदकः सम्बन्धः, यद्धर्मः साध्यतावच्छे-
दको धर्मः । तत्र यदि यद्धर्मावच्छिन्नत्वाभावमात्रमुच्यते तदा
समवायेन यो वह्न्यभावस्तस्य प्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धः
समवायस्तेन प्रतियोग्यनधिकरणपर्वतादिवृत्तिः स एव, तत्प्रति-
योगितावच्छेदकं च वह्नित्वमित्यव्याप्तिः स्यात्। यदि च यत्स-
म्बन्धावच्छिन्नत्वाभावमात्रमुच्यते तदा तादृशस्य संयोगेन घटा-
भावस्य प्रतियोगितायां संयोगसम्बन्धावच्छिन्नत्वसत्त्वाद्व्याप्तिः
स्यादत उभयमुपात्तम् ।
भाषा-यहां लक्षणमें यत्सम्बन्धसे साध्यतावच्छेदक सम्बन्धका ग्रहण है और
यद्धर्म्मसे साध्यतावच्छेदक धर्मका ग्रहण है. इन दोनोंमें किसी एकका निवेश
न करनेसे अव्याप्ति होगी अर्थात् यदि साध्यतावच्छेदक सम्बन्धका ग्रहण न करें
किन्तु “ प्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धेन प्रतियोग्यनधिकरणीभूतहेत्वधिकरणवृत्त्य-
भावप्रतियोगितासामान्ये यद्धर्मावच्छिन्नत्वाभावः तद्धर्मावच्छिन्नस्य तद्धेतुसामा-
नाधिकरण्यं व्याप्तिः” एतावन्मात्र लक्षण करें तो “वह्निमान् धूमात्” इस स्थलमें
अव्याप्ति होगी; क्योंकि हेत्वधिकरण पर्वतमें “संयोगेन वह्निसत्त्वेपि समवायेन वह्नि-
र्नास्ति” इत्याकारक अभाव पासकतेहैं; एतादृशाभावीय प्रतियोगितासमवायेन वह्नि-
निष्ठा हुई और प्रतियोगिता सामान्यका अर्थ है. यावत् प्रतियोगितामें अर्थात् हेत्व-
धिकरणमें जिस २ सम्बन्धसे जिस २ धर्मसे जो २ अभाव पासकें उस २
अभावकी प्रतियोगितामें उभयाभाव विवक्षित है. एवं समवायेन वह्नि निष्ठा प्रतियोगि-
ताभी यावत् अन्तर्गत है, परन्तु इस प्रतियोगितामें यद्धर्मावच्छिन्नत्वाभाव नहीं है,
किन्तु 'यद्धर्म' पदसे ग्राह्य साध्यतावच्छेदक वह्नित्वरूप धर्म विद्यमान है एवं
अव्याप्ति हुई. इसके वारणार्थ यत् सम्बन्धकाभी निवेश किया. यत्
सम्बन्धसे साध्यतावच्छेदक सम्बन्धका ग्रहण है. एवं अव्याप्ति नहीं है.